तमिलनाडु में मुख्यमंत्री रोड सेफ्टी मिशन का ऐलान, करीब ₹500 करोड़ सालाना बजट
तमिलनाडु सरकार ने मुख्यमंत्री रोड सेफ्टी मिशन का ऐलान किया है। मिशन के लिए हर साल करीब ₹500 करोड़ बजट रखा जाएगा।
मिशन से कार्रवाई तक, तमिलनाडु में सड़क सुरक्षा का भविष्य
मिशन से कार्रवाई तक, तमिलनाडु में सड़क सुरक्षा का भविष्य
तमिलनाडु ने विधानसभा में मुख्यमंत्री रोड सेफ्टी मिशन का ऐलान किया है। इसके लिए हर साल करीब ₹500 करोड़ का बजट रखे जाने की बात सामने आई है। यह ऐलान ऐसे समय हुआ है, जब सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के हाल में जारी 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, देश के सभी राज्यों में तमिलनाडु में सड़क हादसों की संख्या सबसे ज्यादा दर्ज की गई है।
MoRTH के आंकड़ों में तमिलनाडु में 67,526 सड़क हादसे और 18,449 मौतें दर्ज हैं। पूरे भारत के लिए इसी आंकड़े में 4,87,707 सड़क हादसे और 1,77,175 मौतें दर्ज की गई हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि सड़क सुरक्षा के लिए अलग-अलग और छोटे-छोटे कदम उठाना ही काफी नहीं है। इसके लिए अलग-अलग कामों को जोड़कर, लगातार और लंबे समय तक कार्रवाई करना जरूरी है।
एक बड़ी और लगातार बनी हुई चुनौती का जवाब
इन आंकड़ों का स्तर बताता है कि सड़क सुरक्षा ऐसे सार्वजनिक मुद्दों में शामिल है, जिन पर लगातार ध्यान, अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल और तय संसाधनों की जरूरत है। आंकड़ों में तमिलनाडु की स्थिति, खास तौर पर राज्यों के बीच सड़क हादसों की सबसे ज्यादा दर्ज संख्या, इस बात को साफ करती है कि पहले से चल रहे कामों को एक साझा ढांचे के तहत लाना कितना जरूरी है।
मिशन मोड में काम करने का प्रस्ताव इस समझ पर आधारित है कि सड़क सुरक्षा से कई विभाग, एजेंसियां और अलग-अलग समय-सीमाएं जुड़ी हुई हैं। यह तरीका उन जटिल सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों के लिए अपनाए जाने वाले बड़े मिशन मोड के तरीके जैसा है, जहां आगे बढ़ने के लिए एजेंसियों के बीच तालमेल, मापे जा सकने वाले लक्ष्य, लगातार निगरानी और लंबे समय तक मिलने वाली फंडिंग जरूरी होती है।
सिटिजन कंज्यूमर एंड सिविक एक्शन ग्रुप (CAG), रोड सेफ्टी नेटवर्क के सदस्य के तौर पर, पहले सड़क सुरक्षा के लिए नेशनल रोड सेफ्टी मिशन की जरूरत को लेकर राज्यसभा सांसद तिरुचि शिवा से बातचीत कर चुका है। इस साल की शुरुआत में श्री शिवा ने इस प्रस्ताव को संसद में भी उठाया था। राष्ट्रीय स्तर के मिशन को लेकर हुई चर्चा से तमिलनाडु के अपने मुख्यमंत्री रोड सेफ्टी मिशन के ऐलान को एक बड़ा संदर्भ मिलता है।
पहले से मौजूद संस्थाओं को एक साथ लाना
तमिलनाडु का यह ऐलान राज्य में पहले से चल रहे सड़क सुरक्षा के कामों को मजबूत करने और उन्हें एक साथ लाने का मौका देता है। घोषित उपायों में एएनपीआर कैमरों के जरिए टेक्नोलॉजी आधारित निगरानी और कार्रवाई, सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाना और इन सुविधाओं को हादसों के लिहाज से संवेदनशील जगहों से जोड़ना शामिल है, ताकि आपात स्थिति में प्रतिक्रिया को मजबूत किया जा सके।
