अलीगढ़ के राजा महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय में डॉ. कलाम पर विचार गोष्ठी
राजा महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के राजनीति विज्ञान विभाग के ‘फ्री थिंकर्स क्लब’ में भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान वैज्ञानिक एवं शिक्षाविद् डॉ. ए.पी.जे.
राजा महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के राजनीति विज्ञान विभाग के ‘फ्री थिंकर्स क्लब’ में भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान वैज्ञानिक एवं शिक्षाविद् डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की जयंती के अवसर पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नरेंद्र बहादुर सिंह के मार्गदर्शन में हुए इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने डॉ. कलाम के वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जिज्ञासा, सादगी, शिक्षा-दर्शन, नैतिक मूल्यों और राष्ट्र निर्माण से जुड़े विचारों पर गंभीर चर्चा की।
विचार गोष्ठी में डॉ. कलाम के वैज्ञानिक और राष्ट्रीय योगदान के साथ-साथ उनके जीवन के अलग-अलग पहलुओं को भी समझने की कोशिश की गई। विद्यार्थियों ने उनके विचारों को केवल श्रद्धांजलि के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उनके शैक्षणिक दर्शन, सार्वजनिक जीवन, जीवन-मूल्यों और युवाओं को दी गई प्रेरणा का आलोचनात्मक और शैक्षणिक संदर्भों में मूल्यांकन किया।
कार्यक्रम की शुरुआत राशि वर्मा के उद्घाटन संबोधन से हुई। उन्होंने कहा कि डॉ. कलाम के व्यक्तित्व को केवल एक वैज्ञानिक या पूर्व राष्ट्रपति के रूप में देखना उनके व्यापक योगदान को सीमित कर देता है। राशि वर्मा ने उन्हें ज्ञान, कर्म, विनम्रता और राष्ट्र-निर्माण के समन्वय का प्रतीक बताया। उन्होंने विद्यार्थियों को डॉ. कलाम के जीवन से प्रेरणा लेने के लिए प्रेरित किया।
कनिष्क वार्ष्णेय ने डॉ. कलाम के वैज्ञानिक और राष्ट्रीय योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने उनके विचारों में मौजूद Scientific Temperament (वैज्ञानिक दृष्टिकोण) और तर्कशीलता को रेखांकित किया। कनिष्क वार्ष्णेय ने कहा कि डॉ. कलाम के लिए वैज्ञानिक प्रगति केवल तकनीकी उपलब्धि हासिल करने तक सीमित नहीं थी। उनके विचारों में विज्ञान समाज के भीतर तर्क, जिज्ञासा और नवाचार की संस्कृति विकसित करने का माध्यम भी था।
कनिष्क वार्ष्णेय ने डॉ. कलाम के प्रमुख ग्रंथों के संदर्भ में उनके विचारों और जीवन-दृष्टि पर भी चर्चा की। इस दौरान वैज्ञानिक सोच को सवाल पूछने, चीजों को समझने और नई संभावनाओं पर विचार करने से जोड़कर देखा गया। विद्यार्थियों के विमर्श में यह बात सामने आई कि डॉ. कलाम की वैज्ञानिक विरासत को उनके विचारों और समाज के लिए उनकी दृष्टि के साथ समझना जरूरी है।
दिव्या ने “कलाम तुझे सलाम” शीर्षक से भावपूर्ण प्रस्तुति दी। इस प्रस्तुति में डॉ. कलाम के प्रति सम्मान और उनकी प्रेरणादायी विरासत को अभिव्यक्त किया गया। कार्यक्रम में डॉ. कलाम के व्यक्तित्व को याद करते हुए उनके जीवन से जुड़े उन मूल्यों पर भी बात हुई, जो विद्यार्थियों को ज्ञान, सादगी और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
विचार गोष्ठी में डॉ. कलाम के व्यक्तित्व के आलोचनात्मक पक्षों को भी चर्चा का हिस्सा बनाया गया। मेघश्याम ने डॉ. कलाम से संबंधित आलोचनाओं और उनके सार्वजनिक जीवन के अलग-अलग पहलुओं की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि किसी महान व्यक्तित्व का अकादमिक मूल्यांकन केवल प्रशंसा तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसके लिए उसके विभिन्न पक्षों का आलोचनात्मक अध्ययन भी जरूरी है।
