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उमर खालिद ने पहली बार बताया, छह साल की हिरासत का मानसिक-शारीरिक असर

करीब छह साल तक ट्रायल से पहले हिरासत में रहने के बाद उमर खालिद ने तोड़ी चुप्पी उमर खालिद ने अपनी गिरफ्तारी के बाद पहली बार सार्वजनिक बयान जारी किया है।

उमर खालिद ने पहली बार बताया, छह साल की हिरासत का मानसिक-शारीरिक असर
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करीब छह साल तक ट्रायल से पहले हिरासत में रहने के बाद उमर खालिद ने तोड़ी चुप्पी

उमर खालिद ने अपनी गिरफ्तारी के बाद पहली बार सार्वजनिक बयान जारी किया है। इसमें उन्होंने ट्रायल से पहले करीब छह साल तक हिरासत में रहने के मानसिक और शारीरिक असर के बारे में बताया है। जेल की परिस्थितियों के कारण उनसे सीधे मुलाकात संभव नहीं थी, इसलिए परिवार और दोस्तों के जरिए यह बयान एक पत्रकार तक पहुंचाया गया।

खालिद अभी भी बिना ट्रायल के दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं। इसी बीच, मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली ट्यूनीशिया की कार्यकर्ता सिहेम बेंसद्रीन को दो मामलों में कुल 25 साल की जेल की सजा सुनाए जाने के बाद दोबारा गिरफ्तार किए जाने का खतरा बना हुआ है। ये दोनों मामले उनके काम से जुड़े हैं। दोनों मामले अलग-अलग देशों में लंबे समय तक हिरासत, कार्यवाही में देरी और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ की गई कानूनी कार्रवाई को सामने लाते हैं।

उमर खालिद की हिरासत और ट्रायल में देरी

खालिद भारतीय मानवाधिकार कार्यकर्ता, इतिहासकार और छात्र कार्यकर्ता हैं। सितंबर 2020 से उन्हें दिल्ली की तिहाड़ जेल में बिना ट्रायल के रखा गया है। उन पर भारत के गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून यानी यूएपीए के तहत आरोप हैं। ये आरोप फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान भड़की सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े हैं।

गिरफ्तारी के छह साल बाद भी उनका ट्रायल शुरू नहीं हुआ है। फ्रंट लाइन डिफेंडर्स उन्हें भारत में असहमति की आवाज के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक बताता है। संगठन का कहना है कि उनका लगातार जेल में रहना उन लोगों के खिलाफ आतंकवाद-रोधी कानूनों के इस्तेमाल का प्रतीक बन गया है, जो बहुलवाद और संवैधानिक मूल्यों के लिए अभियान चलाते हैं।

गिरफ्तारी के बाद खालिद का पहला सार्वजनिक बयान 30 जून 2026 को सामने आया। बयान के मुताबिक, उन्होंने ट्रायल से पहले करीब छह साल तक हिरासत में रहने के मानसिक और शारीरिक असर के बारे में बात की। उन्होंने यह भी बताया कि सार्वजनिक नजरों में उन्हें एक बहुत ही सरल और सीमित छवि तक समेट दिया गया है। कभी उन्हें खलनायक की तरह पेश किया गया और कभी नायक की तरह।

खालिद ने कहा कि इस सार्वजनिक छवि ने उनकी आम इंसानी कमजोरियों को मिटा दिया। उन्होंने कहा कि हिरासत में बीते वर्षों ने उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर वास्तविक असर डाला है। बयान में यह भी कहा गया कि हिरासत ने उनके विश्वासों और विचारों को कमजोर नहीं किया।

उन्होंने भारतीय सार्वजनिक जीवन में नफरत भरी भाषा को लगातार सामान्य बनाए जाने की बात कही है। उन्होंने यह भी बताया है कि उनकी जमानत सुनवाइयों में बार-बार हुई देरी, स्थगन और जजों के अलग हो जाने की वजह से वह किस तरह थकते गए। उन्होंने कहा कि उम्मीद का धीरे-धीरे खत्म होना जेल में रहने की सबसे मुश्किल बातों में से एक था।