तमिलनाडु में सड़क सुरक्षा के अलग-अलग पहलुओं पर काम करने वाली कई संस्थाएं, समितियां और पहल पहले से मौजूद हैं। लेकिन इन कामों का क्रियान्वयन ट्रांसपोर्ट, पुलिस, राजमार्ग/पीडब्ल्यूडी, स्वास्थ्य, शहरी विकास और दूसरे विभागों में फैला हुआ है। इसलिए मिशन की सबसे बड़ी उपयोगिता यही होगी कि वह इन सभी कामों को एक साथ लाए, न कि उन्हें एक-दूसरे से अलग गतिविधियों के रूप में चलने दे।
इस साझा ढांचे के लिए राजनीतिक जिम्मेदारी, सभी के साझा लक्ष्य, विभागों की साफ जिम्मेदारी, लगातार मिलने वाली फंडिंग और नियमित समीक्षा जरूरी होगी। इसका मकसद सिर्फ नए उपायों का ऐलान करना नहीं होगा। इसका मकसद सड़क सुरक्षा से जुड़े विभागों के बीच जिम्मेदारी, संसाधनों और नतीजों को आपस में जोड़ना भी होगा।
सेफ सिस्टम का तरीका
यह मिशन पूरे तमिलनाडु में सेफ सिस्टम के तरीके के लिए एक मंच दे सकता है। इस तरीके के तहत रफ्तार को नियंत्रित करने, सड़क के ढांचे को सुरक्षित बनाने, वाहनों को सुरक्षित बनाने, कमजोर सड़क उपयोगकर्ताओं और बच्चों की सुरक्षा, प्रभावी कार्रवाई और हादसे के बाद की देखभाल तथा ट्रॉमा केयर से जुड़े कामों को एक साथ लाया जाएगा।
इसका ध्यान पैदल चलने वालों, साइकिल चलाने वालों और सड़क का इस्तेमाल करने वाले दूसरे कमजोर लोगों पर भी देना होगा। इसके साथ ही स्कूल आने-जाने को सुरक्षित बनाना, ड्राइवर और वाहनों के बेड़े की सुरक्षा, आपातकालीन देखभाल और हादसे के बाद की कार्रवाई भी जरूरी हिस्से होंगे। सेफ सिस्टम के तरीके के तहत राज्य की रोड सेफ्टी एक्शन प्लान में इन खास उपायों को शामिल किया जाना चाहिए।
प्रस्तावित ढांचे का एक अहम सिद्धांत यह है कि सड़क हादसों में होने वाली मौतों और गंभीर चोटों को रोका जा सकता है। इसलिए सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरे ट्रांसपोर्ट सिस्टम में साझा होनी चाहिए। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किए गए सेफ सिस्टम तरीके के अनुरूप भी है।
इससे यह भी बदलता है कि विभागों के काम का आकलन किस तरह किया जाना चाहिए। समीक्षा में सिर्फ यह नहीं देखा जाना चाहिए कि कौन-कौन से काम किए गए। यह भी मापा जाना चाहिए कि मौतों और गंभीर चोटों को कम करने में कितनी कमी आई। नतीजों पर जोर देना इसलिए जरूरी है, क्योंकि किसी उपाय को पूरा कर देना अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि जोखिम कम हुआ है।
राज्य की एक्शन प्लान की जरूरत
एक व्यापक स्टेट रोड सेफ्टी एक्शन प्लान, यानी RSAP, इस मिशन के लिए एक जरूरी और सही साधन हो सकता है। इससे काम को आगे बढ़ाने के लिए साफ रोडमैप मिल सकता है और सेफ सिस्टम के तरीके को खास कार्रवाइयों में बदला जा सकता है।
