News Darpan भारत का डिजिटल दर्पण
ताज़ा
Madhya Pradesh General ग्वालियर

ग्वालियर के सर्वे 302 में रजिस्ट्रियां बेअसर, चरनोई डायवर्जन दर्ज

ग्वालियर में सर्वे नंबर 302 से जुड़ा जमीन विवाद अब राजस्व रिकॉर्ड, GDA के स्वामित्व, पुरानी रजिस्ट्रियों और नए डायवर्जन के सवालों के बीच उलझ गया है।

ग्वालियर के सर्वे 302 में रजिस्ट्रियां बेअसर, चरनोई डायवर्जन दर्ज
Image credit: News Darpan Team

ग्वालियर में सर्वे नंबर 302 से जुड़ा जमीन विवाद अब राजस्व रिकॉर्ड, GDA के स्वामित्व, पुरानी रजिस्ट्रियों और नए डायवर्जन के सवालों के बीच उलझ गया है। एक तरफ 25 बीघा 8 बिस्वा जमीन पर वर्षों बाद कराई गई रजिस्ट्रियों को प्रभावहीन मानते हुए एसडीएम का आदेश निरस्त किया गया। दूसरी तरफ इसी सर्वे नंबर 302 से जुड़ी करीब 34,070 वर्गमीटर, यानी लगभग 16 बीघा चरनोई जमीन का कृषि से आवासीय डायवर्जन ऑनलाइन पोर्टल के जरिए जनवरी 2026 में दर्ज हो गया। इस डायवर्जन के लिए कुल ₹7,49,540 प्रीमियम और भू-राजस्व जमा कराया गया।

यह मामला इसलिए गंभीर हो गया है क्योंकि एक ही सर्वे नंबर में दो अलग-अलग प्रक्रियाएं सामने आई हैं। 1989 में GDA के लिए नोटिफाइड जमीन पर 2001-02 की रजिस्ट्रियां बाद में विवाद में आईं और खारिज मानी गईं। वहीं इसी सर्वे की 34 हजार वर्गमीटर चरनोई जमीन का ₹7.49 लाख जमा कर आवासीय डायवर्जन दर्ज हो गया। सरकारी और प्राधिकरण की जमीनों के रिकॉर्ड में चल रहे इस पूरे खेल ने राजस्व व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामले का पहला हिस्सा ग्राम मऊ के सर्वे क्रमांक 302, 764, 765, 768, 769 और 770 की कुल करीब 25 बीघा 8 बिस्वा जमीन से जुड़ा है। इस जमीन को 20 जनवरी 1989 के मध्यप्रदेश राजपत्र में ग्वालियर विकास प्राधिकरण की महाराजपुरा आवासीय योजना के लिए नोटिफाइड किया गया था। यानी सरकारी रिकॉर्ड में यह जमीन GDA की योजना से जुड़ी मानी गई थी।

रिकॉर्ड के मुताबिक 1997 में ईवा गृह निर्माण सहकारी समिति ने मूल किसानों से अनुबंध किया। इसके बाद 29 जून 1998 को ईवा समिति, मूल किसानों और GDA के बीच त्रिपक्षीय करार हुआ। फिर 1 जुलाई 1998 को पंचनामा के जरिए जमीन का कब्जा भी प्राधिकरण को सौंपा गया। इस क्रम के हिसाब से पहले जमीन योजना के लिए नोटिफाइड हुई, फिर समिति और किसानों के बीच अनुबंध हुआ, फिर GDA को शामिल करते हुए त्रिपक्षीय करार हुआ और आखिर में पंचनामा के जरिए कब्जा प्राधिकरण को सौंपा गया।

इस पूरी प्रक्रिया के बाद GDA ने संबंधित समिति को विकसित भूखंड मुआवजे के रूप में दिए। यानी रिकॉर्ड में जमीन के अधिग्रहण और कब्जे की प्रक्रिया के बाद प्राधिकरण की भूमिका साफ दिखाई देती है। लेकिन इसी जमीन को लेकर सालों बाद 2001 और 2002 की रजिस्ट्रियां सामने आईं और विवाद ने नया मोड़ ले लिया।

