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स्टडी: तमिलनाडु सूखे का हॉटस्पॉट, दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में सबसे तेज बढ़ोतरी

1971-2022 के डेटा पर आधारित स्टडी में दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में सूखे से प्रभावित इलाकों की सबसे तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई।

स्टडी: तमिलनाडु सूखे का हॉटस्पॉट, दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में सबसे तेज बढ़ोतरी
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52 साल के क्लाइमेट एनालिसिस में तमिलनाडु को भारत के उन इलाकों में शामिल पाया गया है जहां सूखे का असर ज्यादा साफ तौर पर दिखता है। देश के चार बड़े क्लाइमेट रीजन में दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में लंबे समय में सूखे से प्रभावित इलाके में सबसे तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

स्टडी में क्या देखा गया

‘Evolution of Climate Extremes Over the Indian Subcontinent Using a Revised CEI’ नाम की यह स्टडी International Journal of Climatology में छपी और इसमें 1971 से 2022 तक के रोजाना बारिश और तापमान के डेटा का एनालिसिस किया गया।

इसमें कई तरह के क्लाइमेट एक्स्ट्रीम्स में बदलाव को आंका गया। इसके लिए रिसर्चर्स ने एक बदला हुआ इंडिया क्लाइमेट एक्स्ट्रीम्स इंडेक्स, या IndCEI, तैयार किया था।

इस बदले हुए इंडेक्स में सात इंडिकेटर जोड़े गए हैं, जिनमें गर्मी, सूखा, सूखे दिन और भारी बारिश शामिल हैं।

यह स्टडी National Centre for Medium Range Weather Forecasting, India Meteorological Department और Atria University के वैज्ञानिकों ने की।

रिसर्चर्स ने एनालिसिस के लिए IMD के 1° × 1° ग्रिडेड बारिश और तापमान डेटासेट का इस्तेमाल किया, जो 1971, 2022 की अवधि को कवर करते हैं।

दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में सूखे का सबसे मजबूत संकेत

स्टडी में दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में सूखे से प्रभावित इलाकों में मजबूत पॉजिटिव ट्रेंड मिला। इसमें कहा गया कि यह ट्रेंड जांचे गए चार रीजन में सबसे मजबूत था।

दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत वही रीजनल क्लासिफिकेशन है जिसके तहत इस स्टडी में तमिलनाडु को रखा गया है।

एनालिसिस के मुताबिक, 1990 के दशक से पहले की ज्यादातर अवधि में दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत का 10% से कम हिस्सा सूखे से प्रभावित था।

इसके उलट, 2000 के बाद कई सालों में इस रीजन का 40% से ज्यादा हिस्सा सूखे की स्थिति में था।

रिसर्चर्स ने कहा कि 2010 के दशक और 2020 के शुरुआती सालों में गंभीर और लगातार बने रहने वाली सूखे की स्थिति खास तौर पर साफ दिखी।

रिसर्च के साथ जारी मीडिया नोट में तमिलनाडु, ओडिशा और आंध्र प्रदेश को पूर्वी तटीय राज्यों में शामिल बताया गया है, जहां 1980 के दशक की तुलना में 2011, 2021 के दौरान सूखे से प्रभावित इलाके में 20% से 30% की बढ़ोतरी हुई।

इससे तमिलनाडु पूर्वी तट के कुछ हिस्सों में सूखे के बढ़ते खतरे के एक बड़े पैटर्न के अंदर आता है, जैसा कि स्टडी के साथ जारी मीडिया नोट में बताया गया है।

सूखे के आकलन में SPEI क्यों अहम है

रिसर्चर्स ने सूखे का आकलन करने के लिए Standardised Precipitation-Evapotranspiration Index, या SPEI, का इस्तेमाल किया।

केवल बारिश पर आधारित इंडिकेटर के उलट, SPEI में precipitation और potential evapotranspiration, दोनों को शामिल किया जाता है।

potential evapotranspiration को शामिल करने से SPEI पानी की उपलब्धता पर बढ़ते तापमान के असर को पकड़ पाता है।

इससे सूखे का आकलन केवल बारिश की कमी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह भी समझ आता है कि गर्मी इस बात पर कैसे असर डालती है कि कितना पानी उपलब्ध बचता है।

इसलिए स्टडी के नतीजे दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में सूखे के ट्रेंड को क्लाइमेट एक्स्ट्रीम्स की एक बड़ी तस्वीर से जोड़ते हैं, जिसमें बारिश और तापमान, दोनों से जुड़े इंडिकेटर शामिल हैं।