यह ताजा बयान कानूनी मोर्चे पर कई झटकों के बाद आया है। व्यापक यूएपीए “बड़ी साजिश” मामले में हिरासत में रहते हुए उनकी जमानत अर्जियां बार-बार खारिज की गई हैं। कई सह-आरोपियों को जमानत मिल चुकी है, लेकिन खालिद अब भी जेल में हैं।

2 सितंबर 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट ने ट्रायल शुरू न होने के बावजूद ट्रायल से पहले पांच साल की हिरासत को कार्यवाही की “स्वाभाविक रफ्तार” बताया। यह बात खालिद की लगातार हिरासत और ट्रायल नहीं होने के संदर्भ में कही गई थी।

5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को ट्रायल तक लाने में हुई काफी देरी को माना, लेकिन खालिद को नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने आरोपों की गंभीरता और उसके सामने रखी गई सामग्री का हवाला दिया। कोर्ट ने उन्हें एक साल तक नई जमानत अर्जी दाखिल करने से भी रोक दिया।

इसी फैसले में उनके कई सह-आरोपियों को जमानत दी गई। इनमें गुलफिशा फातिमा, शिफा उर रहमान और मीरान हैदर शामिल थे। बयान के मुताबिक, उस समूह में खालिद ही ऐसे व्यक्ति रह गए जिन्हें अब भी जेल में रखा गया था।

इन सह-आरोपियों की रिहाई से उनके खिलाफ चल रहे कानूनी मामले खत्म नहीं हुए। उनके मूल मामले खुले रहे और ट्रायल की कोई तारीख तय नहीं की गई थी। इसलिए उनकी रिहाई का मतलब यह नहीं था कि उनके खिलाफ कानूनी खतरा खत्म हो गया है।

दिल्ली की सांप्रदायिक हिंसा को लेकर आरोप

खालिद के खिलाफ मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़की सांप्रदायिक हिंसा से जुड़ा है। यह हिंसा नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शनों और दिल्ली विधानसभा चुनावों के बाद हुई थी। बयान के मुताबिक, ऑनलाइन फैलाई गई गलत जानकारी और सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़े लोगों की भड़काऊ भाषा ने इस हिंसा को कुछ हद तक बढ़ावा दिया।

हिंदू भीड़ ने मुस्लिम निवासियों, मस्जिदों और उन लोगों को निशाना बनाया, जिनकी पहचान उनके नाम या धार्मिक पहचान से जुड़े शारीरिक संकेतों के आधार पर की गई। बयान में कहा गया है कि कुछ मुसलमानों ने भी जवाबी कार्रवाई की। तीन दिनों के दौरान 53 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम थे, और सैकड़ों लोग घायल हुए।

प्रोफाइल के मुताबिक, जब दिल्ली पुलिस ने इस हिंसा को लेकर आरोप लगाए, तो उसने सत्तारूढ़ पार्टी के किसी नेता का नाम नहीं लिया और हिंदू पक्ष के बहुत कम लोगों को आरोपी बनाया। दंगे भड़कने के समय खालिद दिल्ली से करीब 1,000 मील दूर थे। इसके बावजूद उन पर एक दर्जन से ज्यादा अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और छात्र कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर हिंसा की “साजिश रचने” और उसे “योजना के तहत करवाने” का आरोप लगाया गया।

आरोप में इस हिंसा को राज्य के खिलाफ एक समन्वित साजिश का हिस्सा बताया गया। बयान के मुताबिक, जांचकर्ताओं ने आतंकवाद और साजिश से जुड़े आरोप तैयार करने के लिए खालिद के सार्वजनिक भाषणों पर काफी भरोसा किया। प्रोफाइल में कहा गया है कि एकजुटता की अपील करने वाली साफ तौर पर अहिंसक भाषा को हथियारबंद साजिश के सबूत की तरह पेश किया गया।

