रेशम उत्पादन कोर्स से छात्रों को टिकाऊ कृषि में तैयार किया जा रहा
रेशम उत्पादन के कोर्स से छात्रों को टिकाऊ कृषि उद्यमिता के लिए तैयार किया जा रहा है रेशम उत्पादन यानी सिल्कवर्म्स की खेती और कच्चे रेशम का उत्पादन, अब एक टिकाऊ आय का जरिया बनता जा रहा है।
रेशम उत्पादन यानी सिल्कवर्म्स की खेती और कच्चे रेशम का उत्पादन, अब एक टिकाऊ आय का जरिया बनता जा रहा है। खासकर उन इलाकों में जहां पानी की कमी जैसी समस्याएं हैं। इसे बढ़ावा देने के लिए कई कृषि कॉलेजों ने रेशम उत्पादन और मोरिकल्चर (शहतूत की पत्तियों की खेती) पर कोर्स शुरू किए हैं। इसका मकसद ग्रामीण युवाओं को एग्री-बिजनेस में आगे बढ़ाना है।
तमिलनाडु में रेशम उत्पादन ने धान आधारित खेती करने वाले किसानों के लिए एक अच्छा विकल्प साबित किया है। खासकर कावेरी डेल्टा इलाके में, जहां किसान पानी की कमी, जलवायु परिवर्तन, बढ़ते खर्च और कम मुनाफे जैसी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन, पुदुकोट्टई के प्रमुख वैज्ञानिक राजकुमार के मुताबिक, रेशम उत्पादन एक सस्ता और असरदार समाधान है। सिर्फ ₹15,000 से भी कम के शुरुआती निवेश में एक एकड़ जमीन पर शहतूत की खेती और सिल्कवर्म्स की परवरिशुरू की जा सकती है। शहतूत का पौधा एक बार लगने के बाद 20 साल तक सिल्कवर्म्स की परवरिश में मदद करता है। पौधे छह महीने में तैयार होकर सिल्कवर्म्स के लिए जरूरी पत्तियां देने लगते हैं।
इसकी आर्थिक संभावनाओं को देखते हुए कई कृषि संस्थान इसे अपने कोर्स में शामिल कर रहे हैं। जैसे कि पेरम्बलुर के धनलक्ष्मी श्रीनिवासन एग्रीकल्चर कॉलेज में बी.एससी. एग्रीकल्चर प्रोग्राम के तहत छात्रों को कमर्शियल कोकून प्रोडक्शन का प्रैक्टिकल कोर्स कराया जाता है। यहां छात्र शहतूत की खेती करते हैं और सिल्कवर्म्स को प्रमाणित चावकी सेंटर से मिले अंडों से पालते हैं। कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर के. हरिप्रिया ने बताया, "यह प्रैक्टिकल एक्सपोजर छात्रों को उत्साहित करता है क्योंकि वे किताबों में पढ़ी बातें असल जिंदगी में लागू करते हैं।" उन्होंने कहा कि रेशम उत्पादन छात्रों को कॉलेज के दौरान ही आय और रोजगार के मौके देता है।
वेल्लोर जिले के पालार एग्रीकल्चर कॉलेज में रेशम उत्पादन को एक बिजनेस-ओरिएंटेड सब्जेक्ट के तौर पर पढ़ाया जाता है। कॉलेज ने एक मिनी-यूनिट बनाई है, जहां छात्र कोकून की परवरिश और सिल्क निकालने का प्रैक्टिकल अनुभव लेते हैं। इसी तरह तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (TNAU) भी रेशम उत्पादन पर डिग्री और डिप्लोमा कोर्स कराती है, जो छात्रों को वैज्ञानिक जानकारी और उद्यमिता के हुनर से लैस करता है।
राजकुमार ने बताया कि रेशम उत्पादन पर आधारित कोर्स ग्रामीण बेरोजगारी को कम करने में मदद करते हैं। ये कोर्स छात्रों को शहतूत की खेती, सिल्कवर्म्स की परवरिश, कोकून हार्वेस्टिंग, सिल्क रीलिंग और बुनाई जैसे कामों में सक्षम बनाते हैं। इससे ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलता है।
सबसे ज़्यादा पढ़ी गई
- 1
श्रावस्ती में आधार कार्ड सेंटरों पर अवैध वसूली का मामला सामने आया
- 2
गाजियाबाद में स्वतंत्रता दिवस पर भव्य तिरंगा यात्रा का आयोजन
- 3
राजा महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय में नवाचार कार्यशाला का आयोजन
- 4
राजा महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय में ‘फ्री थिंकर्स क्लब’ की शुरुआत
- 5
शिक्षक पर शराब पीकर स्कूल आने का आरोप, ग्रामीणों का हंगामा
टिप्पणियाँ
अभी कोई टिप्पणी नहीं। पहली टिप्पणी करें।