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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने श्रावस्ती एनकाउंटर की CBI से जांच का आदेश दिया

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने श्रावस्ती के इकौना में हुए एक कथित पुलिस एनकाउंटर को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने श्रावस्ती एनकाउंटर की CBI से जांच का आदेश दिया
Image credit: News Darpan Team

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने श्रावस्ती के इकौना में हुए एक कथित पुलिस एनकाउंटर को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन के एनकाउंटर की CBI से जांच कराने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस की FIR में दिया गया पूरा घटनाक्रम पहली नजर में ही सही नहीं लगता और मामले की असलियत जानने के लिए स्वतंत्र एजेंसी से गहरी जांच जरूरी है।

मामला मई 2025 का है जब इकौना थाने में 7 साल की बच्ची को ले जाने के आरोप में FIR दर्ज हुई थी। पुलिस के मुताबिक 12 मई को आरोपी अलाउद्दीन को नेपाल की तरफ भागते वक्त अंधरपुरवा पुल के पास घेरा गया। तत्कालीन SHO अश्विनी कुमार दुबे का दावा था कि आरोपी ने पहले फायरिंग की और जवाबी कार्रवाई में SHO ने अपनी 9 MM सर्विस पिस्टल से दो गोलियां चलाईं जो अलाउद्दीन के दोनों पैरों में लगीं। लेकिन हाईकोर्ट ने इस पूरी कहानी में कई गंभीर खामियां निकाली हैं।

कोर्ट ने सवाल उठाया कि FIR के मुताबिक 13 पुलिसकर्मी एक ही गाड़ी में कैसे सवार थे और फिर वही टीम तीन हिस्सों में बंटकर तीन अलग रास्तों पर कैसे चली गई। बाद में SWAT समेत कुल 23 पुलिसकर्मी मौके पर बताए गए लेकिन FIR में दूसरे वाहन का जिक्र तक नहीं है। कोर्ट को यह भी अजीब लगा कि 23 पुलिसवालों से घिरे एक शख्स ने तमंचे से फायर किया लेकिन कोई पुलिसकर्मी घायल नहीं हुआ जबकि SHO की रात में करीब 15 मीटर दूर से चलाई गई दोनों गोलियां सीधे आरोपी के दोनों पैरों में लगीं। कोर्ट ने आरोपी की मेडिकल रिपोर्ट में दर्ज घावों और 9 MM गोली के आकार को लेकर भी SHO के जवाब को तर्कसंगत नहीं माना।

अदालत ने कड़ी टिप्पणी की कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि SHO ने FIR में सही बात नहीं बताई और कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश की। दिलचस्प बात यह है कि कथित एनकाउंटर में शामिल सभी 23 पुलिसकर्मियों को उनके अच्छे काम के लिए पुरस्कृत किया गया था। अलाउद्दीन वही शख्स है जिसे 2012 में छह साल की बच्ची के रेप और हत्या के मामले में फांसी की सजा हुई थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2022 को उसे बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने तब जांच और अभियोजन की गंभीर कमियों पर टिप्पणी की थी। अब हाईकोर्ट ने यह संभावना भी जताई है कि सुप्रीम कोर्ट की उन टिप्पणियों के कारण पुलिस की आरोपी के प्रति नाराजगी हो सकती है।

13 अगस्त 2026 के आदेश में हाईकोर्ट ने CBI को FIR नंबर 113/2025 में लगाए गए आरोपों और कथित एनकाउंटर की सत्यता की स्वतंत्र जांच करने को कहा है। CBI जांच में तत्कालीन SHO अश्विनी कुमार दुबे की शूटिंग क्षमता भी जांची जाएगी खासतौर पर यह कि क्या वह रात में करीब 15 मीटर की दूरी से केवल हथियार लोड की आवाज सुनकर 9 MM पिस्टल से सटीक निशाना लगा सकते थे। कोर्ट ने CBI को तीन महीने में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है और श्रावस्ती के एडिशनल सेशंस जज के 2 जुलाई 2026 के उस आदेश पर भी अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है जिसमें अलाउद्दीन की डिस्चार्ज अर्जी खारिज की गई थी। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 को होगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने श्रावस्ती एनकाउंटर की जांच के लिए क्या आदेश दिया?

हाईकोर्ट ने अलाउद्दीन के एनकाउंटर की CBI से स्वतंत्र जांच कराने का आदेश दिया है। कोर्ट को पुलिस की FIR में दी गई पूरी कहानी संदिग्ध लगी और उसने कहा कि असलियत जानने के लिए स्वतंत्र एजेंसी से गहरी जांच जरूरी है।

हाईकोर्ट को पुलिस की कहानी में क्या संदेह हुआ?

कोर्ट ने कई सवाल उठाए - 13 पुलिसकर्मी एक गाड़ी में कैसे बैठे थे, 23 पुलिसवालों से घिरा शख्स फायर करे लेकिन कोई पुलिसकर्मी घायल न हो, और SHO की रात में 15 मीटर दूर से चलाई गई दोनों गोलियां बिल्कुल सटीक कैसे लगीं। कोर्ट को लगा कि SHO ने FIR में सही बात नहीं बताई।

अलाउद्दीन कौन है और उसका क्या इतिहास है?

अलाउद्दीन को 2012 में एक छह साल की बच्ची के रेप और हत्या के मामले में फांसी की सजा हुई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2022 को उसे बरी कर दिया क्योंकि जांच और अभियोजन में गंभीर कमियां थीं।

CBI को जांच में क्या करना है?

CBI को FIR में लगाए गए आरोपों और कथित एनकाउंटर की सत्यता की जांच करनी है। इसमें SHO अश्विनी कुमार दुबे की शूटिंग क्षमता की भी जांच होगी - खासतौर पर यह कि क्या वह रात में 15 मीटर दूर से सटीक निशाना लगा सकते थे। CBI को तीन महीने में रिपोर्ट देनी है।

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