जमीन GDA के कब्जे और अधिकार में आने के वर्षों बाद मृतक अशोक दुबे के वारिसों और घरौंदा गृह निर्माण सहकारी समिति ने इसी जमीन के अलग-अलग हिस्सों को खरीदने का दावा किया। दावा यह था कि 2001 और 2002 में संबंधित सर्वे नंबरों की जमीन रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के जरिए खरीदी गई थी। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर GDA के नाम दर्ज राजस्व रिकॉर्ड को चुनौती दी गई और मामला एसडीएम के सामने पहुंचा।

एसडीएम ग्वालियर सिटी ने 8 फरवरी 2021 को तहसीलदार का आदेश निरस्त कर दिया था। इसके खिलाफ ईवा समिति ने अपर आयुक्त के यहां अपील की। यही अपील बाद में इस पूरे विवाद की अहम कड़ी बनी, क्योंकि अपर आयुक्त ने जमीन के पुराने करार, कब्जे और बाद की रजिस्ट्रियों के आधार पर आदेश दिया।

4 अगस्त 2026 को अपर आयुक्त वीरेंद्र कुमार ने मामले में आदेश पारित करते हुए एसडीएम का आदेश निरस्त कर दिया। आदेश में कहा गया कि नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम की धारा 56 के तहत विशेष परिस्थितियों में प्राधिकरण को करार के जरिए भूमि अर्जित करने का अधिकार है। आदेश के अनुसार इस तरह के करार पर पंजीयन और स्टाम्प शुल्क संबंधी प्रावधान अलग हैं। इसलिए केवल पंजीयन न होने के आधार पर 1998 के करार को अमान्य नहीं माना जा सकता।

अपर आयुक्त के निष्कर्ष के अनुसार अगर 1998 में भूमि का अधिकार और कब्जा प्राधिकरण को मिल चुका था, तो उसके बाद मूल किसानों के पास उसी भूमि को दोबारा बेचने का अधिकार नहीं बचता था। इसी आधार पर 2001 और 2002 में हुई बाद की रजिस्ट्रियों पर गंभीर सवाल खड़े हुए। आदेश में यह भी माना गया कि एसडीएम ने सर्वे नंबर 302 के संबंध में अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश पारित किया था।

यही वह बिंदु है जहां 25 बीघा 8 बिस्वा जमीन का मामला सीधे सर्वे नंबर 302 से जुड़ता है। एक तरफ यह कहा गया कि GDA के लिए नोटिफाइड और बाद में कब्जे में आई जमीन को मूल किसानों द्वारा दोबारा बेचने का अधिकार नहीं था। दूसरी तरफ उसी सर्वे नंबर 302 से जुड़ी करीब 34,070 वर्गमीटर जमीन का कृषि से आवासीय डायवर्जन दर्ज हो गया।

मामले का दूसरा हिस्सा इसी सर्वे नंबर 302 की करीब 34,070 वर्गमीटर जमीन से जुड़ा है। दस्तावेजों के अनुसार यह जमीन मिसल बंदोबस्त 1940 में चरनोई के रूप में दर्ज थी। यानी राजस्व रिकॉर्ड में यह जमीन 86 साल से चरनोई के रूप में दर्ज बताई गई। अब सवाल यह उठ रहा है कि ऐसी जमीन का आवासीय डायवर्जन किस आधार पर हुआ।

स्थानीय लोगों की शिकायत है कि इस जमीन पर धीरे-धीरे सड़क निकालने, बिजली के खंभे लगाने और भूखंड काटकर बिक्री की तैयारी जैसी गतिविधियां की गईं। ग्रामीणों का दावा है कि इस संबंध में प्रशासन के अधिकारियों को कई बार शिकायतें भी दी गईं। इसी बीच 7 जनवरी 2026 को आदेश क्रमांक 2507400050240 के जरिए इसी जमीन का कृषि से आवासीय डायवर्जन ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज हो गया।

