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आंध्र प्रदेश में थ्रीडी कंक्रीट प्रिंटिंग से बनेंगे 177 ग्रामीण घर

आंध्र प्रदेश के बुर्रिपलेम और पोथुरु में पीएमएवाई-जी के तहत 3D कंक्रीट प्रिंटिंग से 177 ग्रामीण घर बनाए जाएंगे।

आंध्र प्रदेश में थ्रीडी कंक्रीट प्रिंटिंग से बनेंगे 177 ग्रामीण घर
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3D कंक्रीट प्रिंटिंग से आंध्र प्रदेश में घरों का निर्माण शुरू | समझिए

3D कंक्रीट प्रिंटिंग से आंध्र प्रदेश में घरों का निर्माण शुरू | समझिए

आंध्र प्रदेश में प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण यानी पीएमएवाई-जी योजना के तहत 3D कंक्रीट प्रिंटिंग से बनाए जाने वाले ग्रामीण घरों के लिए राष्ट्रीय स्तर का पायलट प्रोजेक्ट शुरू होने जा रहा है। इसकी शुरुआत बुर्रिपलेम और पोथुरु में बनने वाली आवासीय इकाइयों से होगी।

इस पहल की शुरुआत 4 अक्टूबर को होगी। गुंटूर जिले के बुर्रिपलेम में 100 आवासीय इकाइयां बनाई जाएंगी, जबकि पोथुरु में 77 इकाइयां बनाई जाएंगी। यह सरकारी योजना के तहत ग्रामीण आवास के लिए निर्माण के बड़े स्तर वाले ऑटोमेशन के इस्तेमाल की दिशा में एक अहम कदम है।

आंध्र प्रदेश के प्रोजेक्ट में क्या शामिल है

इस प्रोजेक्ट पर टैक्स को छोड़कर ₹13.93 करोड़ खर्च होंगे। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय यानी एमओआरडी की ओर से ₹9.44 करोड़ दिए जाएंगे, जबकि राज्य सरकार ₹4.49 करोड़ देगी।

इस पायलट प्रोजेक्ट के जरिए 3D कंक्रीट प्रिंटिंग को सार्वजनिक आवास कार्यक्रम में शामिल किया जा रहा है। अभी तक यह तकनीक मुख्य रूप से प्रयोग के तौर पर या निजी तौर पर बनाए गए ढांचों तक सीमित रही है। विशाखापत्तनम स्थित जीवीपी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस प्रो. पी. वीरभद्र राव ने द हिंदू से कहा कि ऑटोमेशन की ओर बढ़ता रुख देश में आवास विकास की पूरी तस्वीर बदल सकता है।

प्रो. राव और उनकी रिसर्च टीम ने 3Dसीपी मॉडल पर बड़े स्तर पर रिसर्च की है। इसलिए इस प्रोजेक्ट में सरकार के समर्थन वाले आवास निर्माण कार्यक्रम के साथ-साथ निर्माण प्रक्रिया, इस्तेमाल होने वाली सामग्री और ऐसे ढांचों के लिए जरूरी ऑटोमेशन पर रिसर्च भी शामिल है।

3D कंक्रीट प्रिंटिंग कैसे काम करती है

निर्माण के बड़े स्तर पर होने वाली एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग को आम तौर पर 3D कंक्रीट प्रिंटिंग कहा जाता है। इसमें ईंट-पत्थर लगाने के पारंपरिक तरीके और एक के बाद एक किए जाने वाले मैनुअल काम की जगह कंप्यूटर से नियंत्रित सिस्टम का इस्तेमाल होता है। एक रोबोटिक प्रिंटर डिजिटल बिल्डिंग इन्फॉर्मेशन मॉडलिंग यानी बीआईएम डिजाइन को एक वास्तविक ढांचे में बदलता है। इसके लिए खास तौर पर तैयार किए गए सीमेंट आधारित पदार्थ को एक नोजल के जरिए बाहर निकाला जाता है।

यह पदार्थ एक के ऊपर एक, लगातार क्षैतिज परतों में डाला जाता है। इस प्रक्रिया में मटेरियल साइंस और ऑटोमेशन की बहुत अहम भूमिका होती है, क्योंकि गीले मिश्रण में सही तरीके से बाहर निकलने, अपनी जगह पर टिके रहने और जल्दी जमने की क्षमता होनी चाहिए।

