चंदौसी में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया अहोई अष्टमी पर्व
चंदौसी में श्रद्धा और उल्लास से मनाई गई अहोई अष्टमी रजत मल्होत्रा की रिपोर्ट के मुताबिक, चंदौसी और पूरे क्षेत्र में कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला अहोई अष्टमी का पर्व इस
रजत मल्होत्रा की रिपोर्ट के मुताबिक, चंदौसी और पूरे क्षेत्र में कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला अहोई अष्टमी का पर्व इस बार भी श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। इस मौके पर माताओं ने अपनी संतानों की लंबी उम्र, रक्षा, सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हुए दिनभर निर्जला व्रत रखा।
अहोई अष्टमी को लेकर सुबह से ही घरों में पूजा की तैयारियां शुरू हो गई थीं। महिलाओं ने स्नान आदि करने के बाद अहोई माता का चित्र दीवार पर स्थापित किया। इसके बाद उन्होंने विधि-विधान से अहोई माता की पूजा की और संतान की रक्षा तथा उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
दिनभर निर्जला व्रत रखने के बाद शाम के समय महिलाओं ने एकत्र होकर अहोई माता की पौराणिक कथा सुनी। कथा के दौरान अहोई माता के महत्व और संतान की रक्षा के संकल्प को दोहराया गया। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और सच्चे मन से अहोई माता की पूजा करने से संतान पर आने वाले सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है।
करवा चौथ के साथ पड़ रहे इस संयोग के चलते कई सुहागिन महिलाओं ने पति की लंबी उम्र के लिए भी व्रत रखा। महिलाओं ने सोलह श्रृंगार किया। उन्होंने हाथों में मेहंदी रचाई, नई साड़ियां पहनीं और पूजा की थाली सजाई। इस दौरान घरों में पूजा की तैयारियों और व्रत से जुड़ी रस्मों का माहौल बना रहा।
देर रात चांद के दीदार करने के बाद महिलाओं ने छत पर जाकर चांद को अर्घ्य दिया। इसके बाद उन्होंने पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत का पारण किया। अहोई अष्टमी और करवा चौथ के साथ पड़ रहे इस संयोग के चलते पूजा और व्रत को लेकर महिलाओं में खास उत्साह दिखाई दिया।
तस्वीर में एक दंपति पारंपरिक परिधान में पूजा की थाली के साथ नजर आ रहा है। महिला ने सुंदर बनारसी साड़ी, चूड़ियां और सोलह श्रृंगार धारण किया हुआ है। उसके हाथ में पूजा की थाली है। थाली में करवा, जलता हुआ दीया, फल और अन्य पूजन सामग्री रखी है।
तस्वीर में पति फूलों की माला पहने पत्नी के साथ खड़े हैं। छत पर चांद की पूजा के बाद लिया गया यह मनोरम दृश्य दांपत्य प्रेम, विश्वास और भारतीय संस्कृति की झलक दिखा रहा है।
क्षेत्र के मंदिरों और घरों में अहोई माता के भजन-कीर्तन का भी आयोजन किया गया। पूजा और भक्ति से जुड़े इन आयोजनों में महिलाओं ने हिस्सा लिया। बाजारों में भी दिनभर चहल-पहल रही। पूजा सामग्री, फल, फूल और श्रृंगार के सामान की दुकानों पर महिलाओं की भीड़ उमड़ी।
धर्माचार्यों के अनुसार, अहोई अष्टमी का व्रत मातृत्व के प्रेम और त्याग का प्रतीक है। इस दिन माताएं अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य के लिए बिना अन्न-जल के कठिन व्रत रखती हैं। यह व्रत उनके अटूट स्नेह को दर्शाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
चंदौसी में अहोई अष्टमी का पर्व कैसे मनाया गया?
चंदौसी और आसपास के इलाकों में अहोई अष्टमी श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाई गई। माताओं ने संतान की लंबी उम्र, सुरक्षा और खुशहाली के लिए निर्जला व्रत रखा।
अहोई अष्टमी पर महिलाओं ने कौन-कौन से काम किए?
महिलाओं ने अहोई माता का चित्र स्थापित कर पूजा की, दिनभर निर्जला व्रत रखा और शाम को एकत्र होकर अहोई माता की कथा सुनी।
अहोई अष्टमी का व्रत क्यों रखा जाता है?
यह व्रत संतान की लंबी उम्र, रक्षा, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए रखा जाता है।
करवा चौथ के साथ अहोई अष्टमी पड़ने पर क्या हुआ?
कई सुहागिन महिलाओं ने पति की लंबी उम्र के लिए भी व्रत रखा। उन्होंने सोलह श्रृंगार किया और चांद को अर्घ्य देने के बाद पति के हाथों से जल लेकर व्रत खोला।
अहोई अष्टमी का व्रत कैसे खोला गया?
देर रात चांद के दर्शन करने के बाद महिलाओं ने छत पर जाकर चांद को अर्घ्य दिया। इसके बाद पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत का पारण किया।
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