आईपीएस अनुराग सुजानिया के इस्तीफे से अवैध शराब पर सवाल तेज
जहरीली शराब कांडों के बाद सरकारी तंत्र पर सवाल मध्यप्रदेश में अवैध और जहरीली शराब के कारोबार को लेकर सरकारी सिस्टम पर सवाल तेज हो गए हैं।
जहरीली शराब कांडों के बाद सरकारी तंत्र पर सवाल
मध्यप्रदेश में अवैध और जहरीली शराब के कारोबार को लेकर सरकारी सिस्टम पर सवाल तेज हो गए हैं। 100 मौतों के बाद भी शराब माफिया के नेटवर्क पर रोक नहीं लगने और अधिकारी-कर्मचारियों की कथित मिलीभगत को लेकर बहस छिड़ी है। मुरैना और सागर में जहरीली शराब से हुई मौतों के मामलों के बीच IPS अधिकारी अनुराग सुजानिया के इस्तीफे ने प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल खड़े किए हैं।
अनुराग सुजानिया के इस्तीफे के बाद RTI एक्टिविस्ट डॉ. आनंद राय ने अपनी फेसबुक वॉल के जरिए इस पूरे मामले पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आबकारी विभाग से लेकर पुलिस प्रशासन तक की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। अपनी टिप्पणी में आनंद राय ने यह सवाल भी उठाया कि क्या आबकारी से लेकर पुलिस तक अवैध कारोबार में साइलेंट पार्टनर हैं?
आनंद राय की पोस्ट के बाद अवैध शराब के कारोबार, सरकारी निगरानी और कथित राजनीतिक संरक्षण को लेकर नई बहस शुरू हुई है। उनकी पोस्ट में रसूखदार अधिकारियों और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के रिश्तेदारों तक की कथित हिस्सेदारी का जिक्र किया गया है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और जांच होना अभी बाकी है।
आबकारी विभाग की मौजूदगी के बावजूद अवैध कारोबार पर सवाल
आनंद राय ने अपनी पोस्ट में कहा है कि प्रदेश में शराब की बिक्री और अवैध कारोबार पर नियंत्रण की जिम्मेदारी आबकारी विभाग की है। इसके बावजूद विभाग अपनी भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों से बच नहीं सकता। उन्होंने DEO से लेकर आबकारी आयुक्त स्तर तक के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।
उनकी पोस्ट में कथित तौर पर अवैध शराब के कारोबार में अधिकारियों की हिस्सेदारी और संरक्षण दिए जाने के आरोप लगाए गए हैं। आनंद राय ने यह भी आरोप लगाया है कि कुछ रसूखदार अधिकारी और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के रिश्तेदार इस तरह के कथित कारोबार में हिस्सेदार हो सकते हैं। इन आरोपों को लेकर स्वतंत्र जांच और ठोस पुष्टि अभी बाकी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रदेश में आबकारी विभाग का पूरा अमला मौजूद है, तब अवैध शराब का कारोबार लगातार कैसे फल-फूल रहा है। शराब की बिक्री और परिवहन पर नियंत्रण के लिए नियम-कानून भी बने हुए हैं। इसके बावजूद यदि अवैध शराब की बिक्री और परिवहन जारी है, तो सवाल निगरानी व्यवस्था पर उठता है।
आनंद राय ने अपनी टिप्पणी में पूछा है कि क्या विभाग को अवैध शराब के कारोबार की जानकारी नहीं मिलती, या फिर निगरानी व्यवस्था में ही कोई गंभीर खामी है। यह सवाल इसलिए भी उठाया गया है क्योंकि शराब के अवैध कारोबार को रोकने की जिम्मेदारी सरकारी विभागों के पास है।
उन्होंने यह आरोप भी लगाया है कि कुछ जगहों पर अवैध शराब के कारोबार में पुलिस की भूमिका संदिग्ध रहती है। आनंद राय का कहना है कि अगर पुलिस पूरी सख्ती से कार्रवाई करे, तो अवैध शराब की बिक्री और परिवहन पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है।
इस तरह, बहस केवल शराब माफिया तक सीमित नहीं है। सवाल उस सरकारी तंत्र पर भी है, जिसकी जिम्मेदारी अवैध कारोबार को रोकने की है। आनंद राय की टिप्पणी में आबकारी विभाग और पुलिस प्रशासन, दोनों की निगरानी और कार्रवाई को लेकर जवाबदेही तय करने की मांग दिखाई देती है।
