आगा सैयद रूहुल्लाह नेशनल कॉन्फ्रेंस से अलग, श्रीनगर सीट से इस्तीफा
आगा सैयद रूहुल्लाह नेशनल कॉन्फ्रेंस छोड़ी, श्रीनगर लोकसभा सीट से इस्तीफा 24 साल का साथ खत्म श्रीनगर, 4 नवंबर: जम्मू-कश्मीर की सत्तारूढ़ जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस यानी एनसी को बड़ा राजनीतिक झटका
24 साल का साथ खत्म
श्रीनगर, 4 नवंबर: जम्मू-कश्मीर की सत्तारूढ़ जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस यानी एनसी को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और श्रीनगर के लोकसभा सांसद आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी ने मंगलवार को पार्टी से इस्तीफा देने का ऐलान किया। उन्होंने अपनी संसदीय सीट छोड़ने की भी घोषणा की है। इसके साथ ही नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ उनका करीब 24 साल पुराना जुड़ाव खत्म हो गया।
रूहुल्लाह ने यह ऐलान बडगाम के बेहिश्त-ए-ज़हरा पार्क में एक बड़ी जनसभा को संबोधित करते हुए किया। यह सभा उनके पिता आगा सैयद मेहदी की 26वीं पुण्यतिथि पर आयोजित की गई थी।
उनका यह फैसला ऐसे समय आया है जब नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर असंतोष बढ़ रहा है। पार्टी के विधायकों के एक वर्ग ने उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार के कामकाज को लेकर नाराजगी जताई है। रूहुल्लाह के इस्तीफे से मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सामने पार्टी के भीतर की चुनौतियां और बढ़ गई हैं।
चुनावी वादे पूरे नहीं करने का आरोप
रूहुल्लाह ने पार्टी नेतृत्व पर सीधा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 2024 के विधानसभा चुनावों के दौरान लोगों से जो वादे किए थे, उन्हें पूरा नहीं किया गया।
उन्होंने खास तौर पर आर्टिकल 370 की बहाली, जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा, आरक्षण में सुधार और राजनीतिक कैदियों की रिहाई को लेकर पार्टी के रुख पर निराशा जताई।
रूहुल्लाह ने कहा कि नेतृत्व के साथ उनके मतभेद व्यक्तिगत शिकायतों या किसी पद से वंचित किए जाने की वजह से नहीं हैं। उनके मुताबिक, ये मतभेद सिद्धांतों और राजनीतिक वादों से जुड़े हैं।
उनका तर्क था कि पार्टी ने लोगों से खास वादों के आधार पर वोट मांगे थे। लेकिन सत्ता में आने के बाद उन वादों को उस दृढ़ता के साथ आगे नहीं बढ़ाया गया, जिसकी उम्मीद पार्टी के समर्थकों को थी।
श्रीनगर के सांसद रूहुल्लाह नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर उमर अब्दुल्ला सरकार के आर्टिकल 370 से जुड़े रुख पर सवाल उठाने वाली प्रमुख आवाजों में शामिल रहे हैं। पिछले दो वर्षों में पार्टी नेतृत्व के साथ उनके मतभेद सार्वजनिक होते गए थे।
इन मतभेदों में आरक्षण नीति और अक्टूबर 2024 में निर्वाचित सरकार के गठन के बाद अपनाई गई राजनीतिक दिशा को लेकर असहमति भी शामिल थी।
पार्टी के भीतर पहले से चल रही बगावत
रूहुल्लाह का इस्तीफा इसलिए भी अहम है क्योंकि उन्होंने 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों के दौरान नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए प्रचार अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
उनके जाने से पहले ही सत्तारूढ़ पार्टी के भीतर एक अलग तरह का असंतोष चल रहा था। रिपोर्टों के मुताबिक, नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायकों के एक समूह ने मंत्रिपरिषद में बड़े बदलाव और सरकार के कामकाज में सुधार की मांग की है।
इस समूह ने अपनी शिकायतों पर ध्यान देने के लिए पार्टी नेतृत्व को सीमित समय दिया है। रिपोर्टों के मुताबिक, यह असंतोष 27 अक्टूबर को हुए कैबिनेट विस्तार और फेरबदल के बाद और तेज हुआ। इस बदलाव के बाद उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार में चार नए मंत्री शामिल किए गए थे।
ऐसे समय में रूहुल्लाह का पार्टी छोड़ना मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के लिए एक और राजनीतिक चुनौती है। अब उन्हें एक तरफ पार्टी के भीतर से उठ रही आलोचना का सामना करना है, वहीं दूसरी तरफ निर्वाचित प्रतिनिधियों के एक वर्ग की नाराजगी भी दूर करनी है।
नई राजनीतिक जमीन तैयार करने का संकेत
रूहुल्लाह के इस्तीफे के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उनका फैसला केवल व्यक्तिगत राजनीतिक कदम तक सीमित रहेगा या इससे नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर असंतोष और बढ़ेगा।
उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि उनका इरादा केवल एक राजनीतिक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होने का नहीं है। इसके बजाय, उन्होंने प्रतिबद्ध युवाओं को साथ लाने और सिद्धांतों, जनकल्याण तथा जवाबदेही पर आधारित एक वैकल्पिक राजनीतिक मंच तैयार करने की बात कही है।
हालांकि, श्रीनगर लोकसभा सीट औपचारिक रूप से तभी खाली मानी जाएगी जब लोकसभा अध्यक्ष उनके संसद से इस्तीफे को स्वीकार करेंगे। यानी इस्तीफे की घोषणा के बावजूद सीट की रिक्ति की औपचारिक प्रक्रिया लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी के बाद पूरी होगी।
रूहुल्लाह का बाहर होना नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए एक अहम राजनीतिक घटनाक्रम है। पार्टी 2024 में जम्मू-कश्मीर में सत्ता में लौटी थी। उसके जनादेश में विशेष दर्जे और राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग शामिल थी।
अब पार्टी नेतृत्व को रूहुल्लाह की ओर से उठाए गए सवालों का जवाब देना होगा। साथ ही, उसे अपने ही विधायकों के बीच बढ़ रहे असंतोष से भी निपटना होगा।
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