इस प्लान में मौतों को कम करने के लिए साफ और मापे जा सकने वाले लक्ष्य तय होने चाहिए। इसमें सड़क का ढांचा, रफ्तार का सही प्रबंधन, सुरक्षित वाहन, असरदार और जोखिम के आधार पर की जाने वाली कार्रवाई, कमजोर सड़क उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा, स्कूल आने-जाने की सुरक्षित व्यवस्था, ड्राइवर और वाहनों के बेड़े की सुरक्षा, आपातकालीन और ट्रॉमा केयर तथा हादसे के बाद की कार्रवाई शामिल होनी चाहिए।
RSAP में संबंधित विभागों और एजेंसियों की जिम्मेदारियां भी साफ तौर पर तय होनी चाहिए। इसमें जरूरी संसाधनों की पहचान की जानी चाहिए, लगातार मिलने वाली फंडिंग सुनिश्चित करनी चाहिए, काम पूरा करने की समय-सीमाएं तय करनी चाहिए और नियमित निगरानी तथा स्वतंत्र मूल्यांकन का प्रावधान होना चाहिए।
राज्य की यह प्लान सिर्फ इरादा जताने वाला एक व्यापक बयान बनकर नहीं रहनी चाहिए। राज्य स्तर की प्राथमिकताओं को जिला स्तर की रोड सेफ्टी एक्शन प्लान में बदला जाना चाहिए। इन जिला प्लान में हर जिले के खास जोखिमों और जरूरतों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
जिला स्तर का यह ढांचा व्यापक नीति को स्थानीय स्तर पर किए जाने वाले कामों से जोड़ने में मदद कर सकता है। हर पहचानी गई समस्या के साथ एक तय उपाय, उसे लागू करने वाली जिम्मेदार एजेंसी, बजट, समय-सीमा और प्रगति को मापने वाले संकेतक जुड़े होने चाहिए।
इस तरह की प्रक्रिया सड़क सुरक्षा की एक लगातार बनी हुई कमजोरी को भी दूर कर सकती है। यह कमजोरी नीति और उसे जमीन पर लागू करने के बीच का अंतर है। अगर किसी प्लान में जिम्मेदारियां, फंडिंग और समय-सीमाएं तय हों, तो यह पता लगाना संभव होगा कि फैसलों को वास्तव में कार्रवाई में बदला जा रहा है या नहीं।
फैसलों के लिए डेटा का इस्तेमाल
MoRTH के तहत सड़क सुरक्षा पर काम करने वाले आईआईटी मद्रास के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर रोड सेफ्टी (CoERS) ने डेटा ड्रिवन हाइपरलोकल इंटरवेंशन यानी DDHI नाम का एक व्यापक क्रियान्वयन ढांचा तैयार किया है। इस कार्यक्रम को लागू करने में मदद के लिए CoERS ने संजया नाम का इंटीग्रेटेड रोड सेफ्टी पोर्टल शुरू किया है।
यह पोर्टल फैसले लेने और काम की निगरानी के लिए प्रमुख संबंधित पक्षों को डेटा का विश्लेषण करने में मदद करता है। यह जवाबदेही के लिए एक ऐसा मंच भी देता है, जहां डेटा के आधार पर एक्शन प्लान बनाए जा सकते हैं और जिलों में उनके क्रियान्वयन को ट्रैक किया जा सकता है।
इस तरीके में पुलिस, ट्रांसपोर्ट, राजमार्ग, स्वास्थ्य और दूसरी एजेंसियों से मिलने वाले संबंधित डेटा को एक साथ लाया जाता है। इस जानकारी का इस्तेमाल जोखिमों की पहचान करने और उन्हें प्राथमिकता देने, सबूत और डेटा के आधार पर उपाय करने और सरकार को जिलों में काम की प्रगति पर नजर रखने में मदद देने के लिए किया जा सकता है।
इन सभी स्रोतों को जोड़ने का फायदा यह है कि किसी खास जोखिम को किसी खास जवाब से जोड़ा जा सकता है। इस तरीके के तहत पहचाने गए हर जोखिम को प्रस्तावित उपाय, जिम्मेदार एजेंसी, फंडिंग, समय-सीमा और अपेक्षित नतीजे से जोड़ा जा सकता है।
