राजस्थान हाईकोर्ट ने कैदियों को जेल में शादी की दी इजाजत
राजस्थान हाईकोर्ट ने दी कैदियों को जेल में शादी की इजाजत राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दो कैदियों को शादी की इजाजत दी है। ये अनोखी शादी जोधपुर के मंडोर ओपन एयर कैंप में होगी।
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दो कैदियों को शादी की इजाजत दी है। ये अनोखी शादी जोधपुर के मंडोर ओपन एयर कैंप में होगी। दूल्हा, जो 33 साल का है और हत्या के मामले में सजा काट रहा है, वहां शादी करेगा। दुल्हन भी एक दोषी है, जो फिलहाल जमानत पर बाहर है। कोर्ट ने कहा कि जेल में होने का मतलब ये नहीं कि किसी के मौलिक अधिकार खत्म हो जाते हैं। संविधान के आर्टिकल 21 के तहत शादी का अधिकार हर किसी को है।
शादी: एक मौलिक अधिकार
15 जुलाई को जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और प्रवीर भटनागर की बेंच ने ये फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि बालिगों के बीच शादी करना उनके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। जेल प्रशासन को निर्देश दिया गया कि शादी के लिए जरूरी इंतजाम किए जाएं। दूल्हे के वकील ने दलील दी कि शादी से कैदी के पुनर्वास में मदद मिलेगी और दोनों अपने भविष्य की योजना बना पाएंगे।
ओपन एयर कैंप: अनोखा माहौल
दूल्हा फरवरी 2017 से जेल में है। उसे हत्या, सबूत मिटाने और संपत्ति हड़पने के मामले में दोषी ठहराया गया था। बाद में उसे मंडोर ओपन एयर कैंप में भेजा गया, जहां जाने के लिए कुछ खास शर्तें पूरी करनी होती हैं। राजस्थान प्रिजनर्स ओपन एयर कैंप रूल्स, 1972 के तहत चलने वाले इन कैंपों में कैदी दिन में बाहर जा सकते हैं और शाम को वापस लौटना होता है। यहां कैदी अपने परिवार के साथ रह सकते हैं और कमाई भी कर सकते हैं। ये पारंपरिक जेलों से अलग हैं।
कानूनी और सामाजिक मिसालें
कोर्ट ने अपने फैसले में पहले के कई अहम मामलों का जिक्र किया। 2022 के नंदलाल बनाम स्टेट डिपार्टमेंट ऑफ होम केस में हाईकोर्ट ने कहा था कि कैदियों के मौलिक अधिकार, जैसे परिवार के साथ रिश्ते बनाए रखना, बरकरार रहते हैं। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जसवीर सिंह केस का भी हवाला दिया गया, जिसमें जेल में रहते हुए प्रजनन के अधिकार को मान्यता दी गई थी। ये फैसले दिखाते हैं कि भारत की जेल व्यवस्था सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाती है और कैदियों को समाज से जोड़ने की कोशिश करती है।
सरकार की मंजूरी और शादी की तैयारी
राजस्थान सरकार ने इस शादी पर कोई आपत्ति नहीं जताई। अभियोजन पक्ष ने बताया कि ये जोड़ा पहले से लिव-इन रिलेशनशिप में था और अब इसे कानूनी रूप देना चाहता है। कोर्ट ने जेल प्रशासन को शादी की निगरानी करने का निर्देश दिया। शादी में 21 परिवार के सदस्यों को शामिल होने की इजाजत दी गई है, और जरूरत पड़ने पर मेहमानों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। शादी का पूरा खर्च दूल्हा उठाएगा, ताकि सरकार पर कोई बोझ न पड़े। शादी की तारीख तय होने के बाद दंपति प्रशासन को सूचित करेंगे, जिसके बाद अनुमति दी जाएगी।
पुनर्वास की ओर एक कदम
इस फैसले को भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में एक प्रगतिशील कदम माना जा रहा है। कोर्ट ने दिखाया कि जेल में रहते हुए भी मौलिक अधिकार, जैसे परिवार के साथ रहना, खत्म नहीं होते। शादी की इजाजत देकर कोर्ट ने भारत की जेल व्यवस्था के सुधारात्मक दृष्टिकोण को मजबूत किया है, जिसमें पुनर्वास और समाज में फिर से शामिल करना न्याय का अहम हिस्सा है।
स्रोत: Indian Express
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