पूर्व माओवादी अब नई जिंदगी की ओर, सरकार दे रही मदद
पूर्व माओवादी, हिंसा छोड़ अब नई जिंदगी की ओर आंध्र प्रदेश के पोलावरम जिले में, पूर्व माओवादी समाज में फिर से अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
आंध्र प्रदेश के पोलावरम जिले में, पूर्व माओवादी समाज में फिर से अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। सालों तक हथियार उठाने के बाद जब उन्होंने आत्मसमर्पण किया, तो हिंसा का दौर खत्म हुआ। लेकिन स्थिर जिंदगी बनाने की राह में अब भी कई मुश्किलें हैं। सरकार की ओर से आर्थिक मदद और स्किल ट्रेनिंग जैसे पुनर्वास कार्यक्रम चल रहे हैं, लेकिन सामाजिक और आर्थिक परेशानियां अभी भी बनी हुई हैं।
परिवर्तन की कहानियां: इडिमी और लक्ष्मैया
मडकम इडुमम्मा, जिन्हें इडिमी के नाम से जाना जाता है, इस बदलाव की एक मिसाल हैं। 16 साल की उम्र में प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) में शामिल हुईं। उन्होंने चारला-सबरी एरिया कमेटी के लिए .303 राइफल के साथ पांच साल तक आंध्र प्रदेश-तेलंगाना-छत्तीसगढ़ के दुर्गम इलाकों में काम किया। मार्च 2022 में उन्होंने आत्मसमर्पण किया। आज वह अपनी नई जिंदगी को संजो रही हैं और अपनी बेटी सारन्या के जन्म से बेहद खुश हैं। इडिमी कहती हैं कि अब वह अपने समुदाय में स्वीकार की जाती हैं और बिना किसी डर के लोकल मार्केट जाती हैं।
इसी तरह, 2019 में आत्मसमर्पण करने वाले दिर्धा लक्ष्मैया भी अपनी जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। 16 साल की उम्र में माओवादी बने लक्ष्मैया अब आंध्र प्रदेश-छत्तीसगढ़ सीमा के जंगलों में अपनी तीन एकड़ की जमीन पर खेती करते हैं। वह अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने या स्किल ट्रेनिंग के जरिए रोजगार पाने की उम्मीद रखते हैं। उनका सपना है कि अगर मौका मिले तो वह टूरिस्ट गाइड बनें।
सरकार की पुनर्वास योजनाएं
आंध्र प्रदेश सरकार ने 2013 में शुरू की गई "सरेंडर-कम-रिहैबिलिटेशन स्कीम" के तहत पुनर्वास कार्यक्रम को तेज किया है। उच्च रैंक के माओवादियों को आत्मसमर्पण पर ₹2.5 लाख और निचले स्तर के सदस्यों को ₹1.5 लाख दिए जाते हैं। तीन साल तक ₹4,000 का मासिक वजीफा और हथियार सौंपने पर अतिरिक्त प्रोत्साहन भी दिया जाता है।
जनवरी 2024 से मार्च 2026 के बीच 118 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति के सदस्य चेल्लूरी नारायण राव जैसे बड़े नेता भी शामिल हैं। राज्य सरकार ने अब तक ₹1.2 करोड़ का मुआवजा दिया है और जून 2027 तक ₹1 करोड़ और आवंटित करने की योजना है।
पुनर्वास में चुनौतियां
इन प्रयासों के बावजूद, पुनर्वास का सफर आसान नहीं है। खासकर निचले स्तर के माओवादी, जो अक्सर अपने हक की जानकारी नहीं रखते, उनके लिए यह और मुश्किल है। आत्मसमर्पण करने वाले कई माओवादियों के पास करियर विकल्प सीमित हैं, और उनके गांवों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है। पंगुट्टा जैसे गांव, जो माओवादी भर्ती के लिए कुख्यात हैं, आज भी स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।
इन समस्याओं को हल करने के लिए प्रशासन प्राइवेट कंपनियों के साथ मिलकर रोजगार के मौके पैदा कर रहा है। पाडेरू, रामपचोडावरम और चिंतूर जैसे इलाकों में विशेष रोजगार मेले आयोजित किए जा रहे हैं। महिला माओवादियों को स्किल ट्रेनिंग और स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
नागरिक अधिकारों की बहाली
पुनर्वास सिर्फ आर्थिक मदद और रोजगार तक सीमित नहीं है। अधिकारी आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के नागरिक अधिकार बहाल करने पर भी काम कर रहे हैं, जैसे वोटर रजिस्ट्रेशन। जो लोग छह महीने तक किसी इलाके में रहते हैं, उन्हें सामान्य निवासी मानकर वोटर लिस्ट में शामिल किया जा रहा है। उंगैया जैसे लोगों के लिए यह समाज में अपनी जगह वापस पाने की दिशा में एक अहम कदम है।
लंबा और कठिन सफर
आत्मसमर्पण के साथ भले ही हिंसा का दौर खत्म हो गया हो, लेकिन स्थिरता की राह लंबी और अनिश्चित है। शिक्षा, रोजगार और नागरिक अधिकारों के बीच की खाई को पाटने की कोशिशें जारी हैं। लेकिन पुनर्वास की चुनौतियां यह दिखाती हैं कि संघर्ष से शांति की ओर बढ़ना कितना जटिल है।
स्रोत: The Hindu
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पूर्व माओवादी क्या कर रहे हैं?
पूर्व माओवादी समाज में फिर से अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं और सरकार से मदद ले रहे हैं।
सरकार की पुनर्वास योजनाएं क्या हैं?
सरकार ने 'सरेंडर-कम-रिहैबिलिटेशन स्कीम' के तहत आर्थिक मदद और स्किल ट्रेनिंग जैसे कार्यक्रम चलाए हैं।
इडिमी की कहानी क्या है?
इडिमी ने 16 साल की उम्र में माओवादी बनकर पांच साल तक काम किया, फिर आत्मसमर्पण कर नई जिंदगी शुरू की।
लक्ष्मैया का सपना क्या है?
लक्ष्मैया अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करके टूरिस्ट गाइड बनने का सपना देख रहे हैं।
पुनर्वास में क्या चुनौतियां हैं?
पुनर्वास में निचले स्तर के माओवादियों के लिए करियर विकल्प सीमित हैं और बुनियादी सुविधाओं की कमी है।
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