लद्दाख की खुबानी की पहली खेप यूएई के लिए रवाना
लद्दाख के खुबानी अब ग्लोबल मार्केट में, यूएई को भेजी गई 5 मीट्रिक टन की पहली खेप लद्दाख के बागवानी सेक्टर के लिए बड़ी उपलब्धि, 15 जुलाई 2026 को 5 मीट्रिक टन ऑर्गेनिक खुबानी की पहली खेप यूनाइटेड अरब
लद्दाख के बागवानी सेक्टर के लिए बड़ी उपलब्धि, 15 जुलाई 2026 को 5 मीट्रिक टन ऑर्गेनिक खुबानी की पहली खेप यूनाइटेड अरब अमीरात (यूएई) के लिए रवाना हुई। लद्दाख के लेफ्टिनेंट गवर्नर विनय कुमार सक्सेना ने इस मौके पर ऐलान किया कि ये कदम लद्दाख को इंटरनेशनल फ्रूट मार्केट में एंट्री दिलाने वाला है। इस पहल के तहत इस सीजन में 1,000 मीट्रिक टन से ज्यादा खुबानी एक्सपोर्ट करने की योजना है, जो पिछले दो सालों में सिर्फ 1.5 टन तक सीमित थी।
स्थानीय किसानों और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा
इस एक्सपोर्ट पहल को ग्लोबल रिटेल में बड़ा नाम लुलु ग्रुप के साथ हुए समझौते (MoU) का समर्थन मिला है। विनय कुमार सक्सेना ने कहा कि इस साझेदारी से लद्दाख के किसानों को सीधे इंटरनेशनल मार्केट तक पहुंच मिलेगी, जिससे उनकी आजीविका बेहतर होगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। उन्होंने कहा, "यह बड़ा कदम लद्दाख को एक प्रमुख एक्सपोर्ट हब के रूप में स्थापित करने में मदद करेगा।"
लद्दाख अपनी खास किस्म की खुबानी जैसे खांटे, ङारमो, रक्तसे कारपो और हेलमन के लिए जाना जाता है। यहां हर साल 15,789 टन खुबानी का उत्पादन होता है, खासकर शम बेल्ट, नुब्रा वैली और कारगिल में। हालांकि, ग्लोबल सप्लाई चेन की कमी के कारण 40-50% तक बर्बादी की समस्या बनी रहती है।
प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त और चुनौतियां
लद्दाख की खुबानी को ग्लोबल मार्केट में एक खास बढ़त मिलती है क्योंकि यहां की फसल का सीजन बाकी दुनिया के मुख्य खुबानी सीजन से अलग होता है। लेकिन, सीमित कनेक्टिविटी और फल की कम शेल्फ लाइफ के कारण अब तक इसका बाजार सीमित रहा है। इन चुनौतियों के चलते स्थानीय किसान ज्यादातर धूप में सुखाई गई खुबानी पर निर्भर रहे हैं, जो लद्दाखी और कश्मीरी संस्कृति का अहम हिस्सा है।
पहचान और निवेश की मांग
इस प्रगति के बावजूद स्थानीय नेताओं ने कारगिल को पर्याप्त पहचान और समर्थन न मिलने पर सवाल उठाए हैं। कारगिल हर साल लद्दाख की खुबानी का सबसे ज्यादा उत्पादन करता है—10,656 मीट्रिक टन। स्थानीय नेता सज्जाद कारगिली ने केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन की आलोचना करते हुए कहा कि हेलमन खुबानी के लिए जीआई टैग हासिल नहीं किया गया और खुबानी की खेती के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस लेह में बनाया गया, जबकि इसे कारगिल में होना चाहिए था। उन्होंने कारगिल में खुबानी और सेब की खेती के लिए एक समर्पित रिसर्च सेंटर की कमी की ओर भी ध्यान दिलाया।
क्यों है यह अहम
यह एक्सपोर्ट माइलस्टोन लद्दाख की खुबानी इंडस्ट्री की आर्थिक क्षमता को खोलने की दिशा में एक बड़ा कदम है, जो अब तक लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौतियों से जूझ रही थी। स्थानीय किसानों को ग्लोबल मार्केट से जोड़कर यह पहल बर्बादी कम करने, आय बढ़ाने और लद्दाख को इंटरनेशनल फ्रूट ट्रेड में एक अहम खिलाड़ी बनाने का लक्ष्य रखती है। हालांकि, स्थानीय समस्याओं को सुलझाना और कारगिल के बागवानी इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करना इस वेंचर की लंबी सफलता के लिए बेहद जरूरी होगा।
स्रोत: The Hindu
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