खालिद पर भारतीय दंड संहिता के तहत राजद्रोह, गैरकानूनी सभा, धार्मिक समूहों के बीच दुश्मनी बढ़ाने, हत्या और हत्या की कोशिश समेत कई अपराधों के आरोप लगाए गए। उन पर यूएपीए की धारा 13, 16, 17 और 18 के तहत भी आरोप हैं। इन धाराओं में गैरकानूनी गतिविधियां, आतंकवादी कृत्य, आतंकवादी कृत्यों के लिए धन जुटाना और साजिश शामिल हैं।

इन आरोपों में भारत के आर्म्स एक्ट के तहत अपराध भी शामिल हैं। दिसंबर 2022 में दिल्ली की एक अदालत ने दंगा करने और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से जुड़े एक अलग मामले में खालिद को बरी कर दिया था। इसके बावजूद वह व्यापक यूएपीए “बड़ी साजिश” मामले में हिरासत में बने रहे।

उनकी लगातार हिरासत इस मामले को लेकर नजर रखने वाले संगठनों के लिए इसकी अहमियत का मुख्य हिस्सा है। फ्रंट लाइन डिफेंडर्स का कहना है कि खालिद के मामले पर करीब से नजर रखने वाले लोग उनकी कैद को भारत में चल रहे एक बड़े दौर का सबूत मानते हैं। इस दौर में असहमति की आवाजों के खिलाफ आतंकवाद-रोधी कानूनों का इस्तेमाल बढ़ रहा है।

संगठन का यह भी कहना है कि किसी भी ट्रायल से पहले जनता की सोच बनाने में सरकार के साथ चलने वाला मीडिया भूमिका निभाता है। संगठन के मुताबिक, यूएपीए के कई मामलों में एक जैसा तरीका देखने को मिलता है। इसमें आतंकवाद की व्यापक परिभाषाएं और जमानत के सख्त प्रावधान दोषसिद्धि से पहले, या बिना दोषसिद्धि के ही, सजा की तरह काम कर सकते हैं।

इसी आकलन के मुताबिक, यह तरीका मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और उन छात्रों पर असमान रूप से असर डालता है, जो शांतिपूर्ण सभा और अपनी बात कहने के अधिकार का इस्तेमाल करते हैं। यह दावा उस व्यापक संदर्भ के हिस्से के तौर पर रखा गया है, जिसमें खालिद की हिरासत की जांच की जा रही है।

खालिद की पढ़ाई और राजनीतिक पृष्ठभूमि

खालिद का जन्म और पालन-पोषण दिल्ली के जामिया नगर में हुआ। यह शहर के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित मुस्लिम बहुल इलाका है। उन्होंने कहा है कि उन्होंने देखा कि किस तरह बढ़ती हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति ने भारतीय समाज को धार्मिक आधार पर बांट दिया और मुसलमानों को और हाशिए पर धकेल दिया।

उन्होंने बताया है कि इसी तरह के हाशिए के माहौल में बड़े होने के कारण उनके लिए राजनीति से जुड़ना टालना संभव नहीं था। बाद में उनके अकादमिक काम का ध्यान उन समुदायों के इतिहास और अधिकारों पर रहा, जिनके बारे में उनका मानना था कि उन्हें लंबे समय से सत्ता के हाशिए पर धकेला गया है।

खालिद ने दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ी मल कॉलेज से इतिहास की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज से एमए, एमफिल और पीएचडी पूरी की।

उनके एमफिल शोध में सिंहभूम के आदिवासी समुदायों के अधिकारों और इतिहास का अध्ययन किया गया था। 2018 में जमा किए गए उनके डॉक्टरेट शोध का शीर्षक था, “कंटेस्टिंग क्लेम्स एंड कंटिन्जेंसीज ऑफ द रूल ऑन आदिवासीज ऑफ झारखंड।”