खातेगांव शराब कांड में चार TI की तैनाती पर सवाल
आनंद राय की पोस्ट में खातेगांव शराब कांड का भी खास तौर पर जिक्र किया गया है। उन्होंने सवाल उठाया है कि जब अवैध शराब पर कार्रवाई के लिए आबकारी विभाग मौजूद है, तब गुजरात जा रहे आयशर वाहन को पकड़ने के लिए पुलिस विभाग के चार थाना प्रभारियों यानी TI को क्यों तैनात करना पड़ा।
उनके मुताबिक, इन चार थाना प्रभारियों को कानून-व्यवस्था और अपराध नियंत्रण की जिम्मेदारी छोड़कर इस कार्रवाई में लगाया गया। इसी बिंदु पर उन्होंने आबकारी विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़ा किया है।
आनंद राय की टिप्पणी में यह भी पूछा गया है कि जिस तरह की मुस्तैदी इस कार्रवाई में दिखाई गई, वैसी तत्परता हत्या, दुष्कर्म के आरोपियों और संगठित अपराध से जुड़े अपराधियों को पकड़ने में क्यों नहीं दिखाई देती। उन्होंने सवाल किया है कि अवैध शराब के परिवहन को रोकने के लिए अलग-अलग स्तर पर इतनी बड़ी पुलिस कार्रवाई की जरूरत क्यों पड़ी।
उनकी पोस्ट के अनुसार, यदि आबकारी विभाग शराब की बिक्री और परिवहन पर निगरानी के लिए जिम्मेदार है, तो पुलिस के चार TI को इस कार्रवाई में क्यों लगाना पड़ा, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए। इसी के साथ यह भी सवाल उठता है कि क्या आबकारी विभाग की मौजूदा निगरानी व्यवस्था पर्याप्त नहीं थी।
यह पूरा सवाल आनंद राय की फेसबुक पोस्ट में उठाया गया है। इन आरोपों और सवालों के आधार पर किसी विभाग या अधिकारी की भूमिका को तय तथ्य के रूप में नहीं कहा जा सकता। स्रोत में भी इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और जांच बाकी होने की बात कही गई है।
सरिए के परिवहन और GST चोरी के आरोप
आनंद राय ने अपनी पोस्ट में सवाल केवल शराब कारोबार तक सीमित नहीं रखे। उन्होंने रायपुर और महाराष्ट्र से इंदौर की लोहा मंडी तक कथित तौर पर अवैध रूप से सरिया पहुंचाने और बड़े पैमाने पर GST चोरी होने के आरोप भी लगाए हैं।
उन्होंने सवाल किया है कि अगर परिवहन के दौरान बिल्टी और ट्रांजिट परमिट यानी TP की जांच की जाए, तो ऐसे कारोबार पर कार्रवाई क्यों नहीं होती। इस सवाल के जरिए उन्होंने अवैध परिवहन की निगरानी और उससे जुड़े विभागों की भूमिका पर भी ध्यान खींचा है।
आनंद राय की पोस्ट में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो मामला केवल आबकारी विभाग या पुलिस की निष्क्रियता तक सीमित नहीं रहेगा। ऐसी स्थिति में वाणिज्यिक कर और परिवहन विभाग की निगरानी व्यवस्था भी जांच के दायरे में आ सकती है।
हालांकि, यहां भी आरोपों को लेकर स्वतंत्र जांच और पुष्टि का सवाल बना हुआ है। उपलब्ध सामग्री में यह नहीं कहा गया है कि इन आरोपों पर किसी विभाग ने कार्रवाई की है या किसी जांच का नतीजा सामने आया है। इसलिए रायपुर, महाराष्ट्र और इंदौर की लोहा मंडी से जुड़े आरोपों को आनंद राय की पोस्ट में लगाए गए आरोप के रूप में ही देखा जाना है।
कप्तान बदलते ही अवैध कारोबारियों की एंट्री का दावा
आनंद राय की पोस्ट में पुलिस प्रशासन की कार्यशैली को लेकर सबसे गंभीर आरोप लगाया गया है। उन्होंने दावा किया है कि जब भी किसी जिले में नया पुलिस कप्तान आता है, तो वह अवैध कारोबारियों पर कार्रवाई करके अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है।
