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अडूर महालिंगेश्वर मंदिर में मिली सदियों पुरानी तोपें इतिहास का नया अध्याय

अडूर महालिंगेश्वर मंदिर में सदियों पुरानी तोपें इतिहास की गवाह सदियों पुरानी तोपें अडूर महालिंगेश्वर मंदिर के इतिहास को बनाती हैं खास केरल के कासरगोड जिले में स्थित अडूर महालिंगेश्वर मंदिर में रखी गई

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सदियों पुरानी तोपें अडूर महालिंगेश्वर मंदिर के इतिहास को बनाती हैं खास

केरल के कासरगोड जिले में स्थित अडूर महालिंगेश्वर मंदिर में रखी गई दो प्राचीन तोपें इन दिनों इतिहासकारों की खास दिलचस्पी का केंद्र बनी हुई हैं। माना जा रहा है कि ये तोपें 18वीं सदी या उससे भी पहले की हैं और इन्हें मोबाइल फील्ड आर्टिलरी के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था। विशेषज्ञों का मानना है कि ये तोपें स्थानीय स्तर पर बनाई गई हो सकती हैं।

इतिहास से जुड़ा मंदिर

डेलमपडी ग्राम पंचायत में स्थित अडूर महालिंगेश्वर मंदिर पहले से ही एक ऐतिहासिक और वास्तुशिल्पीय धरोहर माना जाता है। 10वीं सदी में बने इस मंदिर की खासियत है इसका गजपृष्ठ शैली का वास्तुशिल्प, प्रसिद्ध अडूर शिलालेख और बलिक्कल (बलि पत्थर) व सत्यकल्लु (सत्य पत्थर) जैसे अनोखे तत्व। अब इन तोपों की खोज ने मंदिर के पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ा दिया है।

दुर्लभ तोपों पर शोधकर्ताओं की नजर

कन्हनगड के नेहरू आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज के इतिहासकार डॉ. नंदकुमार कोरथ ने हाल ही में अडूर शिलालेख का अध्ययन करने के दौरान इन तोपों का निरीक्षण किया। उन्होंने बताया कि ये तोपें एक मिश्रधातु से बनी हैं और इनकी लंबाई क्रमशः 96 सेंटीमीटर और 90 सेंटीमीटर है। इनका डिज़ाइन ऐसा है कि इन्हें पहियों वाले गाड़ियों पर लगाया जा सके और ऊपर से बारूद भरा जा सके। इससे पता चलता है कि इनका इस्तेमाल सैन्य अभियानों में पोर्टेबल आर्टिलरी के तौर पर किया गया होगा।

इन तोपों पर किसी भी यूरोपीय निशान या निर्माण जानकारी का अभाव है, जिससे संकेत मिलता है कि ये स्थानीय स्तर पर बनाई गई होंगी और 1800 के आसपास दक्षिण कन्नड़ में ब्रिटिश शासन से पहले की हैं। हालांकि, इनकी सटीक उत्पत्ति अब भी अनिश्चित है क्योंकि कोई शिलालेख या रिकॉर्ड इन्हें किसी विशेष शासक या युद्ध से नहीं जोड़ता।

टीपू सुल्तान का कनेक्शन: इतिहास या लोककथा?

स्थानीय लोककथाएं इन तोपों को 18वीं सदी के अंत में टीपू सुल्तान के सैन्य अभियानों से जोड़ती हैं। मंदिर पुनर्निर्माण समिति के स्वयंसेवक बालकृष्णन अडूर के मुताबिक, माना जाता है कि टीपू सुल्तान स्थानीय जमींदारों के खिलाफ अभियान के दौरान इस मंदिर तक पहुंचे थे और इसे लूटने का इरादा था। हालांकि, इस कहानी को साबित करने के लिए कोई लिखित प्रमाण नहीं है और इतिहासकार इस दावे को लेकर सतर्क हैं।

अतीत की अनसुलझी गुत्थी

बताया जाता है कि ये तोपें पहले मंदिर परिसर के किसी अन्य हिस्से में मिली थीं और बाद में संरक्षण के लिए वर्तमान स्थान पर लाई गईं। मंदिर और पास के स्कूल के पास खुदाई के दौरान लोहे के बड़े गोले भी मिले, जिन्हें तोप के गोले माना जा रहा है। इससे यह रहस्य और गहरा गया है।

कन्नड़ विद्वान एन. राधाकृष्ण, जिन्होंने मंदिर के शिलालेखों का अध्ययन किया है, बताते हैं कि इन शिलालेखों में कुम्बला राजवंश के शासकों द्वारा किए गए दान का जिक्र है, लेकिन तोपों की उत्पत्ति के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। उन्होंने कहा, "इन तोपों को टीपू सुल्तान या किसी विशेष युद्ध से जोड़ने का कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है।" उन्होंने यह भी बताया कि इस तरह की परंपराएं अन्य मंदिरों में भी हैं, लेकिन उनके पास ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।

इतिहास की गवाही

अडूर महालिंगेश्वर मंदिर की तोपें आज भी एक रहस्य बनी हुई हैं। ये क्षेत्र के अशांत इतिहास की झलक तो देती हैं, लेकिन उनकी उत्पत्ति और उद्देश्य को लेकर सवाल खड़े करती हैं। इन तोपों की मौजूदगी और मंदिर की समृद्ध वास्तुकला व शिलालेखीय धरोहर इस प्राचीन स्थल के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को और खास बनाती है।

स्रोत: The Hindu

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अडूर महालिंगेश्वर मंदिर में किस प्रकार की तोपें मिली हैं?

मंदिर में सदियों पुरानी दो प्राचीन तोपें मिली हैं जो 18वीं सदी या उससे पहले की हो सकती हैं।

इन तोपों का इस्तेमाल कैसे किया जाता था?

इन तोपों का इस्तेमाल मोबाइल फील्ड आर्टिलरी के तौर पर किया जाता था।

क्या इन तोपों की कोई विशेष पहचान है?

इन तोपों पर किसी भी यूरोपीय निशान या निर्माण जानकारी का अभाव है, जिससे संकेत मिलता है कि ये स्थानीय स्तर पर बनाई गई होंगी।

क्या इन तोपों का टीपू सुल्तान से कोई संबंध है?

स्थानीय लोककथाएं इन तोपों को टीपू सुल्तान के सैन्य अभियानों से जोड़ती हैं, लेकिन इस दावे का कोई लिखित प्रमाण नहीं है।

तोपों की उत्पत्ति के बारे में क्या जानकारी है?

तोपों की सटीक उत्पत्ति अब भी अनिश्चित है क्योंकि कोई शिलालेख या रिकॉर्ड इन्हें किसी विशेष शासक या युद्ध से नहीं जोड़ता।

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