दस्तावेजों के मुताबिक माँ वैष्णो वाइल्ड हाइट्स और सतीश निवासी जमाहर के नाम से 34,070 वर्गमीटर भूमि के लिए डायवर्जन किया गया। इसके एवज में प्रीमियम के तौर पर ₹6,81,400 जमा किए गए। भू-राजस्व के रूप में ₹68,140 जमा किए गए। इस तरह कुल ₹7,49,540 जमा कराए गए। इसके बाद जमीन का उपयोग कृषि से आवासीय के रूप में दर्ज हो गया।

यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। क्या ऑनलाइन पोर्टल पर आवेदन और शुल्क जमा होने से ऐसी जमीन का मूल स्वामित्व या कानूनी स्थिति बदल सकती है? अगर जमीन मिसल बंदोबस्त 1940 में चरनोई के रूप में दर्ज थी, और अगर उसी सर्वे नंबर से जुड़ी जमीन पर GDA के अधिग्रहण, कब्जे और स्वामित्व से संबंधित रिकॉर्ड मौजूद था, तो डायवर्जन से पहले किस स्तर पर जांच की गई?

इस मामले में एसडीएम प्रदीप शर्मा का पक्ष भी सामने आया है। उनका कहना है कि डायवर्जन की प्रक्रिया ऑनलाइन पोर्टल के जरिए होती है और डायवर्जन से जमीन का स्वामित्व किसी व्यक्ति के नाम नहीं होता। उनके अनुसार “डायवर्जन जमीन का होता है, व्यक्ति का नहीं।”

एसडीएम प्रदीप शर्मा का यह भी कहना है कि यदि सर्वे नंबर 302 की जमीन GDA द्वारा अर्जित है तो वह GDA की ही रहेगी। पोर्टल पर हुआ डायवर्जन स्वामित्व हस्तांतरित नहीं करता। उनका कहना है कि अपर आयुक्त के आदेश के बाद यदि जमीन GDA की पाई गई है तो डायवर्जन कराने वाले को इससे कोई स्वामित्व लाभ नहीं मिलेगा।

एसडीएम के इस जवाब के बाद भी प्रशासनिक सवाल खत्म नहीं होते। अगर डायवर्जन से मालिकाना हक नहीं बदलता, तब भी यह सवाल बना रहता है कि आवेदन स्वीकार कैसे हुआ। जब राजस्व रिकॉर्ड, पुराने दस्तावेज और GDA के अधिग्रहण से संबंधित प्रक्रिया में जमीन की स्थिति पहले से विवादित थी, तो ऑनलाइन डायवर्जन आवेदन की जांच किस स्तर पर हुई। क्या पोर्टल पर दर्ज प्रक्रिया में जमीन की पुरानी स्थिति, चरनोई दर्ज होने का रिकॉर्ड और GDA से जुड़ी प्रविष्टियां देखी गईं या नहीं।

अगर जमीन वास्तव में GDA की अर्जित भूमि है, तो क्या डायवर्जन से पहले संबंधित प्राधिकरण से स्थिति स्पष्ट कराई गई थी। और अगर जमीन चरनोई के रूप में दर्ज थी, तो उसके भू-उपयोग परिवर्तन की पात्रता किस आधार पर तय की गई। ये सवाल इसलिए अहम हैं क्योंकि मामला सिर्फ ऑनलाइन आवेदन भरने और शुल्क जमा करने तक सीमित नहीं दिखता। यहां जमीन की मूल स्थिति, पुराने करार, कब्जे का रिकॉर्ड, बाद की रजिस्ट्रियां और फिर डायवर्जन की एंट्री, सब एक ही विवाद की अलग-अलग कड़ियां बनकर सामने आ रही हैं।

पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यही दिखाई देती है कि एक तरफ 25 बीघा से ज्यादा GDA भूमि को वर्षों बाद निजी रजिस्ट्रियों के जरिए दोबारा हासिल करने के दावों को अपर आयुक्त ने खारिज किया। दूसरी तरफ उसी सर्वे नंबर से जुड़ी करीब 16 बीघा जमीन के आवासीय डायवर्जन ने राजस्व प्रक्रिया पर नए सवाल खड़े कर दिए। इससे यह जांच जरूरी हो जाती है कि जमीन की मूल स्थिति क्या थी, डायवर्जन के समय रिकॉर्ड में क्या दर्ज था और पोर्टल पर आवेदन की स्वीकृति किन दस्तावेजों के आधार पर हुई।

