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जगत मुरारी ने एफटीआईआई को बनाया फिल्मी बागियों का गढ़

जगत मुरारी और एफटीआईआई: जहां भारत के फिल्मी बागी तैयार हुए 1960 के दशक में जगत मुरारी ने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) के लिए जो सपना देखा, वह क्रांतिकारी था।

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1960 के दशक में जगत मुरारी ने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) के लिए जो सपना देखा, वह क्रांतिकारी था। उनका मकसद सिर्फ फिल्ममेकिंग सिखाना नहीं था, बल्कि ऐसे कलाकार तैयार करना था जो सोचने-समझने में आजाद हों, अपनी अलग आवाज ढूंढें और, उनके शब्दों में, "हमारे समय के बागी" बनें।

बहस और विविधता पर बनी नींव

मुरारी का पढ़ाने का तरीका अलग था। उन्होंने ऐसा माहौल तैयार किया जहां बहस, असहमति और विविधता को बढ़ावा दिया गया। छात्रों को अलग-अलग विचारों और नजरियों से रूबरू कराया गया। इस बौद्धिक माहौल ने एफटीआईआई को एक छोटे से ₹3 लाख के बजट वाले संस्थान से देश के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म स्कूलों में से एक बना दिया।

संस्थान की सफलता में बेहतरीन गेस्ट फैकल्टी का बड़ा योगदान था। मुरारी ने सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक, राज कपूर और जेम्स आइवरी जैसे दिग्गजों को एफटीआईआई में पढ़ाने के लिए राजी किया। कैमरामैन सुब्रत मित्रा और आर.डी. माथुर, और अभिनेता कमिनी कौशल और बलराज साहनी ने छात्रों के अनुभव को और समृद्ध किया।

दुनिया के सिनेमा से परिचय

एफटीआईआई के छात्रों को बैटलशिप पोटेमकिन, सिटिजन केन और पाथेर पांचाली जैसी ऐतिहासिक फिल्में दिखाई जाती थीं। इन फिल्मों के बाद 'विजडम ट्री' के नीचे गहरी चर्चाएं होती थीं, जहां अलग-अलग विचार टकराते और मिलते थे। इन चर्चाओं ने छात्रों को सिनेमा और जिंदगी को समझने का नया नजरिया दिया।

एफटीआईआई की पूर्व छात्रा शबाना आज़मी ने याद करते हुए कहा कि कैसे अंतरराष्ट्रीय सिनेमा से परिचय ने उनके लिए नई दुनिया के दरवाजे खोल दिए। इस माहौल ने छात्रों को आलोचनात्मक सोचने और अपनी खुद की दृष्टि विकसित करने के लिए प्रेरित किया।

प्रैक्टिकल लर्निंग और आत्म-खोज

मुरारी ने 'सीखने का सबसे अच्छा तरीका है करके सीखना' पर जोर दिया। छात्रों को बढ़ती हुई जटिलता वाले प्रैक्टिकल फिल्ममेकिंग एक्सरसाइज में शामिल किया गया। अभिनेताओं को मेथड एक्टिंग सिखाई गई, जिसमें आत्मनिरीक्षण पर ध्यान दिया गया ताकि वे असली और गहराई भरे प्रदर्शन दे सकें। मशहूर पूर्व छात्र अदूर गोपालकृष्णन ने एफटीआईआई को श्रेय दिया कि इसने उन्हें अपने भीतर झांककर सार्थक फिल्में बनाने की कला सिखाई।

भारतीय सिनेमा में बदलाव

एफटीआईआई के पूर्व छात्रों ने भारतीय सिनेमा को नई दिशा दी। जया बच्चन, शबाना आज़मी, अदूर गोपालकृष्णन, मणि कौल और अन्य ने भारतीय न्यू वेव को आगे बढ़ाया, क्षेत्रीय सिनेमा को ऊंचाई दी और बॉलीवुड के कला और तकनीकी स्तर को बढ़ाया। उनका प्रभाव टेलीविजन तक भी पहुंचा और उन्होंने कई पुरस्कार जीते। नेशनल अवॉर्ड समारोह अक्सर एफटीआईआई के पुनर्मिलन जैसे लगते थे।

आज की शिक्षा के लिए सबक

मुरारी का मॉडल भारत की शिक्षा प्रणाली के लिए कई सबक देता है, जो आज भी पहुंच और गुणवत्ता की चुनौतियों से जूझ रही है। बहस, विविधता और आत्म-अभिव्यक्ति पर उनका जोर भविष्य के नेताओं को तैयार करने के लिए एक आदर्श खाका पेश करता है।

2026 के स्वतंत्रता दिवस पर, जगत मुरारी और एफटीआईआई की विरासत हमें याद दिलाती है कि शिक्षा में रचनात्मकता, व्यक्तित्व और उत्कृष्टता को प्राथमिकता देने की ताकत कितनी बड़ी हो सकती है।

स्रोत: The Hindu

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जगत मुरारी का सपना क्या था?

जगत मुरारी का सपना था कि वे ऐसे कलाकार तैयार करें जो सोचने-समझने में आजाद हों और 'हमारे समय के बागी' बनें।

एफटीआईआई में पढ़ाई का माहौल कैसा था?

एफटीआईआई में बहस, असहमति और विविधता को बढ़ावा दिया गया, जिससे छात्रों को अलग-अलग विचारों से रूबरू कराया गया।

एफटीआईआई के छात्रों को कौन-कौन सी फिल्में दिखाई जाती थीं?

एफटीआईआई के छात्रों को <em>बैटलशिप पोटेमकिन</em>, <em>सिटिजन केन</em> और <em>पाथेर पांचाली</em> जैसी ऐतिहासिक फिल्में दिखाई जाती थीं।

जगत मुरारी के पढ़ाने के तरीके में क्या खास था?

जगत मुरारी ने 'सीखने का सबसे अच्छा तरीका है करके सीखना' पर जोर दिया और छात्रों को प्रैक्टिकल फिल्ममेकिंग एक्सरसाइज में शामिल किया।

एफटीआईआई के पूर्व छात्रों का भारतीय सिनेमा पर क्या प्रभाव पड़ा?

एफटीआईआई के पूर्व छात्रों ने भारतीय सिनेमा को नई दिशा दी और बॉलीवुड के कला और तकनीकी स्तर को बढ़ाया।

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