इसके बाद होने वाली नियमित समीक्षाओं में सिर्फ यह नहीं देखा जाएगा कि कोई उपाय पूरा हुआ या नहीं। यह भी देखा जा सकता है कि उस उपाय से जोखिम, हादसों और गंभीर चोटों में वास्तव में कमी आई या नहीं। इससे मिशन को सिर्फ पूरे किए गए कामों के रिकॉर्ड पर निर्भर रहने के बजाय नतीजों के आधार पर प्रगति मापने का तरीका मिलेगा।
ऐलान से मापी जा सकने वाली कार्रवाई तक
स्टेट रोड सेफ्टी एक्शन प्लान और संजया पोर्टल को साथ इस्तेमाल करने से मिशन को सिर्फ नीति से जुड़ी प्रतिबद्धता के बजाय तालमेल वाली और डेटा के आधार पर की जाने वाली कार्रवाई में बदला जा सकता है। इससे विभागों को एक दिशा में लाने, जिम्मेदारियां तय करने और नतीजों को मापने के लिए एक ढांचा भी मिलेगा।
तमिलनाडु के पास यह दिखाने का मौका है कि पहले से चल रही सड़क सुरक्षा की पहलों को किस तरह एक तालमेल वाले, मापे जा सकने वाले और नतीजों पर केंद्रित सेफ सिस्टम मिशन के तहत साथ लाया जा सकता है। अभी की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि मिशन को एक साफ ढांचा दिया जाए। इसमें संजया पोर्टल के साथ जोड़ी गई एक व्यापक स्टेट रोड सेफ्टी एक्शन प्लान शामिल होनी चाहिए।
इस अनुभव से देश के स्तर पर और दूसरे राज्यों में इसी तरह के मिशन मोड के लिए एक मॉडल मिल सकता है। यह संभावना सड़क सुरक्षा के लिए लगातार, तालमेल के साथ और मापे जा सकने वाले नतीजों के आधार पर होने वाली कार्रवाई की बड़ी जरूरत से जुड़ी हुई है।
बड़ी चुनौती जरूरी नहीं कि सड़क सुरक्षा की पहलों का मौजूद न होना है। असली चुनौती यह है कि सड़कों पर मौतों और गंभीर चोटों को कम करने के लिए नीति, संस्थाओं, फंडिंग, क्रियान्वयन और जवाबदेही को एक लगातार चलने वाले मिशन ढांचे के तहत एक साथ लाया जाए।
डॉ. वेंकटेश बालासुब्रमणियन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मद्रास के डिपार्टमेंट ऑफ इंजीनियरिंग डिजाइन में प्रोफेसर और आरबीजी लैब्स तथा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर रोड सेफ्टी के प्रमुख हैं। एस. सरोजा चेन्नई में सिटिजन कंज्यूमर एंड सिविक एक्शन ग्रुप की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं।
स्रोत: The Hindu
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
तमिलनाडु मुख्यमंत्री रोड सेफ्टी मिशन क्या है?
यह सड़क सुरक्षा से जुड़े अलग-अलग विभागों और कामों को एक साझा ढांचे के तहत लाने की पहल है।
इस मिशन के लिए कितना बजट रखा जाएगा?
मिशन के लिए हर साल करीब ₹500 करोड़ का बजट रखने की बात सामने आई है।
तमिलनाडु में सड़क हादसों की स्थिति कैसी है?
MoRTH के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, तमिलनाडु में 67,526 सड़क हादसे और 18,449 मौतें दर्ज की गईं।
मिशन के तहत किन उपायों पर काम होगा?
एएनपीआर कैमरों से निगरानी और कार्रवाई, सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाना और उन्हें हादसों वाली जगहों से जोड़ना शामिल है।
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