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भारत को अमेरिका के साथ व्यापार डील में चुनौतियों का सामना करना होगा

भारत-अमेरिका डील से पहले सावधानी से कदम उठाने की जरूरत भारत के सामने अमेरिका के साथ अहम व्यापार समझौते से पहले कई चुनौतियां हैं।

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भारत-अमेरिका डील से पहले सावधानी से कदम उठाने की जरूरत

भारत के सामने अमेरिका के साथ अहम व्यापार समझौते से पहले कई चुनौतियां हैं। ये डील दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को मजबूत कर सकती है, लेकिन इसके लिए भारत को नीतियों में बदलाव और वॉशिंगटन के बढ़ते दबाव के बीच संतुलन बनाना होगा। इस समझौते पर बातचीत ऐसे समय हो रही है जब दोनों देशों के बीच टैरिफ, जबरन मजदूरी और एनर्जी ट्रेड जैसे मुद्दों पर मतभेद हैं।

अमेरिकी टैरिफ और जबरन मजदूरी नीति

अमेरिका के ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) ने 1974 के यूएस ट्रेड एक्ट के सेक्शन 301 के तहत 60 देशों पर टैरिफ लगाने का प्रस्ताव दिया है। इसके जवाब में भारत ने अपनी विदेशी व्यापार नीति में जबरन मजदूरी से जुड़े प्रावधान जोड़े हैं, जो इंडोनेशिया, कनाडा, कंबोडिया और पेरू जैसे देशों की प्रतिबद्धताओं के समान हैं।

भारत ने USTR के 12.5 प्रतिशत टैरिफ प्रस्ताव की समीक्षा की मांग की है, जिसमें जांच प्रक्रिया में खामियों को उजागर किया गया है। इसके साथ ही, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सेक्शन 122 के तहत 10 प्रतिशत यूनिवर्सल टैरिफ लगाने की नीति भी लागू की गई है, जो 150 दिनों तक बिना कांग्रेस की मंजूरी के लागू रह सकती है। यह अवधि 24 जुलाई को खत्म हो रही है, जिससे यह साफ नहीं है कि ट्रंप टैरिफ को मजबूत करने के लिए कोई दूसरा रास्ता अपनाएंगे या नहीं।

एनर्जी ट्रेड पर नजर

एनर्जी ट्रेड भी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। हाल ही में अमेरिकी सीनेटरों ने रूस पर नए प्रतिबंधों का प्रस्ताव रखा है, जिसमें रूस के तेल और प्राकृतिक गैस के टॉप पांच खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की बात कही गई है। इनमें भारत भी शामिल है। चूंकि भारत के एनर्जी बास्केट में रूस से आयात का बड़ा हिस्सा है, इसलिए इस कदम का भारत पर गहरा असर हो सकता है।

अमेरिका की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए भारत ने अपने एनर्जी आयात को विविधता देने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। सरकारी कंपनियों ने अमेरिका से देश की 10 प्रतिशत एलपीजी जरूरतों को पूरा करने के लिए समझौते किए हैं। यह कदम भारत की रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के साथ-साथ जोखिम को कम करने की कोशिश को दर्शाता है।

डील क्यों जरूरी है?

अमेरिका के साथ व्यापार समझौता द्विपक्षीय संबंधों में लंबे समय से चली आ रही अनिश्चितता को कम कर सकता है और व्यापार के नए रास्ते खोल सकता है। भारत ने हाल ही में यूके, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय यूनियन के साथ समझौतों को अंजाम दिया है, जो वैश्विक व्यापार साझेदारी को मजबूत करने की उसकी मंशा को दिखाता है। अमेरिका के साथ सफल डील भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में एक अहम खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर सकती है।

अमेरिकी प्रशासन के साथ सावधानी जरूरी

हालांकि इस डील के फायदे हो सकते हैं, भारत को एक अप्रत्याशित व्हाइट हाउस के साथ बातचीत करते वक्त सतर्क रहना होगा, जो अधिकतम रियायतें हासिल करने की कोशिश कर रहा है। घरेलू हितों और बाहरी दबावों के बीच संतुलन बनाना नई दिल्ली के लिए अहम होगा, ताकि वह अपने बाजार को बढ़ा सके और अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं की रक्षा कर सके।

ये बातचीत भारत-अमेरिका संबंधों की दिशा तय कर सकती है और आने वाले सालों में इसका असर देखने को मिल सकता है।

स्रोत: Indian Express

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत को अमेरिका के साथ व्यापार डील में क्या चुनौतियाँ हैं?

भारत को नीतियों में बदलाव और अमेरिका के दबाव के बीच संतुलन बनाना होगा।

अमेरिका के टैरिफ प्रस्ताव का भारत ने क्या जवाब दिया है?

भारत ने अपनी विदेशी व्यापार नीति में जबरन मजदूरी से जुड़े प्रावधान जोड़े हैं और 12.5 प्रतिशत टैरिफ की समीक्षा की मांग की है।

एनर्जी ट्रेड में भारत की स्थिति क्या है?

भारत के एनर्जी बास्केट में रूस से आयात का बड़ा हिस्सा है, और अमेरिका ने रूस पर नए प्रतिबंधों का प्रस्ताव रखा है।

भारत के लिए अमेरिका के साथ डील क्यों जरूरी है?

यह डील द्विपक्षीय संबंधों में अनिश्चितता को कम कर सकती है और भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में एक अहम खिलाड़ी बना सकती है।

भारत को अमेरिका के साथ बातचीत करते समय क्या सावधानी बरतनी चाहिए?

भारत को घरेलू हितों और बाहरी दबावों के बीच संतुलन बनाना होगा ताकि वह अपने बाजार को बढ़ा सके।

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