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वैज्ञानिकों ने एआई से भालुओं की हरकतें ट्रैक करने की तकनीक विकसित की

रिसर्चर्स एआई का इस्तेमाल कर भालुओं की हरकतें ट्रैक करेंगे, डीएनए कलेक्शन में मिलेगी मदद वैज्ञानिकों ने एक ऐसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सिस्टम तैयार किया है, जो ब्राउन बियर (भालू) की हरकतों पर नजर

वैज्ञानिकों ने एआई से भालुओं की हरकतें ट्रैक करने की तकनीक विकसित की
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रिसर्चर्स एआई का इस्तेमाल कर भालुओं की हरकतें ट्रैक करेंगे, डीएनए कलेक्शन में मिलेगी मदद

वैज्ञानिकों ने एक ऐसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सिस्टम तैयार किया है, जो ब्राउन बियर (भालू) की हरकतों पर नजर रखेगा और दूरदराज के इलाकों में डीएनए कलेक्शन को आसान बनाएगा। लंदन की जूलॉजिकल सोसाइटी की एक स्टडी में इस नई तकनीक के बारे में बताया गया है। इसमें एआई मॉडल और कैमरा-ट्रैप इमेज का इस्तेमाल कर यह देखा जाएगा कि भालू कब पेड़ों के पास खड़े होकर अपने शरीर को रगड़ते हैं। इस दौरान उनके बाल पेड़ों पर छूट जाते हैं, जो डीएनए टेस्ट के लिए बहुत जरूरी होते हैं।

हेयर स्नेयर्स, यानी पेड़ों पर लगे कांटेदार तार, भालुओं के बाल इकट्ठा करने का एक नॉन-इनवेसिव तरीका है। लेकिन इन सेटअप्स को बार-बार चेक करना पड़ता है ताकि सैंपल खराब न हो जाएं। यह प्रक्रिया काफी समय लेने वाली और महंगी होती है। उदाहरण के लिए, कैटलन पिरेनीज इलाके में हेयर स्नेयर्स से सिर्फ 24% विजिट्स में ही इस्तेमाल लायक सैंपल मिलते हैं।

इस समस्या को हल करने के लिए रिसर्चर्स ने एआई सिस्टम तैयार किया है, जो कैमरा ट्रैप से ली गई तस्वीरों का विश्लेषण करता है। उन्होंने एआई को यह पहचानने के लिए ट्रेन किया कि भालू कब दो पैरों पर खड़ा होता है (बाइपेडलिज्म) और कब चार पैरों पर चलता है (क्वाड्रुपेडलिज्म)। चूंकि भालुओं की पोज़ का पहले से कोई डेटा उपलब्ध नहीं था, इसलिए रिसर्च टीम ने 2020 से 2023 के बीच ली गई 2,373 तस्वीरों को मैन्युअली एनोटेट किया और भालुओं के शरीर के 15 अहम पॉइंट्स को मार्क किया।

इस सिस्टम में YOLOv11 पोज़ एस्टीमेशन मॉडल का इस्तेमाल किया गया है, जिसने 93.2% प्रिसिजन रेट के साथ इन पॉइंट्स को डिटेक्ट किया। इसके अलावा, एक मल्टीलेयर परसेप्ट्रॉन (MLP) मॉडल ने भालुओं की पोज़ को 96.1% सटीकता के साथ क्लासिफाई किया। यह सिस्टम यह पहचानने में मदद करता है कि भालू ने पेड़ पर लगे हेयर स्नेयर्स के साथ कब इंटरैक्ट किया, जिससे डीएनए टेस्ट के लिए बाल इकट्ठा किए जा सकते हैं।

यह सिस्टम उन इलाकों के लिए डिजाइन किया गया है, जहां मोबाइल नेटवर्क की सुविधा नहीं है। यह सैटेलाइट लिंक के जरिए हल्का डेटा और सिंप्लिफाइड विजुअल्स भेजता है, जिससे डेटा ट्रांसफर की जरूरत कई मेगाबाइट्स से घटकर सिर्फ 100 बाइट्स तक रह जाती है। यह तकनीक दूरदराज के इलाकों में ज्यादा प्रैक्टिकल है।

एआई सिस्टम की मदद से रिसर्चर्स सिर्फ उन्हीं जगहों का दौरा करेंगे, जहां भालुओं की एक्टिविटी रिकॉर्ड हुई है। इससे समय और संसाधन दोनों की बचत होगी। यह नई तकनीक वाइल्डलाइफ मॉनिटरिंग प्रोग्राम्स को और बेहतर बनाएगी।

स्टडी में कहा गया है कि एआई-पावर्ड पोज़ एस्टीमेशन इकोलॉजिकल मॉनिटरिंग के लिए एक शानदार टूल साबित हो सकता है। यह न सिर्फ डीएनए कलेक्शन की प्रक्रिया को ऑटोमेट करेगा, बल्कि भालुओं के व्यवहार से जुड़े ऐसे डेटा भी देगा, जो पारंपरिक हेयर स्नेयर्स से नहीं मिल सकते।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वैज्ञानिकों ने भालुओं की निगरानी के लिए एआई तकनीक क्यों बनाई?

भालुओं के डीएनए कलेक्शन के लिए हेयर स्नेयर्स का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इन्हें बार-बार चेक करना पड़ता है, जिससे समय और पैसा दोनों बहुत लगते हैं। एआई सिस्टम से सिर्फ उन जगहों का दौरा करना पड़ेगा जहां भालुओं की एक्टिविटी रिकॉर्ड हुई है।

यह एआई सिस्टम भालुओं की कौन सी हरकतें पहचानता है?

एआई सिस्टम यह पहचानता है कि भालू कब दो पैरों पर खड़ा होता है और कब चार पैरों पर चलता है। जब भालू दो पैरों पर खड़ा होकर पेड़ों पर अपने शरीर को रगड़ते हैं, तो उनके बाल पेड़ों पर छूट जाते हैं, जो डीएनए टेस्ट के लिए जरूरी होते हैं।

एआई मॉडल कितनी सटीकता के साथ काम करता है?

YOLOv11 पोज़ एस्टीमेशन मॉडल ने 93.2% प्रिसिजन रेट के साथ भालुओं के शरीर के अहम पॉइंट्स को पहचाना। इसके अलावा, मल्टीलेयर परसेप्ट्रॉन मॉडल ने भालुओं की पोज़ को 96.1% सटीकता के साथ क्लासिफाई किया।

दूरदराज के इलाकों में यह सिस्टम कैसे काम करता है?

यह सिस्टम उन इलाकों के लिए डिजाइन किया गया है जहां मोबाइल नेटवर्क नहीं है। यह सैटेलाइट लिंक के जरिए बहुत हल्का डेटा भेजता है, जिससे डेटा ट्रांसफर कई मेगाबाइट्स से घटकर सिर्फ 100 बाइट्स रह जाता है।

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