दक्षिण भारत में गर्मी का बोझ भी बढ़ रहा है

नतीजे दक्षिण भारत में बढ़ते गर्मी के बोझ की ओर भी इशारा करते हैं।

दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में high maximum-temperature extremes का सामना करने वाला इलाका बढ़ा है, खासकर 2010 के दशक से।

रिसर्चर्स ने कहा कि गर्मी के असर में बढ़ोतरी का रिश्ता घटती बारिश, शहरी heat-island effects और क्लाइमेट चेंज के बड़े असर से हो सकता है।

Heat Index, जो तापमान और नमी को मिलाकर heat stress बताता है, उसमें भी दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में लगातार बढ़ोतरी दिखी।

स्टडी इस तेज होते असर की वजह आंशिक तौर पर बढ़ते minimum temperatures और क्षेत्र के Bay of Bengal के पास होने से जुड़ी ज्यादा नमी को बताती है।

Urbanisation और समुद्र की सतह के गर्म तापमान को भी ऐसे फैक्टर्स के रूप में पहचाना गया, जो heat stress को और बढ़ा सकते हैं।

कुल मिलाकर, ये नतीजे दिखाते हैं कि दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत का climate-extreme profile सिर्फ सूखे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गर्मी के बढ़ते असर और heat stress indicators भी शामिल हैं।

सूखे दिनों के इंडिकेटर में ज्यादा सपाट ट्रेंड दिखा

स्टडी में पाया गया कि दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में लगातार सूखे दिनों में लंबे समय की कोई खास बढ़ोतरी नहीं दिखी।

रिसर्चर्स ने लगातार सूखे दिनों में साल-दर-साल बड़ा बदलाव दर्ज किया, जिसमें 2002 में एक प्रमुख peak शामिल था।

उस बदलाव के बावजूद, लगातार सूखे दिनों का कुल ट्रेंड लगभग सपाट था।

रिसर्चर्स ने चेताया कि इस इंडिकेटर के लिए May, October का इस्तेमाल लंबे समय के ट्रेंड को कम दिखा सकता है।

उन्होंने कहा कि यह संभव dampening इसलिए हो सकती है क्योंकि इंडिकेटर में pre- and post-monsoon months शामिल थे।

रीजन के हिसाब से adaptation की जरूरत

रिसर्चर्स ने कहा कि नतीजे region-specific adaptation की जरूरत को रेखांकित करते हैं, खासकर दक्षिण भारत में drought resilience की।

साथ में जारी मीडिया नोट में agriculture, water management, health और infrastructure को कवर करने वाले cross-sectoral response की मांग की गई है।

इसमें localised climate extremes की पहचान के लिए finer-scale monitoring की भी मांग की गई है।

स्टडी “Published - September 26, 2026 08:32 pm IST” टाइमस्टैम्प के साथ प्रकाशित की गई थी।

स्रोत: The Hindu

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस स्टडी में तमिलनाडु को लेकर क्या कहा गया है?

स्टडी में तमिलनाडु को उन इलाकों में बताया गया है जहां सूखे का असर साफ दिखता है। तमिलनाडु को दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत के तहत रखा गया है, जहां सूखे से प्रभावित इलाके में सबसे तेज बढ़ोतरी मिली।

यह स्टडी किस अवधि के डेटा पर आधारित है?

यह स्टडी 1971 से 2022 तक के रोजाना बारिश और तापमान के डेटा पर आधारित है। इसमें IMD के 1° × 1° ग्रिडेड बारिश और तापमान डेटासेट का इस्तेमाल किया गया।

दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में सूखे को लेकर क्या ट्रेंड मिला?

स्टडी के मुताबिक 1990 के दशक से पहले इस रीजन का आम तौर पर 10% से कम हिस्सा सूखे से प्रभावित था। लेकिन 2000 के बाद कई सालों में 40% से ज्यादा हिस्सा सूखे की स्थिति में रहा।

सूखे को मापने के लिए SPEI क्यों इस्तेमाल किया गया?

SPEI सिर्फ बारिश की कमी नहीं देखता, बल्कि तापमान के असर को भी जोड़ता है। इसमें precipitation और potential evapotranspiration दोनों शामिल होते हैं, इसलिए यह बताता है कि गर्मी से पानी की उपलब्धता कैसे घटती है।

यह स्टडी किसने की और कहां छपी?

यह स्टडी National Centre for Medium Range Weather Forecasting, India Meteorological Department और Atria University के वैज्ञानिकों ने की। यह International Journal of Climatology में छपी है।

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