इस शोध में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान सिंहभूम के आदिवासी समाजों के इतिहास और राज्य की सत्ता के साथ उनके बदलते संबंधों का अध्ययन किया गया था। बाद में इसी शोध को जगरनॉट ने फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज: आदिवासी हिस्टीरीज एंड द पॉलिटिक्स ऑफ पावर नाम की किताब के रूप में प्रकाशित किया।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को प्रोफाइल में लंबे समय से वामपंथी रुझान वाली छात्र राजनीति के लिए जाना जाने वाला और दक्षिणपंथी आलोचना का निशाना बनने वाला विश्वविद्यालय बताया गया है। वहां खालिद को तेज और आलोचनात्मक सोच रखने वाले व्यक्ति के तौर पर जाना जाता था। बयान के मुताबिक, उनके सोचने का तरीका ऐसे कैंपस माहौल से प्रभावित था, जहां आलोचनात्मक सोच और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के प्रति प्रतिबद्धता को महत्व दिया जाता था।

उस समय उन्हें जानने वाले लोग उन्हें ऐसा व्यक्ति बताते हैं, जो करियर बनाने को लेकर चिंतित नहीं था। वे बताते हैं कि खालिद लगातार आदिवासियों के अधिकारों, दलितों की गरिमा और अधिकारों, अल्पसंख्यकों की चिंताओं और मजदूरों तथा किसानों के अधिकारों की बात करते थे।

वे यह भी बताते हैं कि वह हर रूप में सांप्रदायिकता के खिलाफ बोलते थे। इन चिंताओं के साथ-साथ उनका अकादमिक ध्यान उन समुदायों के इतिहास पर भी था, जिनकी आवाजों को उनके मुताबिक लंबे समय से सत्ता से बाहर रखा गया था।

2020 में गिरफ्तारी से पहले भी खालिद की सुरक्षा को लेकर खतरे सामने आ चुके थे। अगस्त 2018 में दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के पास “खौफ से आजादी” नाम के एक कार्यक्रम में शामिल होने के दौरान एक बंदूकधारी ने उन पर गोली चला दी थी। उन्हें कोई चोट नहीं लगी।

यह हमला उस समय हुआ था जब उन्हें कथित तौर पर जान से मारने की धमकियां मिल चुकी थीं और उन्होंने पुलिस सुरक्षा मांगी थी। 2017 में वह यूनाइटेड अगेंस्ट हेट के सार्वजनिक चेहरों में शामिल हो गए थे। यह नागरिक समाज की एक पहल थी, जिसे लिंचिंग और सांप्रदायिक हिंसा की एक लहर के जवाब में बनाया गया था।

यह पहल तथ्यों की जांच करने वाले अभियानों, सार्वजनिक अभियानों और जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए काम करती थी। खालिद की सक्रियता का ध्यान धीरे-धीरे अल्पसंख्यकों के अधिकारों, सांप्रदायिक भेदभाव के विरोध और भारत के संवैधानिक मूल्यों की रक्षा पर केंद्रित हो गया।

पहला राजद्रोह मामला और नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन

फरवरी 2016 में कैंपस में हुए एक राजनीतिक कार्यक्रम के बाद खालिद और जेएनयू के कई अन्य छात्रों को गिरफ्तार किया गया और उन पर राजद्रोह के आरोप लगाए गए। यह कार्यक्रम 2013 में अफजल गुरु को दी गई फांसी की बरसी पर आयोजित किया गया था। इसका एक हिस्सा मृत्युदंड के विरोध में प्रदर्शन भी था।

उस मामले में खालिद 24 दिन तक हिरासत में रहे। इस मामले और विश्वविद्यालय के छात्रों के खिलाफ सरकार की ओर से राजद्रोह के आरोपों के इस्तेमाल ने उन्हें असहमति और राष्ट्रवाद को लेकर चल रही राष्ट्रीय बहस में एक प्रमुख और विवादित प्रतीक बना दिया।

इसके परिणामस्वरूप उन्हें एक सेमेस्टर के लिए जेएनयू से निकाल दिया गया था। भारतीय टेलीविजन चैनलों ने उन्हें “एंटी-नेशनल” कहा। खालिद ने कहा है कि इससे उनकी जिंदगी की दिशा हमेशा के लिए बदल गई।