मेघश्याम की प्रस्तुति में डॉ. कलाम के सार्वजनिक जीवन को एक व्यापक नजरिये से देखने की कोशिश की गई। चर्चा में यह रेखांकित किया गया कि किसी भी बड़े व्यक्तित्व को समझते समय उसकी उपलब्धियों के साथ उसके विचारों, फैसलों और सार्वजनिक भूमिका से जुड़े सवालों पर भी विचार किया जाना चाहिए। इस तरह डॉ. कलाम की विरासत को सम्मान के साथ-साथ आलोचनात्मक सोच के आधार पर भी समझने का प्रयास किया गया।
पंकज पाठक ने डॉ. कलाम के जीवन-मूल्यों से सीख लेने पर जोर दिया। उन्होंने उनके संघर्षपूर्ण जीवन, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों तथा शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ने की प्रेरणा को विद्यार्थियों के संदर्भ में रखा। उन्होंने बताया कि जीवन की परिस्थितियां किसी व्यक्ति की संभावनाओं को तय नहीं करतीं। दृढ़ संकल्प, शिक्षा और लगातार कोशिश व्यक्ति के भविष्य को आकार देने में अहम भूमिका निभाते हैं।
पंकज पाठक ने डॉ. कलाम के जीवन को इस बात के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा और निरंतर प्रयास के जरिए आगे बढ़ा जा सकता है। उनके विचारों में विद्यार्थियों के लिए यह संदेश दिखाई देता है कि परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन वे व्यक्ति की दिशा और संभावनाओं का अंतिम फैसला नहीं करतीं। दृढ़ संकल्प और सीखने की इच्छा आगे बढ़ने का रास्ता बनाती है।
प्रशांत शर्मा ने डॉ. कलाम के जीवन-दर्शन से जुड़े सवाल को चर्चा के केंद्र में रखा। उन्होंने पूछा, “What will I be remembered for?” इस सवाल के जरिए उन्होंने विद्यार्थियों को यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसके पद, उपलब्धियों या सार्वजनिक प्रसिद्धि से नहीं बनती, बल्कि उसके काम, मूल्यों और समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी से भी बनती है।
प्रशांत शर्मा ने डॉ. कलाम की सादगी और सार्वजनिक जीवन में उनकी प्रतिबद्धता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डॉ. कलाम ने निजी संपत्ति से अधिक ज्ञान और राष्ट्रसेवा को महत्व दिया। शिक्षण के प्रति उनका समर्पण भी उनके जीवन-दर्शन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। इस चर्चा में डॉ. कलाम के जीवन को ज्ञान, सेवा, सादगी और जिम्मेदारी से जोड़कर समझाया गया।
अभिषेक गौतम ने डॉ. कलाम के शैक्षणिक दर्शन की व्याख्या की। उन्होंने जिज्ञासा, सृजनशीलता, नैतिक मूल्यों और स्वतंत्र प्रश्नाकुलता को शिक्षा का आधार बताया। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं होना चाहिए। शिक्षा विद्यार्थियों को सवाल पूछने, विचार करने, सृजन करने और अपने व्यक्तित्व का विकास करने का अवसर भी देनी चाहिए।
अभिषेक गौतम ने डॉ. कलाम की उस दृष्टि को रेखांकित किया, जिसमें कक्षा को केवल सूचना देने की जगह नहीं माना गया। कक्षा को प्रश्न पूछने, सोचने, सृजन करने और व्यक्तित्व निर्माण का लोकतांत्रिक मंच माना गया। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को केवल ‘कारखाने’ की तरह बनाने के बजाय विद्यार्थियों की जिज्ञासा और स्वतंत्र चिंतन को विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया।