इन खूबियों की जरूरत इसलिए होती है ताकि हर परत को बिना ढांचे के अपने वजन से गिरने के जमा किया जा सके और वह अपनी जगह पर टिकी रहे। इसलिए यह तरीका सिर्फ एक बड़े प्रिंटर को चलाने तक सीमित नहीं है। इसमें डिजाइन सिस्टम, रोबोटिक उपकरण और सीमेंट आधारित मिश्रण, इन सभी का एक साथ सही तरीके से काम करना जरूरी है।

दुनिया में हुए प्रयोगों से भारत तक

निर्माण के बड़े स्तर पर प्रिंटिंग की बुनियाद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अकादमिक संस्थानों और इंडस्ट्री की ओर से किए गए शुरुआती प्रयोगों में पड़ी। इसके बाद यह तकनीक अमेरिका, चीन, यूरोप और पश्चिम एशिया समेत कई इलाकों में आगे बढ़ी।

भारत में इस क्षेत्र में काम ने 2021 में रफ्तार पकड़ी। उसी साल आईआईटी मद्रास ने स्टार्टअप त्वस्ता के साथ मिलकर अपने कैंपस में देश का पहला 3D प्रिंटेड एक मंजिला घर पेश किया।

दूसरे देशों में भी यह तकनीक शुरुआती प्रयोगों से आगे बढ़ चुकी है। प्रो. राव ने कहा, “दुनिया भर में दुबई में कई मंजिलों वाली प्रिंटिंग की उपलब्धियां, टेक्सस में आइकॉन के आधुनिक वल्कन प्रिंटर और मियागी प्रीफेक्चर में जापान के भूकंप के नियमों के मुताबिक बनाए गए ढांचों जैसे उदाहरणों ने धीरे-धीरे इस तकनीक को प्रयोग के दौर से निकालकर कड़े नियमों वाले व्यावसायिक माहौल तक पहुंचाया है।”

दुबई बड़े स्तर पर निर्माण के लिए 3D प्रिंटिंग के दुनिया के प्रमुख केंद्रों में से एक बनकर उभरा है। प्रो. राव ने बताया कि दुबई म्युनिसिपैलिटी ने 2021 में 3D प्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल करके दो मंजिलों वाली 640-वर्ग-मीटर की इमारत बनाई थी।

इस तकनीक का इस्तेमाल कहां हो सकता है

इस तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ प्रयोग के तौर पर बनाए जाने वाले आवासीय घरों तक सीमित नहीं है। ऑटोमेटेड निर्माण को जरूरी बुनियादी ढांचे की कमी से निपटने के एक संभावित तरीके के तौर पर देखा जा रहा है।

भारत में इस तकनीक को किफायती आवास मिशन, आपदा राहत के लिए बनाए जाने वाले आश्रय, दूरदराज इलाकों में तैनाती, रक्षा संबंधी मजबूत ढांचे और तेजी से खड़ी की जाने वाली सार्वजनिक सुविधाओं के लिए इस्तेमाल के हिसाब से तैयार किया जा रहा है। दूरदराज के समुदायों में इसके इस्तेमाल से स्थानीय स्तर पर राजमिस्त्री के कौशल पर निर्भरता कम हो सकती है। साथ ही, एक जैसे डिजाइन वाले घरों का तेजी से निर्माण भी संभव हो सकता है।

जनकल्याण के लिहाज से इसकी अहमियत इस संभावना में है कि जहां तुरंत घरों या बुनियादी ढांचे की जरूरत हो, वहां इस तरह का निर्माण किया जा सके। आंध्र प्रदेश का पायलट प्रोजेक्ट इस संभावना को ग्रामीण आवास कार्यक्रम के दायरे में लाता है। इसके जरिए इस तरीके को बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने का एक प्रोजेक्ट भी सामने आता है।

फायदे और सीमाएं

3D प्रिंटिंग के सबसे बड़े फायदों में तेजी, मटेरियल की कम बर्बादी और लकड़ी या स्टील से बनाए जाने वाले पारंपरिक फॉर्मवर्क की जरूरत खत्म होना शामिल है। आंध्र प्रदेश में शुरू होने वाले पायलट प्रोजेक्ट जैसे कार्यक्रमों से उम्मीद है कि एक आवासीय इकाई के निर्माण का समय घटकर लगभग 45 से 60 दिन रह जाएगा।