बाद में विश्वविद्यालय ने उनकी पूरी की गई डॉक्टरेट थीसिस स्वीकार करने से इनकार कर दिया। खालिद ने दिल्ली हाई कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी और जीत हासिल की। इसके बाद उन्होंने 2018 में आखिरकार अपनी पीएचडी जमा की।

2019 के आखिर में और 2020 के दौरान वह नागरिकता संशोधन कानून और प्रस्तावित नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस के खिलाफ देशभर में चल रहे आंदोलन के सबसे ज्यादा दिखाई देने वाले वक्ताओं में शामिल हो गए। उन्होंने देशभर में काफी यात्रा की और सार्वजनिक सभाओं को संबोधित किया।

खालिद का तर्क था कि नागरिकता कभी भी धर्म के आधार पर तय नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी का ढांचा समान नागरिकता के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन करता है।

इस दौरान उनके भाषणों में संविधान, भारत के आजादी के संघर्ष का इतिहास और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के जीवन के अनुभवों का हवाला दिया जाता था। उन्होंने भारतीय नागरिकता को धार्मिक आधार पर दोबारा परिभाषित करने और भारत को हिंदू बहुसंख्यक राज्य के रूप में बदलने की कोशिश के तौर पर देखी जाने वाली बातों की आलोचना की।

ट्यूनीशिया में सिहेम बेंसद्रीन को मिली सजाएं

ट्यूनीशिया में प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता सिहेम बेंसद्रीन को सात आपराधिक मामलों का सामना करना पड़ रहा है। ये मामले देश के ट्रुथ एंड डिग्निटी कमीशन की पूर्व अध्यक्ष के तौर पर उनके काम से जुड़े हैं। इस कमीशन को आईवीडी के नाम से भी जाना जाता है।

बेंसद्रीन को 1 अगस्त 2024 से 19 फरवरी 2025 तक मनमाने तरीके से हिरासत में रखा गया था। 19 फरवरी 2025 को ट्यूनिस कोर्ट ऑफ अपील ने ट्रायल लंबित रहने तक उन्हें जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

26 जून 2026 को ट्यूनिस की एक अदालत ने दो मामलों में उन्हें कुल 25 साल की जेल की सजा सुनाई। बताया गया कि इन मामलों की कार्यवाही निष्पक्ष ट्रायल के अधिकार के उल्लंघन से प्रभावित रही।

एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि इन सजाओं के बाद बेंसद्रीन को दोबारा गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने का खतरा है। अपील लंबित रहने तक वह आजाद हैं, लेकिन उन्हें पांच अलग-अलग मामलों और यात्रा प्रतिबंध का सामना करना पड़ रहा है।

एक अन्य बयान में अदालत को ट्यूनिस कोर्ट ऑफ फर्स्ट इंस्टेंस बताया गया है और कहा गया है कि दो अलग-अलग मामलों में कुल 25 साल की सजा दी गई। इसमें कहा गया है कि ये मामले ट्रुथ एंड डिग्निटी कमीशन की अंतिम रिपोर्ट की सामग्री से जुड़े हैं। खास तौर पर, इनमें बैंकिंग सेक्टर में भ्रष्टाचार से जुड़े निष्कर्ष शामिल हैं।

बेंसद्रीन ने इन सजाओं के खिलाफ अपील की है और अपील लंबित रहने तक वह आजाद हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि कार्यवाही निष्पक्ष ट्रायल के अधिकार के गंभीर उल्लंघनों से प्रभावित रही।

जब बेंसद्रीन का ट्रायल शुरू हुआ, तब उन्हें और उनके वकीलों को आरोप तय किए जाने के फैसले की कॉपी नहीं मिली थी। उन्हें पांच और आपराधिक मामलों का सामना करना पड़ रहा है। ये सभी मामले ट्रुथ एंड डिग्निटी कमीशन की अध्यक्ष के तौर पर उनके काम से जुड़े हैं।

सामग्री में बताए गए सभी सात मामलों के केंद्र में कमीशन का काम है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की अपील के मुताबिक, बेंसद्रीन ने 2014 से 2018 के बीच इसकी अध्यक्ष के रूप में काम किया था।

