सरकार निजी जमीन मालिकों को जबरन दस्तखत करने को मजबूर नहीं कर सकती: इलाहाबाद हाई कोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकारी अधिकारियों को निर्देश दिया कि निजी जमीन मालिकों को जबरन बिक्री दस्तावेज पर दस्तखत नहीं कराया जा सकता। कानूनी जमीन अधिग्रहण प्र
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकारी अधिकारियों को निर्देश दिया है कि अगर निजी जमीन मालिक अपनी संपत्ति खुशी से बेचने से इनकार करते हैं तो कानूनी तरीके से जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया अपनाएं। कोर्ट ने कहा कि जबरन बिक्री दस्तावेज पर दस्तखत कराना गैरकानूनी है।
लखनऊ बेंच ने शुक्रवार को कहा कि जमीन बिक्री दस्तावेज के जरिए तभी खरीदी जा सकती है जब मालिक खुशी से बेचने को राजी हो और दोनों पक्ष आपस में कीमत पर सहमत हों। जस्टिस शेखर बी सराफ और जस्टिस अब्धेश कुमार चौधरी की बेंच ने अखिलेश कुमार पंकज और सात अन्य लोगों की याचिका पर यह आदेश दिया। याचिका बलरामपुर जिले के देवीपाटन तुलसीपुर गांव में सड़क चौड़ीकरण के लिए उनकी जमीन के अधिग्रहण से जुड़ी थी।
दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं
कोर्ट ने साफ कहा कि स्वैच्छिक बिक्री और जबरन अधिग्रहण दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं को परेशान न करें या बिक्री दस्तावेज पर दस्तखत के लिए जबरन उनकी सहमति न लें।
राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि सड़क चौड़ीकरण के लिए जरूरी लगभग 80% जमीन पहले ही बिक्री दस्तावेज के जरिए खरीद ली गई है और अलग-अलग जमीन मालिकों ने करीब 104 रजिस्ट्रेशन कराए हैं। लेकिन अधिकारी याचिकाकर्ताओं से संपर्क नहीं कर पाए या खरीद के लिए उनकी सहमति नहीं ले पाए।
कीमत को लेकर दबाव
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे अपनी जमीन बेचने को तैयार नहीं हैं और आरोप लगाया कि अधिकारी उन पर ऐसी कीमत पर बेचने का दबाव बना रहे हैं जो उन्हें मंजूर नहीं है।
मामले पर विचार के बाद बेंच ने कहा कि कानून साफ है: अगर जमीन मालिक बेचने को तैयार हैं और राज्य बातचीत करके बिक्री कीमत पर समझौता कर सकता है, तो वे संपत्ति राज्य को बेच सकते हैं। लेकिन ऐसी सहमति नहीं होने पर राज्य को भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजे और पारदर्शिता के अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत नोटिफिकेशन जारी करना होगा और कानून के मुताबिक जमीन का अधिग्रहण करना होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर कोई याचिकाकर्ता खुशी से संपत्ति बेचना चाहता है तो कानून के मुताबिक बिक्री दस्तावेज तैयार किया जा सकता है।
स्रोत: The Hindu
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या सरकार किसी को जबरन जमीन बेचने पर दस्तखत करने के लिए मजबूर कर सकती है?
नहीं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकार किसी निजी जमीन मालिक को बिक्री दस्तावेज पर जबरन दस्तखत करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। जबरन दस्तखत कराना गैरकानूनी है।
स्वैच्छिक बिक्री और जबरन अधिग्रहण में क्या फर्क है?
स्वैच्छिक बिक्री तब होती है जब जमीन मालिक खुशी से अपनी संपत्ति बेचना चाहे और कीमत पर दोनों पक्ष सहमत हों। जबरन अधिग्रहण एक अलग कानूनी प्रक्रिया है जो तब अपनाई जाती है जब मालिक बेचने को तैयार न हो।
अगर जमीन मालिक सरकार को जमीन नहीं बेचना चाहता तो क्या होगा?
अगर जमीन मालिक खुशी से बेचने को तैयार नहीं है तो सरकार को भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजे और पारदर्शिता के अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत कानूनी तरीके से जमीन का अधिग्रहण करना होगा।
इस फैसले की पृष्ठभूमि क्या है?
यह फैसला बलरामपुर जिले के देवीपाटन तुलसीपुर गांव में सड़क चौड़ीकरण के लिए जमीन अधिग्रहण से जुड़ा है। सरकार ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे अपनी जमीन बिक्री दस्तावेज के जरिए बेचें, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि अधिकारी उन्हें अपने हिसाब से कीमत पर दस्तखत करने के लिए दबाव बना रहे हैं।
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