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एआई से जंगलों के पुनर्वास में नई तकनीक की शुरुआत

एआई से जंगलों का पुनर्वास हो सकता है आसान, लेकिन चुनौतियां बरकरार: भारतीय वन सेवा अधिकारी पुष्पेंद्र राणा बॉडी: जंगलों के पुनर्वास और प्रबंधन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग से बड़ी

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एआई से जंगलों का पुनर्वास हो सकता है आसान, लेकिन चुनौतियां बरकरार: भारतीय वन सेवा अधिकारी पुष्पेंद्र राणा

बॉडी:
जंगलों के पुनर्वास और प्रबंधन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग से बड़ी मदद मिल सकती है, लेकिन इसका इस्तेमाल स्थानीय पर्यावरण और सामाजिक परिस्थितियों के हिसाब से होना चाहिए। यह कहना है भारतीय वन सेवा (IFS) के अधिकारी डॉ. पुष्पेंद्र राणा का। द इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में डॉ. राणा ने पर्यावरण संरक्षण में तकनीक के फायदों और सीमाओं के बारे में बात की। उन्होंने हिमाचल प्रदेश में अपने अनुभव साझा किए।

जंगलों के पुनर्वास में एआई का स्मार्ट इस्तेमाल

डॉ. राणा ने व्हेयर टू प्लांट और व्हाट टू प्लांट जैसे इनोवेटिव टूल्स बनाए हैं। ये टेलीग्राम-आधारित चैटबॉट्स हैं, जो फॉरेस्ट रेंजर्स और किसानों को सही जगह और सही पेड़ लगाने में मदद करते हैं। ये टूल्स मशीन लर्निंग मॉडल्स के जरिए जलवायु, मिट्टी, जमीन, वनस्पति और अन्य फैक्टर्स का डेटा इस्तेमाल कर सटीक सुझाव देते हैं।

उदाहरण के लिए, व्हेयर टू प्लांट का इस्तेमाल 2025 के पौधारोपण सीजन में हिमाचल प्रदेश में किया गया था। इसके जरिए 250 जगहों पर 500 हेक्टेयर में पौधारोपण के लिए सही साइट चुनी गई। इसका यूजर-फ्रेंडली इंटरफेस इसे फील्ड ऑफिसर्स के लिए आसान बनाता है, क्योंकि इसके लिए किसी स्पेशल जीआईएस एक्सपर्ट की जरूरत नहीं होती।

अब व्हाट टू प्लांट नाम का नया मॉड्यूल तैयार किया जा रहा है, जो खास जगहों के लिए सबसे उपयुक्त देशी पेड़ों की प्रजातियों की सिफारिश करेगा। यह मॉड्यूल 2,26,000 से ज्यादा जियो-रेफरेंस्ड फील्ड ऑब्जर्वेशन्स और पर्यावरणीय डेटा पर आधारित है। यह हिमाचल प्रदेश की 98 देशी पेड़ प्रजातियों के लिए उपयुक्तता की भविष्यवाणी कर सकेगा।

जंगलों के पुनर्वास में एआई के इस्तेमाल की चुनौतियां

तकनीक के इन फायदों के बावजूद, डॉ. राणा ने एआई के इस्तेमाल में आने वाली चुनौतियों पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि भले ही एआई सही जगह चुनने में मदद कर सकता है, लेकिन यह चराई, आक्रामक प्रजातियों या समुदाय की भागीदारी जैसे कारकों को ध्यान में नहीं रख सकता, जो पुनर्वास की सफलता को प्रभावित करते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि एआई टूल्स को इस तरह डिजाइन करना चाहिए, जो फील्ड स्टाफ की जमीनी चुनौतियों को हल कर सके। एआई को स्थानीय ज्ञान का पूरक बनना चाहिए, न कि उसका विकल्प। इसके सुझाव ऐसे होने चाहिए, जिन्हें फील्ड ऑफिसर्स और समुदाय जरूरत पड़ने पर बदल या खारिज कर सकें। उदाहरण के लिए, एआई किसी जगह को उपयुक्त बता सकता है, लेकिन वहां मौसमी जलभराव या जमीन के सांस्कृतिक उपयोग जैसी समस्याओं का ध्यान नहीं रख सकता। ऐसे फीडबैक सिस्टम में सुधार के लिए जरूरी हैं।

डेटा आधारित पर्यावरणीय प्रबंधन की ओर कदम

डॉ. राणा का काम वैज्ञानिक, तकनीकी और स्थानीय विशेषज्ञता को जोड़कर ज्यादा जवाबदेह और असरदार पुनर्वास प्रथाओं की दिशा में एक कदम है। उन्होंने कहा कि कई पर्यावरणीय प्रोग्राम केवल लगाए गए पौधों की संख्या या खर्च किए गए फंड जैसे मेट्रिक्स पर ध्यान देते हैं, लेकिन ये नहीं देखते कि इनसे पर्यावरण और समाज को कितना फायदा हुआ।

संरक्षण तकनीक के व्यापक प्रभाव

डॉ. राणा ने माना कि एआई और मशीन लर्निंग से पर्यावरण संरक्षण में क्रांति आ रही है, लेकिन इसकी सफलता मजबूत डेटा, संस्थागत समर्थन और लंबे समय तक अपनाने पर निर्भर करती है। उन्होंने भारत में तकनीक के सफल उदाहरण भी दिए, जैसे फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया का सैटेलाइट आधारित फॉरेस्ट फायर अलर्ट सिस्टम और चक्रवात पूर्वानुमान में प्रगति। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी तकनीकों पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता सही नहीं है, जो केवल प्रशासनिक मेट्रिक्स को प्राथमिकता देती हैं या जिनमें फॉलो-अप मैकेनिज्म की कमी होती है, जैसे ड्रोन से पेड़ लगाना।

आखिर में, डॉ. राणा ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की वकालत की, जिसमें तकनीक बेहतर पर्यावरणीय फैसले लेने में मदद करे और स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाए। उनका काम यह दिखाता है कि जंगलों के पुनर्वास जैसी जटिल चुनौतियों को हल करने के लिए मशीन इंटेलिजेंस और मानव विशेषज्ञता का तालमेल कितना जरूरी है।

स्रोत: Indian Express

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