संगठन का कहना है कि आरोप कमीशन की अध्यक्ष के रूप में उनके वैध और कानून के तहत मिले काम से जुड़े हैं। संगठन सजाओं को रद्द करने और केवल उस काम से पैदा हुए सभी आरोपों और कार्यवाहियों को खत्म करने की मांग करता है।

2023 से बेंसद्रीन पर यात्रा प्रतिबंध भी लगा हुआ है। एमनेस्टी इंटरनेशनल इस प्रतिबंध को मनमाना बताता है और इसे तुरंत हटाने की मांग करता है।

संगठन का यह भी कहना है कि उन्हें छह महीने से ज्यादा समय तक मनमाने तरीके से हिरासत में रखा गया था। संगठन इस हिरासत को उस व्यापक कानूनी दबाव से जोड़ता है, जिसका वह अब भी सामना कर रही हैं।

निष्पक्ष ट्रायल को लेकर चिंता और अपील

एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि जब तक बेंसद्रीन की सजाएं बरकरार हैं, तब तक अपील की पूरी कार्यवाही को अंतरराष्ट्रीय निष्पक्ष ट्रायल मानकों का पूरी तरह पालन करना होगा। संगठन खास तौर पर मांग करता है कि उनके बचाव पक्ष को मामले की पूरी फाइल तक पूरी और समय पर पहुंच दी जाए।

संगठन सभी सुनवाइयों को सार्वजनिक किए जाने की भी मांग करता है। यह मांग संगठन की उस बात से जुड़ी है, जिसमें उसने मूल कार्यवाही को निष्पक्ष ट्रायल के अधिकार के गंभीर उल्लंघनों से प्रभावित बताया है।

संगठन के बयान के मुताबिक, बेंसद्रीन को सच और जवाबदेही की मांग करने के लिए सजा नहीं दी जानी चाहिए। उसकी अपील में अभियोजन को निशाने पर की गई और बेबुनियाद कार्रवाई बताया गया है। इसमें कहा गया है कि सभी सात आपराधिक मामले ट्रुथ एंड डिग्निटी कमीशन के साथ उनके वैध काम से जुड़े हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ट्यूनीशिया के अधिकारियों से बेंसद्रीन की सजाओं को रद्द करने और उनके वैध मानवाधिकार कार्य से जुड़े सभी आरोपों को खत्म करने की अपील कर रहा है। अपील में अधिकारियों से यात्रा प्रतिबंध हटाने और निष्पक्ष अपील सुनिश्चित करने को भी कहा गया है।

सार्वजनिक अपील में समर्थकों से सरकारी अधिकारियों को पत्र भेजने को कहा गया है और इसके लिए एक नमूना पत्र भी दिया गया है। पत्र भेजने की बताई गई आखिरी तारीख 25 मार्च 2027 है।

अपील में कहा गया है कि आरोप कमीशन की अंतिम रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्षों से जुड़े हैं। इनमें बैंकिंग सेक्टर में भ्रष्टाचार से जुड़े निष्कर्ष भी शामिल हैं। इसमें कहा गया है कि जब ट्रायल शुरू हुआ, तब बेंसद्रीन और उनके वकीलों के पास आरोप तय किए जाने के फैसले की कॉपी नहीं थी।

कार्यवाही शुरू होने के समय से जुड़ी सामग्री में दर्ज यही खास निष्पक्ष ट्रायल संबंधी चिंता है। व्यापक मांग यह है कि अपील की कार्यवाही के दौरान बचाव पक्ष को मामले की फाइल तक पूरी और समय पर पहुंच दी जाए और सभी सुनवाइयां सार्वजनिक हों।

ट्रायल से पहले हिरासत को लेकर बड़ी चिंता

खालिद और बेंसद्रीन के मामलों में अलग-अलग आरोप और अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाएं शामिल हैं। स्रोत सामग्री में उठाई गई साझा चिंता यह है कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के रूप में बताए गए लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही और हिरासत का इस्तेमाल किया जा रहा है।

