औरैया पंचमुखी मंदिर हत्याकांड में पूर्व विधान परिषद सदस्य समेत 10 को उम्रकैद
औरैया में एक पुराने डबल मर्डर केस में आज बड़ा फैसला आया है। जिला एवं सत्र न्यायालय ने पंचमुखी मंदिर हत्याकांड में पूर्व समाजवादी पार्टी के विधान परिषद सदस्य कमलेश पाठक समेत 10 दोषियों को उम्रकैद की
औरैया में एक पुराने डबल मर्डर केस में आज बड़ा फैसला आया है। जिला एवं सत्र न्यायालय ने पंचमुखी मंदिर हत्याकांड में पूर्व समाजवादी पार्टी के विधान परिषद सदस्य कमलेश पाठक समेत 10 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत ने सभी दोषियों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
यह मामला 15 मार्च 2020 का है जब औरैया के पंचमुखी मंदिर परिसर में वकील मंजुल चौबे और उनकी चचेरी बहन सुधा चौबे की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड ने उस वक्त पूरे इलाके में सनसनी फैला दी थी। घटना के बाद पुलिस ने कमलेश पाठक समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया था।
इस केस की सुनवाई छह साल पांच महीने से चल रही थी। अदालत में 900 से ज्यादा तारीखें पड़ीं और आज जाकर फैसला आया। मुकदमे के दौरान 72 गवाहों ने अपनी गवाही दी। गवाहों के बयान और सबूतों के आधार पर अदालत ने सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
यह फैसला पीड़ित परिवार के लिए लंबे इंतजार के बाद न्याय की जीत माना जा रहा है। पूर्व विधायक जैसे प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ सजा से यह साफ होता है कि कानून सबके लिए बराबर है। अदालत के इस फैसले को कानून व्यवस्था के लिए एक मजबूत संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
औरैया पंचमुखी मंदिर हत्याकांड में कितने लोगों को उम्रकैद की सजा मिली?
इस केस में कुल 10 दोषियों को उम्रकैद की सजा मिली है। इनमें पूर्व समाजवादी पार्टी के विधान परिषद सदस्य कमलेश पाठक भी शामिल हैं। अदालत ने सभी को 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
यह हत्याकांड कब हुआ था और किन लोगों की हत्या की गई?
यह घटना 15 मार्च 2020 को औरैया के पंचमुखी मंदिर परिसर में हुई थी। इसमें वकील मंजुल चौबे और उनकी चचेरी बहन सुधा चौबे की हत्या कर दी गई थी।
इस केस की सुनवाई में कितना समय लगा?
इस मुकदमे की सुनवाई छह साल पांच महीने तक चली। अदालत में 900 से ज्यादा तारीखें पड़ीं। इस दौरान 72 गवाहों ने अपनी गवाही दी।
अदालत के फैसले का क्या महत्व है?
यह फैसला दिखाता है कि कानून सब के लिए बराबर है, भले ही कोई पूर्व विधायक जैसा प्रभावशाली व्यक्ति हो। इसे कानून व्यवस्था के लिए एक मजबूत संदेश माना जा रहा है।
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