प्रिंट किए गए ढांचे बेहतर थर्मल कम्फर्ट भी देते हैं और इनके अंदर का माहौल ज्यादा ठंडा रहता है। इन खूबियों की वजह से यह तकनीक उन आवास कार्यक्रमों के लिए अहम हो जाती है, जहां निर्माण का समय, मटेरियल का इस्तेमाल और घर में रहने की परिस्थितियां महत्वपूर्ण होती हैं।

हालांकि, 3D प्रिंटिंग से पारंपरिक निर्माण की जरूरत पूरी तरह खत्म नहीं होती। नींव, ढांचे को मजबूती देने वाला रिइनफोर्समेंट, छत, बिजली की कंड्यूट, प्लंबिंग, दरवाजे और खिड़कियों के लिए अब भी हाइब्रिड या पारंपरिक तरीकों की जरूरत होती है।

मटेरियल की टिकाऊपन अब भी एक चुनौती है। इसके अलावा कड़े स्ट्रक्चरल कोड, प्रिंटर को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने की सुविधा और रेगुलेटरी मंजूरियां भी चुनौती बनी हुई हैं। इसलिए इस तकनीक को सिविल इंजीनियरिंग की पहले से स्थापित प्रक्रियाओं के साथ काम करना होगा। यह निर्माण के हर चरण की जगह नहीं ले सकती।

अब आगे क्या होगा

आर्किटेक्चर के भविष्य में एक ऐसा सहयोग वाला हाइब्रिड सिस्टम होने की उम्मीद है, जिसमें रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बीआईएम और पारंपरिक सिविल इंजीनियरिंग एक साथ काम करें। इस मॉडल में ऑटोमेटेड प्रिंटिंग को उन पारंपरिक कामों के साथ जोड़ा जाएगा, जो नींव, सेवाओं, छत और इमारत के दूसरे हिस्सों के लिए अब भी जरूरी हैं।

इस तकनीक के विकास के लिए सीएसआईआर-सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट जैसे रिसर्च और अकादमिक संस्थानों, केंद्र और राज्य के मंत्रालयों और निजी इनोवेटर्स के बीच करीबी तालमेल की जरूरत होगी। ऑटोमेटेड तरीके से बनाए गए इमारत के हिस्सों को मान्यता देने के लिए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क में भी बदलाव करना होगा।

बड़े स्तर पर इस्तेमाल तभी हो सकेगा, जब लंबे समय तक ढांचे की मजबूती और आर्थिक रूप से इसके व्यावहारिक होने को साबित किया जा सके। इसलिए आंध्र प्रदेश का यह पायलट प्रोजेक्ट सिर्फ उन घरों की वजह से महत्वपूर्ण नहीं है, जिन्हें इसके तहत बनाया जाना है। यह तय करने के लिए भी अहम है कि 3D कंक्रीट प्रिंटिंग बड़े सार्वजनिक आवास कार्यक्रमों की तकनीकी, रेगुलेटरी और आर्थिक जरूरतों को पूरा कर सकती है या नहीं।

स्रोत सामग्री 03 अक्टूबर, 2026 को 02:21 pm IST पर प्रकाशित हुई थी।

स्रोत: The Hindu

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आंध्र प्रदेश में 3D कंक्रीट प्रिंटिंग से कितने ग्रामीण घर बनाए जाएंगे?

गुंटूर जिले के बुर्रिपलेम में 100 और पोथुरु में 77, यानी कुल 177 ग्रामीण घर बनाए जाएंगे।

इस पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत कब और कहां होगी?

इस पहल की शुरुआत 4 अक्टूबर को होगी। इसकी शुरुआत बुर्रिपलेम और पोथुरु में बनने वाली आवासीय इकाइयों से होगी।

इस प्रोजेक्ट पर कितना खर्च आएगा?

प्रोजेक्ट पर टैक्स को छोड़कर ₹13.93 करोड़ खर्च होंगे। इसमें केंद्र सरकार ₹9.44 करोड़ और राज्य सरकार ₹4.49 करोड़ देगी।

3D कंक्रीट प्रिंटिंग से घर कैसे बनाए जाते हैं?

कंप्यूटर से नियंत्रित रोबोटिक प्रिंटर खास सीमेंट आधारित मिश्रण को नोजल से निकालकर एक के ऊपर एक क्षैतिज परतों में जमा करता है।

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