खालिद के मामले में सितंबर 2020 से लगातार हिरासत में रखे जाने के बावजूद ट्रायल शुरू नहीं हुआ है। बेंसद्रीन के मामले में स्रोत कहता है कि उन्हें दो मामलों में सजा दी जा चुकी है, लेकिन वह अपील लंबित रहने तक आजाद हैं। इसके साथ ही उन्हें पांच और मामलों का सामना करना पड़ रहा है।

फ्रंट लाइन डिफेंडर्स का कहना है कि खालिद की लगातार कैद बहुलवाद और संवैधानिक मूल्यों के लिए अभियान चलाने वालों के खिलाफ आतंकवाद-रोधी कानूनों के इस्तेमाल का प्रतीक बन गई है। संगठन का यह भी कहना है कि इस व्यापक तरीके का असर उन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और छात्रों पर असमान रूप से पड़ता है, जो शांतिपूर्ण सभा और अपनी बात कहने की आजादी का इस्तेमाल करते हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की अपील में कहा गया है कि बेंसद्रीन के मामले ट्रुथ एंड डिग्निटी कमीशन के साथ उनके काम से जुड़े हैं। संगठन उन आरोपों और कार्यवाहियों को खत्म करने की मांग करता है, जो केवल उस काम से जुड़ी हैं।

सितंबर 2025 में फ्रंट लाइन डिफेंडर्स ने एमनेस्टी इंटरनेशनल, सिविकस, फोरम-एशिया, इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट्स, एफआईडीएच और ओएमसीटी के साथ मिलकर खालिद की तुरंत और बिना शर्त रिहाई की मांग की थी। संगठनों ने यह भी कहा था कि जमानत के नियमों को आरोपी व्यक्ति की पहचान या स्थिति की परवाह किए बिना सभी पर समान रूप से लागू किया जाना चाहिए।

उनकी अपील में 2020 की हिंसा के लिए वास्तव में जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करने और यूएपीए में सुधार करने या उसे खत्म करने की भी मांग की गई थी। यह मांग खालिद की गिरफ्तारी की पांचवीं बरसी से पहले की गई थी।

संगठनों का रुख खालिद की कैद को आतंकवाद-रोधी कानून, जमानत के नियमों और दिल्ली की हिंसा के लिए जवाबदेही को लेकर उठ रही व्यापक चिंताओं से जोड़ता है। स्रोत सामग्री में व्यापक मामले के ट्रायल की कोई तारीख दर्ज नहीं है।

बेंसद्रीन के लिए तत्काल मुद्दा कुल 25 साल की सजा के खिलाफ अपील और दोबारा गिरफ्तार किए जाने की आशंका है। वह अब भी पांच अलग-अलग मामलों और यात्रा प्रतिबंध का सामना कर रही हैं।

ताजा जानकारी के मुताबिक, दोनों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के सामने कानूनी अनिश्चितता बनी हुई है। खालिद बिना ट्रायल के हिरासत में हैं, जबकि बेंसद्रीन अपील लंबित रहने तक आजाद हैं, लेकिन उन्हें जेल भेजे जाने और आगे की कानूनी कार्यवाही का खतरा बना हुआ है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उमर खालिद ने पहली बार सार्वजनिक बयान कब जारी किया?

उमर खालिद का गिरफ्तारी के बाद पहला सार्वजनिक बयान 30 जून 2026 को सामने आया।

उमर खालिद कितने समय से बिना ट्रायल के हिरासत में हैं?

उमर खालिद सितंबर 2020 से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बिना ट्रायल के बंद हैं।

उमर खालिद ने हिरासत के क्या असर बताए?

उन्होंने कहा कि करीब छह साल की हिरासत का उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर वास्तविक असर पड़ा है। उम्मीद का धीरे-धीरे खत्म होना भी उन्होंने जेल में रहने की सबसे मुश्किल बातों में बताया।

उमर खालिद पर किस कानून के तहत आरोप हैं?

उमर खालिद पर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून यानी यूएपीए के तहत आरोप हैं। ये आरोप फरवरी 2020 के नागरिकता संशोधन कानून विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हुई सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े हैं।

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