इमरान खान बोले, सिंगल डैड होने से पैरेंट्स का भरोसा नहीं मिलता
इमरान खान ने कहा, सिंगल डैड होने के कारण पैरेंट्स मुझ पर भरोसा करने से हिचकते हैं, एक्सपर्ट ने दी राय सिंगल फादर्स की चुनौतियों पर कम ही बात होती है, क्योंकि पैरेंटिंग पर चर्चा ज्यादातर मांओं के
सिंगल फादर्स की चुनौतियों पर कम ही बात होती है, क्योंकि पैरेंटिंग पर चर्चा ज्यादातर मांओं के इर्द-गिर्द घूमती है। एक्टर इमरान खान ने हाल ही में अपनी बेटी इमारा की परवरिश में आने वाली मुश्किलों के बारे में खुलकर बात की। इमरान अपनी एक्स-वाइफ अवंतिका मलिक के साथ को-पैरेंटिंग कर रहे हैं। परिणीति चोपड़ा के शो मॉम टॉक्स पर इमरान ने बताया कि कैसे वे अपनी बेटी के लिए एक सामान्य सामाजिक माहौल बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन इसमें कई इमोशनल और सोशल अड़चनें आती हैं।
इमरान ने एक निजी किस्सा शेयर करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने इमारा के लिए प्लेडेट्स अरेंज करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें बार-बार रिजेक्शन का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा, "इमारा मुझसे कहती थी, ‘क्या आप इस दोस्त से पूछ सकते हैं कि वो खेलने आ सकता है?’ तो मैं नंबर ढूंढकर एक मां को मैसेज करता: ‘क्या फलां-फलां आ सकते हैं खेलने?’ और जवाब आता, ‘सॉरी, आज नहीं।’ अगले हफ्ते फिर पूछता: ‘हाय, क्या हम कर सकते हैं?’ और फिर वही जवाब, ‘नहीं, आज नहीं।’" धीरे-धीरे इमरान को महसूस हुआ कि इन मना करने वालों के पीछे कोई गहरी असहजता है।
इमरान ने बताया कि कुछ पैरेंट्स, खासकर मांएं, अपने बच्चों को ऐसे घर भेजने में सहज महसूस नहीं करतीं जहां सिर्फ एक सिंगल आदमी रहता हो। उन्होंने कहा, "मैं एक आदमी हूं, और मैं पिता हूं, लेकिन अब मैं तलाकशुदा हूं, तो घर में कोई महिला नहीं है।" उन्होंने माना कि समाज में कई ऐसे पुरुष हैं जो भरोसेमंद नहीं होते, इसलिए इस सोच को समझा जा सकता है। लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि इस स्थिति ने उन्हें और उनकी बेटी को भावनात्मक रूप से झकझोर दिया। "ये दिल तोड़ने वाला था क्योंकि हर हफ्ते मुझे अपनी बेटी से कहना पड़ता था, ‘सॉरी, तुम्हारा दोस्त नहीं आ सकता,’" उन्होंने बताया।
सिंगल फादर्स की चुनौतियों पर बात करते हुए इमरान ने कहा कि महिलाओं के मुकाबले पुरुषों के पास इमोशनल सपोर्ट सिस्टम कम होता है। उन्होंने कहा, "सिंगल मदर्स के पास मजबूत सपोर्ट नेटवर्क होता है, लेकिन पुरुषों को समाज की मर्दानगी वाली उम्मीदों के कारण दिक्कत होती है। ‘मर्द मजबूत होते हैं, मर्द ऐसे नहीं होते।’ इस सोच के चलते पुरुष अपनी कमजोरियों को जाहिर नहीं कर पाते।"
काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट अथुल राज ने बताया कि भारत में सिंगल फादर्स को अक्सर समाज के पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा, "केयरगिविंग को अब भी इमोशनली मांओं से जोड़ा जाता है। जब कोई पिता प्राइमरी पैरेंट बनता है, तो लोग सहज नहीं हो पाते। इसमें झिझक, दूरी या बिना बोले एक शक होता है, जो समझाना मुश्किल है लेकिन महसूस करना आसान।" राज ने कहा कि इस वजह से सिंगल फादर्स इमोशनली थकान महसूस कर सकते हैं और कई बार सोशल सिचुएशन्स से दूरी बना लेते हैं।
राज ने बच्चों पर पड़ने वाले असर के बारे में भी बात की। उन्होंने कहा, "बच्चे जल्दी समझ जाते हैं कि इनविटेशन आना बंद हो गए हैं या दोस्ती सिर्फ स्कूल तक सीमित रह गई है। कई बार वे सोचने लगते हैं कि क्या उनका परिवार दूसरों से कम स्वीकार्य है। ये भावना उनके आत्मविश्वास, सामाजिक जुड़ाव और खुद को देखने के तरीके पर असर डाल सकती है।"
राज ने सलाह दी कि पैरेंट्स को बच्चों की रिजेक्शन वाली फीलिंग्स को समझना चाहिए, न कि उन्हें नजरअंदाज करना चाहिए। उन्होंने कहा, "बच्चों को ऐसे एडल्ट्स चाहिए जो उनके साथ इस निराशा को बिना शर्मिंदगी के प्रोसेस करने में मदद करें।" उन्होंने ये भी कहा कि बच्चों के लिए ऐसे विकल्प तैयार करना, जहां वे शामिल महसूस करें—चाहे वो एक भरोसेमंद दोस्त हो, करीबी कजिन हो, या सपोर्टिव होम एनवायरनमेंट—उनके आत्मसम्मान को काफी बढ़ा सकता है।
इमरान की ये खुलकर की गई बातें सिंगल फादर्स की अनदेखी की जाने वाली मुश्किलों को उजागर करती हैं। ये चर्चा इस बात पर ध्यान खींचती है कि मॉडर्न पैरेंटिंग की जटिलताओं से जूझ रहे सभी पैरेंट्स के लिए ज्यादा समझ और सपोर्ट की जरूरत है।
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