तमिलनाडु की तिलगवती ने कट्टैकोथू में जलवायु परिवर्तन की कहानी जोड़ी
जलवायु परिवर्तन के लिए तमिलनाडु की कट्टैकोथू की नई सोच तमिलनाडु की पारंपरिक लोक थिएटर कला कट्टैकोथू सदियों से भगवानों, राक्षसों और योद्धाओं की महाकाव्य कहानियां दिखाती आई है।
जलवायु परिवर्तन के लिए तमिलनाडु की कट्टैकोथू की नई सोच
तमिलनाडु की पारंपरिक लोक थिएटर कला कट्टैकोथू सदियों से भगवानों, राक्षसों और योद्धाओं की महाकाव्य कहानियां दिखाती आई है। लेकिन अब श्री तिलगम कट्टैकोथू कुज़्हु के एक नए प्रोडक्शन ने जलवायु परिवर्तन से होने वाली बढ़ती गर्मी के खतरे को अपनी कहानी का हिस्सा बनाया है।
महिला ने संभाली कमान
इस नई सोच के पीछे हैं 36 साल की तिलगवती पलानी, जो तमिलनाडु के रानीपेट से हैं। उन्होंने कट्टैकोथू को सामाजिक बदलाव का जरिया बनाने में अपनी जिंदगी लगा दी है। पलानी, जो इस पुरुष-प्रधान कला में जगह बनाने वाली पहली महिलाओं में से एक हैं, इससे पहले एनीमिया, कुष्ठ रोग और लैंगिक समानता जैसे मुद्दों पर काम कर चुकी हैं। उनकी नई प्रस्तुति वेप्पथिन वेरीयट्टम (गर्मी का गुस्सा) तमिलनाडु में बढ़ते तापमान और इसके असर को दिखाती है।
यह नाटक रानीपेट के वेदावली विद्यालय में प्रीमियर होगा और फिर रानीपेट और तिरुवन्नामलाई के स्कूलों में दिखाया जाएगा। ये जिले राज्य के सबसे गर्म इलाकों में गिने जाते हैं। पलानी की 13 सदस्यीय टीम में प्रोफेशनल कलाकार और स्कूल के बच्चे शामिल हैं। यह बच्चों को जोड़ने के लिए जानबूझकर किया गया है। पलानी कहती हैं, "जब बच्चे अपने जैसे बच्चों को परफॉर्म करते देखते हैं, तो कनेक्शन ज्यादा गहरा होता है।"
संघर्ष से जुड़ी कहानी
पलानी का जलवायु पर आधारित कहानी कहने का सफर उनकी निजी जिंदगी से जुड़ा है। नाटक के लिए रिसर्च के दौरान उन्हें याद आया कि अर्कोट-चैय्यार बायपास पर सैकड़ों पेड़ काट दिए गए थे, जिससे इलाके में गर्मी और बढ़ गई। उसी समय उन्होंने पढ़ा कि ज्यादा गर्मी से स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है, जिसमें गर्भावस्था से जुड़ी समस्याएं भी शामिल हैं। यह मुद्दा तब और निजी हो गया जब उनकी बहन का गर्भपात हो गया। हालांकि पलानी इस घटना को सीधे गर्मी से नहीं जोड़तीं, लेकिन यह उनके लिए पर्यावरण के नुकसान पर सोचने का बड़ा कारण बन गया।
गर्मी को इंसानी रूप देना
वेप्पथिन वेरीयट्टम में बच्चों के गर्म क्लासरूम, टिन की छतों के नीचे खाना बनाती महिलाओं और तपती धूप में काम करते मजदूरों की कहानी है। एक क्रिएटिव ट्विस्ट में, नाटक में गर्मी को एक किरदार के रूप में दिखाया गया है। पलानी चाहती हैं कि लोग गर्मी को खलनायक के रूप में न देखें, बल्कि यह समझें कि इंसानों ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर इसे ऐसा बनाया है। वह कहती हैं, "मैं चाहती थी कि लोग गर्मी को एक अलग नजरिए से देखें। यहां तक कि मैं चाहती थी कि लोग गर्मी के लिए दुख महसूस करें, क्योंकि यह खुद से खलनायक नहीं है। यह हम हैं, जिन्होंने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर इसे ऐसा बना दिया है।"
परंपरा को नई जान देना
कुछ आलोचकों के कट्टैकोथू को "मरती हुई कला" कहने के बावजूद, पलानी इसे आज के मुद्दों को उठाने का एक ताकतवर जरिया मानती हैं। वह कहती हैं, "यह खत्म होती चर्चाओं को आवाज देता है।" परंपरा और आधुनिकता को मिलाकर पलानी न सिर्फ इस कला को जिंदा रख रही हैं, बल्कि इसे शिक्षा और सामाजिक जागरूकता का एक अहम माध्यम भी बना रही हैं।
जलवायु परिवर्तन पर केंद्रित यह नाटक पर्यावरण की अनदेखी के स्थानीय और वैश्विक खतरों की याद दिलाता है। यह उन समुदायों के लिए एक जरूरी संदेश है, जो गर्म होती दुनिया की सच्चाई का सामना कर रहे हैं।
स्रोत: The Hindu
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कट्टैकोथू क्या है?
कट्टैकोथू तमिलनाडु की एक पारंपरिक लोक थिएटर कला है, जो भगवानों, राक्षसों और योद्धाओं की महाकाव्य कहानियां दिखाती है।
तिलगवती पलानी ने जलवायु परिवर्तन पर क्यों ध्यान दिया?
तिलगवती पलानी ने जलवायु परिवर्तन पर ध्यान दिया क्योंकि उन्होंने देखा कि बढ़ती गर्मी से स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है, और यह उनके व्यक्तिगत अनुभवों से भी जुड़ा है।
वेप्पथिन वेरीयट्टम नाटक का विषय क्या है?
वेप्पथिन वेरीयट्टम नाटक में बढ़ते तापमान और इसके प्रभाव को दिखाया गया है, जिसमें गर्म क्लासरूम, तपती धूप में काम करते मजदूरों और महिलाओं की कहानियां शामिल हैं।
तिलगवती पलानी की टीम में कौन-कौन शामिल हैं?
तिलगवती पलानी की 13 सदस्यीय टीम में प्रोफेशनल कलाकार और स्कूल के बच्चे शामिल हैं।
तिलगवती पलानी का मानना है कि कट्टैकोथू को क्यों जीवित रखा जाना चाहिए?
तिलगवती पलानी का मानना है कि कट्टैकोथू आज के मुद्दों को उठाने का एक ताकतवर जरिया है और यह शिक्षा और सामाजिक जागरूकता का अहम माध्यम है।
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