सिकल सेल बीमारी का कलंक खत्म करने की जरूरत: डॉक्टर
सिकल सेल बीमारी पर बात करना आम बनाएं, ताकि कलंक खत्म हो: डॉक्टर बेंगलुरु: सिकल सेल बीमारी से एक दशक तक जूझने वाली एक लड़की को देर से इलाज मिलने के कारण गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ा।
बेंगलुरु: सिकल सेल बीमारी से एक दशक तक जूझने वाली एक लड़की को देर से इलाज मिलने के कारण गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ा। यह मामला दिखाता है कि इस अनुवांशिक बीमारी से जुड़े कलंक का कितना नुकसान हो सकता है। 10 साल की उम्र में इस बीमारी का पता चला, लेकिन उसे सिर्फ इमरजेंसी में ही इलाज मिलता था। इस वजह से उसकी तिल्ली (spleen) काफी बढ़ गई, तेज दर्द और पित्ताशय में पथरी हो गई। आखिरकार उसकी तिल्ली और पित्ताशय को हटाना पड़ा।
अब 21 साल की हो चुकी यह लड़की और उसका परिवार एक नई चुनौती का सामना कर रहे हैं। शादी के लिए लड़का ढूंढते वक्त यह सवाल उठता है कि क्या उसकी बीमारी के बारे में बताया जाए या नहीं। यह दुविधा दिखाती है कि सिकल सेल बीमारी से जुड़ा कलंक कितना गहरा है, जो परिवारों को समय पर इलाज कराने या इस बीमारी पर खुलकर बात करने से रोकता है।
डॉक्टरों का कहना है कि यह कलंक सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक, शैक्षिक और पारिवारिक रिश्तों पर भी असर डालता है। साकरा वर्ल्ड हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, डॉ विजय कुमार श्रीनिवासालु ने कहा, "भारत में हुए शोध बताते हैं कि करीब हर चार में से एक मरीज और लगभग आधे केयरगिवर्स को इस बीमारी से जुड़े भारी कलंक का सामना करना पड़ता है।" उन्होंने यह भी कहा कि भारत में "genetic" शब्द भी एक सामाजिक बोझ बन गया है, क्योंकि लोग डरते हैं कि उनके परिवार को 'खराब जीन' वाला समझा जाएगा।
डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों पर जहां खुलकर बात होती है, वहीं सिकल सेल बीमारी वाले परिवार इस पर चर्चा करने से बचते हैं। इस बीमारी से जुड़े शारीरिक बदलाव जैसे उभरे हुए माथे, गाल की हड्डियां, छोटा निचला जबड़ा, बाहर निकले हुए ऊपरी दांत, लगातार पीलिया और कम कद भी कलंक को बढ़ाते हैं। इन वजहों से परिवार नियमित फॉलो-अप के लिए नहीं जाते, जिससे इलाज में रुकावट आती है।
यह कलंक बच्चों पर भावनात्मक रूप से भी भारी पड़ता है। स्पर्श हॉस्पिटल, आरआर नगर की एसोसिएट कंसल्टेंट, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, डॉ विशाखा पनिकर ने बताया कि स्कूल जाने वाले बच्चे अक्सर टीचर्स की गलतफहमी का शिकार होते हैं, जो थकान, दर्द या गैरहाजिरी को आलस समझ लेते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों को सुरक्षित और स्वीकार्य महसूस कराने के लिए खुली बातचीत, उम्र के हिसाब से काउंसलिंग और परिवार का सपोर्ट जरूरी है।
किशोरावस्था में यह समस्या और बढ़ जाती है। इस उम्र में बच्चे समाज के नजरिए, शरीर की बनावट, पढ़ाई और रिश्तों को लेकर ज्यादा जागरूक हो जाते हैं। कई बार वे अपने दर्द को छिपाते हैं, दोस्तों के सामने दवा लेने से कतराते हैं या अस्पताल जाने में शर्म महसूस करते हैं। शादी और करियर को लेकर चिंताएं भी उन्हें भावनात्मक रूप से अलग-थलग कर सकती हैं।
