कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला: सहखातेदारी का हक केवल पैतृक संपत्तियों पर
सहखातेदारी का हक सिर्फ पैतृक संपत्ति पर, खुद की कमाई हुई संपत्ति पर नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट बॉडी: सिर्फ पैतृक संपत्तियों पर सहखातेदारी का हक, कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने
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सिर्फ पैतृक संपत्तियों पर सहखातेदारी का हक, कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला
बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने साफ किया है कि हिंदू कानून के तहत सहखातेदारी का हक केवल पैतृक संपत्तियों पर लागू होता है, खुद की अर्जित संपत्तियों पर नहीं। यह फैसला एक मामले में आया, जिसमें एक महिला ने अपने दादा की संपत्तियों में हिस्सा मांगा था।
जस्टिस डीके सिंह और जस्टिस टीएम नदाफ की डिवीजन बेंच ने उषा एन स्वामी की अपील को खारिज कर दिया। उषा ने अपने दादा मुनियप्पा की संपत्तियों में हिस्सा मांगा था। कोर्ट ने कहा कि हिंदू कानून के तहत जन्म से मिलने वाला हक केवल पैतृक संयुक्त परिवार की संपत्तियों पर होता है, न कि खुद अर्जित संपत्तियों पर।
16 जून को दिए गए फैसले में कोर्ट ने समझाया कि हिंदू कानून के मुताबिक, किसी व्यक्ति के बेटे, पोते और परपोते को जन्म से हक तभी मिलता है जब संपत्ति तीन पीढ़ियों के पितृ पक्ष से विरासत में मिली हो या 9 सितंबर 2005 को संशोधित हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 के तहत हस्तांतरित हुई हो।
उषा, जिनकी शादी 1979 में हुई और जो अब इलिनॉय, अमेरिका में रहती हैं, ने 2014 में सिविल केस दायर किया। उन्होंने दावा किया कि 107 एकड़ जमीन (कन्नयाना अग्रहार गांव, अनेकल तालुक), जयनगर 4th टी ब्लॉक में एक साइट, केंगेरी होबली में कृषि भूमि और पट्टाभिरामा नगर में एक घर उनके दादा की पैतृक संपत्तियां हैं, जिन पर उनका सहखातेदारी का हक है।
यह केस उनके पिता एम वेंकटस्वामी द्वारा 10 एकड़ जमीन बेचने के बाद दायर किया गया था। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि ये संपत्तियां पैतृक नहीं बल्कि खुद अर्जित थीं। इसलिए, उषा का दावा कानून के तहत मान्य नहीं है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सहखातेदारी का हक किस तरह की संपत्तियों पर लागू होता है?
कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के मुताबिक, हिंदू कानून के तहत सहखातेदारी का हक केवल पैतृक संपत्तियों पर लागू होता है। खुद की अर्जित संपत्तियों पर इस हक का कोई दावा नहीं हो सकता।
किसी को जन्म से सहखातेदारी का हक कब मिलता है?
हिंदू कानून के मुताबिक, किसी व्यक्ति के बेटे, पोते और परपोते को जन्म से सहखातेदारी का हक तभी मिलता है जब संपत्ति तीन पीढ़ियों के पितृ पक्ष से विरासत में मिली हो या 9 सितंबर 2005 को संशोधित हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 के तहत हस्तांतरित हुई हो।
इस फैसले में क्या विवाद था?
उषा एन स्वामी ने अपने दादा की 107 एकड़ जमीन और कई संपत्तियों में हिस्सा मांगा था। कोर्ट ने पाया कि ये संपत्तियां दादा द्वारा खुद अर्जित की गई थीं, पैतृक नहीं। इसलिए कोर्ट ने उषा की अपील खारिज कर दी।
यह फैसला कब दिया गया?
कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस डीके सिंह और जस्टिस टीएम नदाफ की बेंच ने यह फैसला 16 जून को दिया।
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