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दशकभर बाद पटनम में स्वायत्त हेरिटेज अथॉरिटी बनाने का प्रस्ताव

पटनम में खुदाई और रिसर्च फिर शुरू करने के साथ स्वायत्त हेरिटेज अथॉरिटी और वैश्विक रिसर्च सेंटर बनाने की योजना सामने आई है।

दशकभर बाद पटनम में स्वायत्त हेरिटेज अथॉरिटी बनाने का प्रस्ताव
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एक दशक की रुकावट के बाद पटनम को नए सिरे से सोच और दिशा की जरूरत

एक दशक की रुकावट के बाद पटनम को नए सिरे से सोच और दिशा की जरूरत

पटनम के लिए प्रस्तावित अगला चरण सिर्फ खुदाई फिर से शुरू करने तक सीमित नहीं है। इसमें एक स्वायत्त पटनम हेरिटेज अथॉरिटी बनाने और आगे चलकर गांव की जमीन और समाज से जुड़ा एक बहुविषयक वैश्विक रिसर्च और लर्निंग सेंटर विकसित करने की कल्पना की गई है।

यह सोच उस एक दशक के बाद सामने आई है, जिसमें खुदाई, रिसर्च और इससे जुड़ी कई दूसरी पहलें रुक गईं या बाधित हुईं। इसके चलते 2016 से 2026 के बीच पटनम के लगातार विकास में एक खालीपन आ गया। अभी सबसे बड़ा सवाल यह है कि रिसर्च और उससे जुड़ी गतिविधियां फिर से कैसे शुरू की जाएं, लेकिन पटनम को सिर्फ एक और खुदाई कार्यालय या एक सामान्य म्यूजियम तक सीमित न कर दिया जाए।

एक गांव, जिसके नीचे बसी है बड़ी दुनिया

पटनम दक्षिण-पश्चिम भारत में केरलम के एर्नाकुलम जिले में, उत्तर परवूर के पास, पेरियार डेल्टा पर बसा है। इस तटीय इलाके के बड़े हिस्से में अब घर, दुकानें, तारकोल की सड़कें, रास्ते, एक सरकारी प्राइमरी स्कूल, कुछ अस्पताल, नारियल के बाग और जलाशय मौजूद हैं।

ऊपर से बिल्कुल सामान्य दिखने वाले इस गांव के नीचे ऐसा पुरात्विक रिकॉर्ड मौजूद है, जो हिंद महासागर की पूर्वी और पश्चिमी दुनिया को जोड़ता है। यह रिकॉर्ड पश्चिमी यूरोप के अटलांटिक तट से लेकर प्रशांत महासागर की ओर खुलने वाले दक्षिण चीन सागर तक फैला हुआ है। पुरात्विक सबूतों की तारीख आम तौर पर 300 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी के बीच की मानी जाती है। इनमें सबसे मजबूत सबूत 100 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी के बीच के हैं।

इस जगह से ढांचे, मिट्टी के बर्तन, मनके, धातुएं, सिक्के, जैविक और भूगर्भीय अवशेष, उद्योग और वर्कशॉप से जुड़े हिस्से मिले हैं। यहां एक बंदरगाह परिसर भी मिला है, जिसमें लकड़ी की एक डोंगी शामिल है। इस डोंगी की तारीख 100 ईसा पूर्व से 100 ईस्वी के बीच की मानी गई है। दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया, लाल सागर, अफ्रीका और भूमध्यसागर से जुड़ी सामग्री भी यहां मिली है। इसके साथ ही काफी दूर-दूर तक लोगों, सामान, तकनीक और विचारों की आवाजाही के सबूत भी मिले हैं।

इन सबूतों से संकेत मिलता है कि पटनम उस समुद्री दुनिया का हिस्सा था, जिसे आम तौर पर मुजिरिस या मुचिरि पट्टिनम से जोड़ा जाता है। हालांकि, पूरा प्राचीन बंदरगाह आज के पटनम से ही जुड़ा था या नहीं, यह अभी भी पुरातत्व का खुला सवाल है। यही अनसुलझा सवाल उन वजहों में से एक है, जिनके चलते पटनम में खुदाई और वैज्ञानिक जांच फिर से शुरू होनी चाहिए।

खुदाई से क्या सामने आया

खुदाई और खोज का काम 2006-07 में शुरू हुआ। धीरे-धीरे इस काम ने उस जगह की तस्वीर बदल दी, जो शुरुआत में एक सामान्य पुरात्विक टीले जैसी दिखाई देती थी। यह जगह आगे चलकर एक अंतरराष्ट्रीय बहुविषयक रिसर्च लैबोरेटरी बन गई। 2006 से 2023 के बीच 67 खाइयों में खुदाई की गई। इस दौरान करीब 1.3 लाख दर्ज की गई पुरावस्तुएं और लगभग 45 लाख मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े मिले।

ये आंकड़े इस जगह की पुरात्विक क्षमता का सिर्फ एक हिस्सा दिखाते हैं। 100 एकड़ से ज्यादा इलाके में फैले पुरात्विक टीले के 1% से भी कम हिस्से में खुदाई हुई है। जिस बड़े हिस्से में अभी खुदाई नहीं हुई है, उसका मतलब है कि अब तक मिले रिकॉर्ड को इस बस्ती का पूरा ब्यौरा नहीं माना जा सकता।