इसके बाद, उनकी पोस्ट के अनुसार, कथित तौर पर नए सिरे से अवैध धंधों की एंट्री और संरक्षण का खेल शुरू हो जाता है। आनंद राय ने यह आरोप लगाया है कि पुलिस कप्तान बदलने के साथ अवैध कारोबार के खिलाफ कार्रवाई और उसके बाद संरक्षण की स्थिति बदलती रहती है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अगर कोई पुलिस कप्तान अवैध कारोबार के खिलाफ ज्यादा सख्ती दिखाता है, तो प्रभावशाली माफिया उसे पद से हटवाने तक की ताकत रखते हैं। यह दावा पुलिस प्रशासन, अवैध कारोबार और प्रभावशाली लोगों के बीच कथित संबंधों की ओर इशारा करता है।
हालांकि, इन दावों की पुष्टि के लिए स्वतंत्र जांच और ठोस साक्ष्य जरूरी हैं। उपलब्ध सामग्री में किसी खास पुलिस कप्तान, किसी खास माफिया या किसी खास जिले में इस दावे को साबित करने वाला अलग विवरण नहीं दिया गया है। इसलिए यह बात आनंद राय के दावे के रूप में ही सामने आती है।
अनुराग सुजानिया के इस्तीफे से बढ़ी जवाबदेही की बहस
IPS अधिकारी अनुराग सुजानिया के इस्तीफे के घटनाक्रम ने पहले ही प्रदेश के पुलिस प्रशासन और सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। सुजानिया को हाल ही में AIG की जिम्मेदारी दी गई थी। इससे पहले वे सागर के पुलिस अधीक्षक पद पर थे।
मुरैना और सागर में जहरीली शराब से हुई मौतों के मामलों के बीच उनके इस्तीफे ने प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर बहस तेज कर दी है। इसी वजह से यह सवाल उठ रहा है कि जहरीली शराब से मौतों के बाद सरकारी तंत्र में जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी।
अनुराग सुजानिया के इस्तीफे को लेकर स्रोत सामग्री में इससे आगे कोई अलग कारण नहीं बताया गया है। इसलिए इस्तीफे को किसी खास आरोप, कारण या प्रशासनिक फैसले से जोड़कर नहीं कहा जा सकता। उपलब्ध जानकारी में इतना ही है कि उनके इस्तीफे के बाद पुलिस प्रशासन और सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं।
डॉ. आनंद राय की फेसबुक पोस्ट ने इस बहस को नया आयाम दिया है। अब चर्चा केवल एक अधिकारी के इस्तीफे तक सीमित नहीं है। सवाल उस पूरी व्यवस्था का है, जिसमें अवैध शराब के कारोबार को रोकने की जिम्मेदारी आबकारी विभाग, पुलिस और संबंधित विभागों पर है।
सरकार के सामने पांच बड़े सवाल
इस पूरे मामले में सरकार के सामने पांच बड़े सवाल रखे गए हैं।
पहला सवाल है कि जहरीली शराब से मौतों के बाद आबकारी विभाग की जवाबदेही किस स्तर पर तय होगी।
दूसरा सवाल यह है कि अवैध शराब के कारोबार में अधिकारियों और रसूखदार लोगों की कथित हिस्सेदारी के आरोपों की निष्पक्ष जांच कब होगी।
तीसरा सवाल है कि आबकारी विभाग की मौजूदगी के बावजूद पुलिस के चार TI को कार्रवाई में क्यों लगाना पड़ा।
चौथा सवाल जिला स्तर की निगरानी व्यवस्था को लेकर है। अवैध शराब के परिवहन और बिक्री पर रोक लगाने के लिए यह व्यवस्था कितनी प्रभावी है, इसका जवाब भी मांगा गया है।
पांचवां सवाल यह है कि अगर किसी जिले में अधिकारी माफिया के दबाव में काम करने को मजबूर हैं, तो ऐसे मामलों में सरकार की जवाबदेही कौन तय करेगा।
इन सवालों के साथ यह मुद्दा भी उठाया गया है कि जहरीली शराब बेचने वालों के साथ-साथ उस सरकारी सिस्टम की भूमिका की जांच होनी चाहिए, जिसके जिम्मे अवैध कारोबार पर रोक लगाना और लोगों की जान बचाना है।
यदि विभागों की निगरानी के बावजूद अवैध कारोबार फलता-फूलता रहा और जहरीली शराब से मौतें होती रहीं, तो जवाबदेही केवल छोटे तस्करों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उपलब्ध सामग्री में सरकार से आबकारी, पुलिस और संबंधित विभागों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है।
वरना, इस आरोप के मुताबिक, हर बड़े शराब कांड के बाद कुछ कार्रवाइयां होंगी, अधिकारी बदलेंगे और इस्तीफे होंगे, लेकिन मौतों के पीछे खड़ा कथित नेटवर्क जस का तस बना रहेगा।
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