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उन्नाव में माटीकला जागरूकता कार्यक्रम, कारीगरों को दी गई सलाह

उन्नाव में उत्तर प्रदेश माटीकला बोर्ड के 9वें स्थापना पखवाड़े के तहत एक दिवसीय माटीकला जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

उन्नाव में माटीकला जागरूकता कार्यक्रम, कारीगरों को दी गई सलाह
Image credit: News Darpan Team

उन्नाव में उत्तर प्रदेश माटीकला बोर्ड के 9वें स्थापना पखवाड़े के तहत एक दिवसीय माटीकला जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। लोकनगर में हुए इस कार्यक्रम में सदर विधायक पंकज गुप्ता मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए। उन्होंने माटीकला कारीगरों, खासकर मातृशक्ति और प्रजापति समाज के लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि पारंपरिक माटीकला हमारी सांस्कृतिक धरोहर है और इसे स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता का मजबूत जरिया बनाया जा सकता है। उन्होंने कारीगरों से सरकार की योजनाओं का फायदा उठाकर अपने काम को आधुनिक तकनीकों के साथ आगे बढ़ाने की अपील की।

विधायक ने कहा कि प्रदेश सरकार पारंपरिक उद्योगों और कारीगरों को प्रोत्साहित करने के लिए लगातार काम कर रही है। माटीकला से जुड़े लोगों को प्रशिक्षण, आर्थिक मदद और आधुनिक उपकरण देकर आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कारीगरों से सरकारी योजनाओं का फायदा उठाने और अपने उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने का आग्रह किया।

कार्यक्रम में कानपुर विश्वविद्यालय के फाइन आर्ट और मूर्तिकला विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर जीअत बली यादव ने माटीकला की तकनीकी बारीकियों पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि आधुनिक तकनीक और नए डिजाइनों को अपनाकर माटीकला उत्पादों की गुणवत्ता और उनकी मांग बढ़ाई जा सकती है। उन्होंने युवाओं से इस क्षेत्र में प्रशिक्षण लेकर स्वरोजगार शुरू करने की सलाह दी।

जिला ग्रामोद्योग अधिकारी संजीव कुमार सिंह ने माटीकला बोर्ड की ऋण योजना, टूल किट वितरण योजना और प्रशिक्षण योजना की जानकारी दी। उन्होंने कारीगरों से इन योजनाओं का लाभ उठाने की अपील करते हुए कहा कि सरकार का मकसद पारंपरिक कारीगरों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना और उनके उत्पादों को पहचान दिलाना है।

कार्यक्रम में माटीकला कारीगरों के बनाए आकर्षक और कलात्मक उत्पादों की प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसे लोगों ने खूब सराहा। आयोजन में 165 कारीगरों का पंजीकरण हुआ और बड़ी संख्या में लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। समाजसेवी, जनप्रतिनिधि और विभागीय अधिकारियों की मौजूदगी में यह कार्यक्रम पारंपरिक माटीकला को नई पहचान दिलाने की दिशा में एक अहम कदम साबित हुआ।

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