शादी और मां बनने का विषय सिकल सेल बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए खासतौर पर संवेदनशील होता है। रामैया मेमोरियल हॉस्पिटल की कंसल्टेंट, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, डॉ रश्मि पलासेरी ने बताया कि अगर सिकल सेल बीमारी से पीड़ित व्यक्ति किसी carrier से शादी करता है, तो उनके बच्चों में यह बीमारी आने का खतरा रहता है। इसके अलावा, इस बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा हाइड्रोक्सीयूरिया का लंबे समय तक सेवन प्रेग्नेंसी के दौरान चुनौती बन सकता है, जिसके लिए सावधानी और मॉनिटरिंग की जरूरत होती है।
इन समस्याओं से निपटने के लिए डॉक्टर जागरूकता बढ़ाने, genetic counselling, शुरुआती carrier screening और सिकल सेल बीमारी पर खुलकर बात करने की वकालत कर रहे हैं। उनका मानना है कि इन कदमों से कलंक कम होगा और मरीजों को बेहतर इलाज मिल सकेगा।
सिकल सेल बीमारी क्या है?
सिकल सेल बीमारी एक अनुवांशिक ब्लड डिसऑर्डर है, जिसमें हीमोग्लोबिन (जो खून में ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है) असामान्य रूप ले लेता है। इस वजह से लाल रक्त कोशिकाएं सख्त, चिपचिपी और हंसिए या अर्धचंद्राकार आकार की हो जाती हैं। ये कोशिकाएं ब्लड फ्लो को रोक सकती हैं, जिससे तेज दर्द, एनीमिया और कई अंगों को लंबे समय तक नुकसान हो सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सिकल सेल बीमारी से जुड़ा कलंक क्या है और यह परिवारों को कैसे प्रभावित करता है?
सिकल सेल बीमारी से जुड़ा कलंक एक अनुवांशिक बीमारी होने की वजह से समाज में लोगों को भारी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। भारत में हुए शोध के अनुसार हर चार में से एक मरीज और लगभग आधे देखभाल करने वाले इससे जुड़े कलंक का सामना करते हैं। यह कलंक परिवारों को समय पर इलाज कराने, खुलकर बीमारी के बारे में बात करने और शादी जैसे महत्वपूर्ण फैसलों में भी बाधा डालता है।
क्या सिकल सेल बीमारी वाले बच्चों को स्कूल में समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
हां, स्कूल जाने वाले बच्चों को अक्सर टीचर्स की गलतफहमी का शिकार होना पड़ता है। टीचर्स बीमारी की वजह से होने वाली थकान, दर्द या गैरहाजिरी को आलस समझ लेते हैं। इसके अलावा, बीमारी के कारण शारीरिक बदलाव भी बच्चों को सामाजिक दबाव और भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
सिकल सेल बीमारी में शादी और मां बनना कितना जटिल हो सकता है?
यह विषय सिकल सेल बीमारी वाले लोगों के लिए बहुत संवेदनशील है। अगर किसी सिकल सेल रोगी की शादी किसी carrier से हो तो बच्चों में यह बीमारी आने का खतरा रहता है। इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाली दवा हाइड्रोक्सीयूरिया से प्रेग्नेंसी के दौरान जटिलताएं भी हो सकती हैं, जिसके लिए सावधानी और निरंतर निगरानी की जरूरत पड़ती है।
देर से इलाज मिलने से सिकल सेल बीमारी में क्या गंभीर समस्याएं हो सकती हैं?
देर से इलाज के कारण गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं जैसे तिल्ली में असामान्य वृद्धि, तेज दर्द, पित्ताशय में पथरी और अन्य अंगों को नुकसान। कलंक की वजह से परिवार नियमित फॉलो-अप के लिए नहीं जाते, जिससे इलाज में रुकावट आती है और स्थिति और गंभीर हो सकती है।
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