इस मामले में जांच की जरूरत सिर्फ जमीन की नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया की दिखाई दे रही है। यह पता करना जरूरी है कि चरनोई की जमीन के डायवर्जन के लिए आवेदन किसने किया। आवेदन के साथ कौन-कौन से दस्तावेज लगाए गए। राजस्व रिकॉर्ड में उस समय जमीन की स्थिति क्या थी। GDA से कोई NOC या अभिमत लिया गया था या नहीं। डायवर्जन से पहले पुराने अधिग्रहण और कब्जे के रिकॉर्ड की जांच हुई या नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि यदि जमीन GDA की अर्जित भूमि थी, तो उसके आवासीय डायवर्जन का प्रशासनिक औचित्य क्या था। अगर डायवर्जन से स्वामित्व नहीं बदलता, जैसा कि एसडीएम प्रदीप शर्मा का कहना है, तब भी यह साफ होना जरूरी है कि पोर्टल पर प्रक्रिया पूरी करने से पहले जमीन की कानूनी स्थिति को कैसे परखा गया। क्योंकि यहां बात केवल एक एंट्री की नहीं है, बल्कि उस एंट्री के आधार और उससे जुड़े रिकॉर्ड की है।

अपर आयुक्त के आदेश में 1998 के करार और कब्जे को अहम माना गया। आदेश में नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम की धारा 56 का जिक्र करते हुए कहा गया कि विशेष परिस्थितियों में प्राधिकरण करार के जरिए भूमि अर्जित कर सकता है। इसी आदेश में यह बात भी सामने आई कि ऐसे करार पर पंजीयन और स्टाम्प शुल्क संबंधी प्रावधान अलग हैं। इसलिए केवल पंजीयन न होने के आधार पर 1998 के करार को अमान्य नहीं माना जा सकता। इसी तर्क के आधार पर बाद की रजिस्ट्रियों पर सवाल उठे।

दूसरी ओर, डायवर्जन का रिकॉर्ड यह दिखाता है कि 7 जनवरी 2026 को आदेश क्रमांक 2507400050240 के जरिए 34,070 वर्गमीटर जमीन का कृषि से आवासीय डायवर्जन दर्ज हुआ। यह डायवर्जन माँ वैष्णो वाइल्ड हाइट्स और सतीश निवासी जमाहर के नाम से हुआ। इसके लिए ₹6,81,400 प्रीमियम और ₹68,140 भू-राजस्व के रूप में जमा हुए। कुल रकम ₹7,49,540 रही। इस रिकॉर्ड के कारण विवाद और गहरा गया है।

स्थानीय लोगों की शिकायतों में सड़क निकालने, बिजली के खंभे लगाने और भूखंड काटकर बिक्री की तैयारी जैसी गतिविधियों का दावा किया गया है। ग्रामीणों का यह भी दावा है कि प्रशासन के अधिकारियों को कई बार शिकायतें दी गईं। इन शिकायतों और दस्तावेजों के बीच अब यह देखना जरूरी हो गया है कि राजस्व विभाग ने किस आधार पर आगे की प्रक्रिया की, और क्या पहले से मौजूद विवादों को ध्यान में रखा गया या नहीं।

फिलहाल दस्तावेज इतना जरूर बताते हैं कि एक ही सर्वे नंबर से जुड़े जमीन विवाद में चार कड़ियां साफ दिखाई दे रही हैं। पहली कड़ी GDA का स्वामित्व और महाराजपुरा आवासीय योजना के लिए नोटिफिकेशन है। दूसरी कड़ी 1997 का अनुबंध, 29 जून 1998 का त्रिपक्षीय करार और 1 जुलाई 1998 का पंचनामा है। तीसरी कड़ी 2001 और 2002 की बाद की रजिस्ट्रियां हैं, जिन पर अपर आयुक्त के आदेश में गंभीर सवाल उठे। चौथी कड़ी 7 जनवरी 2026 का ऑनलाइन डायवर्जन है, जिसमें चरनोई दर्ज जमीन का कृषि से आवासीय उपयोग दर्ज हुआ।