लक्ष्मी ने तमिलनाडु के रामेश्वरम से जुड़े डॉ. कलाम के जीवन-प्रसंगों और उनके विद्यालयी जीवन की स्मृतियों के संदर्भ में उनके व्यक्तित्व को समझने का प्रयास किया। उन्होंने पक्षियों के अवलोकन और प्रकृति से सीखने जैसे प्रसंगों के जरिए बताया कि सीखने की प्रक्रिया केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होती। प्रकृति, अनुभव और जिज्ञासा भी जीवन के महत्वपूर्ण शिक्षक हैं।
लक्ष्मी ने निजी अनुभवों के माध्यम से डॉ. कलाम की सादगीपूर्ण जीवनशैली और जीवन-दर्शन की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उनकी प्रस्तुति में रामेश्वरम से जुड़े प्रसंगों, विद्यालयी जीवन की स्मृतियों और प्रकृति से मिलने वाली सीख को डॉ. कलाम के व्यक्तित्व से जोड़कर देखा गया। इस चर्चा में सीखने को किताबों के साथ-साथ अनुभव और आसपास की दुनिया से जोड़ने पर जोर रहा।
कार्यक्रम के समापन की ओर राशि वर्मा ने Guiding Souls: Dialogues of Life तथा डॉ. कलाम और अरुण तिवारी से संबंधित संदर्भों के माध्यम से उनके व्यक्तित्व, जीवन-दृष्टि और प्रेरणादायी संवादों पर चर्चा की। उन्होंने डॉ. कलाम को विद्यार्थियों के लिए केवल एक आदर्श व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि लगातार सीखने, सवाल करने, सृजन करने और समाज के प्रति जिम्मेदार बने रहने की प्रेरणा के स्रोत के रूप में प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने डॉ. कलाम के जीवन को श्रद्धांजलि देने के साथ-साथ उनके विचारों का आलोचनात्मक, शैक्षणिक और समकालीन संदर्भों में मूल्यांकन किया। चर्चा में उनके पदों और उपलब्धियों के साथ उनकी वास्तविक विरासत को भी समझने की कोशिश की गई। विद्यार्थियों ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सादगी, ज्ञान के प्रति प्रतिबद्धता, शिक्षा में जिज्ञासा और युवाओं में आत्मविश्वास को उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।
विचार गोष्ठी का केंद्रीय निष्कर्ष यह रहा कि डॉ. कलाम की वास्तविक विरासत उनके पदों और उपलब्धियों से कहीं आगे है। वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सादगी, ज्ञान के प्रति प्रतिबद्धता, शिक्षा में जिज्ञासा, युवाओं में आत्मविश्वास और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व में दिखाई देती है। विद्यार्थियों के विमर्श में डॉ. कलाम का जीवन सीखने, प्रश्न करने, सृजन करने और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा के रूप में सामने आया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राजा महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय में किस अवसर पर विचार गोष्ठी हुई?
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की जयंती के अवसर पर विचार गोष्ठी आयोजित की गई।
विचार गोष्ठी का आयोजन किस विभाग ने किया?
कार्यक्रम का आयोजन राजनीति विज्ञान विभाग के ‘फ्री थिंकर्स क्लब’ ने किया।
गोष्ठी में डॉ. कलाम के किन विचारों पर चर्चा हुई?
विद्यार्थियों ने उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जिज्ञासा, सादगी, शिक्षा-दर्शन, नैतिक मूल्यों और राष्ट्र निर्माण से जुड़े विचारों पर चर्चा की।
कार्यक्रम में डॉ. कलाम के योगदान का मूल्यांकन कैसे किया गया?
उनके योगदान और जीवन को श्रद्धांजलि के साथ-साथ आलोचनात्मक और शैक्षणिक नजरिये से भी समझने की कोशिश की गई।
‘कलाम तुझे सलाम’ प्रस्तुति किसने दी?
‘कलाम तुझे सलाम’ शीर्षक से भावपूर्ण प्रस्तुति दिव्या ने दी।
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