अब इस पूरे मामले में प्रशासन की जांच पर निगाह है। जांच से ही यह साफ होगा कि यह केवल ऑनलाइन प्रक्रिया की तकनीकी कार्रवाई थी या इसके पीछे किसी को जमीन के उपयोग का अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने की कोशिश हुई। यह भी जांच से ही पता चलेगा कि सर्वे नंबर 302 की जमीन की असल स्थिति डायवर्जन के समय क्या थी और नियमों का पालन हुआ या नहीं। फिलहाल राजस्व रिकॉर्ड, GDA का स्वामित्व, पुरानी रजिस्ट्रियां और नया डायवर्जन, चारों कड़ियां एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई दे रही हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ग्वालियर के सर्वे नंबर 302 का विवाद क्या है?

यह विवाद जमीन के रिकॉर्ड, GDA के स्वामित्व, पुरानी रजिस्ट्रियों और नए डायवर्जन को लेकर है। इसी सर्वे नंबर में एक तरफ पुरानी रजिस्ट्रियों को बेअसर माना गया, वहीं करीब 34,070 वर्गमीटर चरनोई जमीन का आवासीय डायवर्जन दर्ज हो गया।

किस जमीन पर पुरानी रजिस्ट्रियां बेअसर मानी गईं?

ग्राम मऊ के सर्वे नंबर 302, 764, 765, 768, 769 और 770 की करीब 25 बीघा 8 बिस्वा जमीन पर 2001-02 की रजिस्ट्रियां विवाद में आईं। यह जमीन 1989 में GDA की महाराजपुरा आवासीय योजना के लिए नोटिफाइड बताई गई थी।

सर्वे 302 की चरनोई जमीन का क्या हुआ?

इसी सर्वे नंबर 302 से जुड़ी करीब 34,070 वर्गमीटर, यानी लगभग 16 बीघा चरनोई जमीन का कृषि से आवासीय डायवर्जन ऑनलाइन पोर्टल से जनवरी 2026 में दर्ज हुआ। इसके लिए ₹7,49,540 प्रीमियम और भू-राजस्व जमा कराया गया।

अपर आयुक्त ने क्या आदेश दिया?

4 अगस्त 2026 को अपर आयुक्त वीरेंद्र कुमार ने एसडीएम का आदेश निरस्त कर दिया। आदेश में कहा गया कि विशेष परिस्थितियों में प्राधिकरण करार के जरिए जमीन अर्जित कर सकता है।

यह मामला गंभीर क्यों माना जा रहा है?

क्योंकि एक ही सर्वे नंबर में GDA से जुड़ी नोटिफाइड जमीन, बाद की रजिस्ट्रियां और चरनोई जमीन के आवासीय डायवर्जन जैसी अलग-अलग प्रक्रियाएं सामने आई हैं। इससे राजस्व रिकॉर्ड पर सवाल उठे हैं।

#gda#gwalior#land dispute#चरनोई जमीन#सर्वे 302

सबसे ज़्यादा पढ़ी गई

  1. 1

    बहराइच में महिला की अश्लील तस्वीरों से ब्लैकमेल कर पांच लाख रुपये वसूलने वाला …

  2. 2

    भाजपा ने निष्कासित नेता की सपा एंट्री पर अखिलेश यादव को घेरा

  3. 3

    गणेश प्रतिमा विसर्जन से पहले बहराइच में डीएम-एसपी ने सुरक्षा व्यवस्था का लिया जायजा

  4. 4

    बहराइच: भावुक सुसाइड नोट लिखकर की युवक ने की आत्महत्या

  5. 5

    थाना रुपईडीहा क्षेत्र में शातिर अपराधियों से हुई रूपईडीहा पुलिस की मुठभेड़।

टिप्पणियाँ

अभी कोई टिप्पणी नहीं। पहली टिप्पणी करें।

टिप्पणियाँ समीक्षा के बाद प्रकाशित होती हैं।