इन खोजों की अहमियत सिर्फ उनकी संख्या में नहीं है। यहां मिले ढांचे, शहरी सुविधाएं, जैसे टॉयलेट और पानी निकालने वाले कुएं, औद्योगिक अवशेष, पुरावस्तुएं और पर्यावरण से जुड़े सबूत, मिलकर एक बेहद जुड़े हुए बसे हुए इलाके की तस्वीर पेश करते हैं।

इसलिए पटनम केरलम में मौजूद किसी अलग-थलग जगह या केरलम और रोम के बीच व्यापार के किसी केंद्र से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण जगह बनकर सामने आया। सबूतों से पता चलता है कि यह प्राचीन दुनिया में फैले एक बहुत बड़े नेटवर्क की एक कड़ी था।

इस नेटवर्क में पेरियार और पश्चिमी घाट तथा अरब सागर के बीच मौजूद नदी प्रणालियों की केंद्रीय भूमिका थी। हाल की स्टडी में करीब 51,800 वर्षावन द्वीपों की पहचान की गई है। इनके साथ कुरिंजी, मुल्लै, मरुतम, पालै और नेइथल तिनै परंपराओं में दिखाए गए मानवीय भौगोलिक इलाकों को भी देखा गया है।

पटनम एक ऐसे प्राचीन नदी-मुहाने वाले इलाके में था, जो पश्चिमी घाट, वहां के जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा हुआ था। पेरियार, पालक्काड गैप और वैगई बेसिन के रास्ते पश्चिमी तट का संबंध पूर्वी समुद्री तट से जुड़ता था। इसके आगे यह रास्ता बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर और दक्षिण चीन सागर तक जाता था।

पुरात्विक समानताएं पटनम को पश्चिम में इंग्लैंड के कॉर्ब्रिज से लेकर पूर्व में दक्षिणी चीन के हेपू तक फैली जगहों से जोड़ती हैं। दक्षिण में श्रीलंका के तिस्समहारा‍मा से लेकर उत्तर में भारत-नेपाल सीमा के पास कोपिया तक भी इसके संबंध दिखाई देते हैं। यह इलाका लुंबिनी-कपिलवस्तु क्षेत्र के करीब है।

यह भौगोलिक फैलाव पटनम से जुड़े सवाल को बदल देता है। पटनम को सिर्फ केरलम और रोम के बीच दोतरफा आदान-प्रदान के सबूत के तौर पर पेश नहीं किया जाता। इसके बजाय इसे अलग-अलग इलाकों, पर्यावरणीय क्षेत्रों और सांस्कृतिक दुनिया के बीच होने वाली जुड़ी हुई आवाजाही का हिस्सा माना जाता है।

अलग-अलग विषयों से बना एक रिसर्च सेंटर

रिसर्च के पहले दशक में संस्थानों और विशेषज्ञों का असाधारण रूप से बड़ा और विविध समूह एक साथ आया। ऑक्सफोर्ड, जॉर्जिया, रोम, डरहम, यूसीएल, बीजिंग का पैलेस म्यूजियम और लंदन का ब्रिटिश म्यूजियम जैसे विश्वविद्यालयों और रिसर्च संस्थानों ने इस काम के अलग-अलग हिस्सों में भाग लिया। इनके अलावा यूरोप, उत्तर अमेरिका, एशिया और भारत के कई दूसरे संस्थान भी इस काम से जुड़े।

रिसर्चर, वैज्ञानिक और छात्र स्थानीय समुदाय के साथ काम करते थे। उनके साथ पुरातत्व, कला, वास्तुकला, इतिहास, मानवविज्ञान, भूविज्ञान, जेनेटिक्स, भौतिक विज्ञान, पेट्रोग्राफी, पर्यावरण विज्ञान, भाषा विज्ञान, अभिलेख विज्ञान, साहित्य, संरक्षण, म्यूजियम स्टडीज, फोटोग्राफी और कई दूसरे क्षेत्रों के विशेषज्ञ भी काम कर रहे थे। इस वजह से पटनम ऐसी जगह बन गया, जहां दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आए विद्वान साझा मानवीय अतीत की जांच कर सकते थे।

रिसर्च का यह मॉडल केवल खुदाई और रिपोर्ट प्रकाशित करने तक सीमित नहीं था। अंतरराष्ट्रीय रिसर्च स्कॉलरशिप की योजना बनाई गई थी। 2015 में पटनम में अलग-अलग विषयों को जोड़ने वाला आवासीय डिप्लोमा कार्यक्रम भी शुरू किया गया।

बहुउद्देश्यीय वैज्ञानिक लैबोरेटरी, आधुनिक लाइब्रेरी, पुरातत्व और विरासत की जानकारी देने वाले केंद्र, बच्चों का म्यूजियम, घरेलू म्यूजियम और लोगों की भागीदारी से जुड़ी दूसरी योजनाएं भी तैयार की गई थीं। कोशिश यह थी कि पुरातत्व को आज के गांव की जिंदगी से जोड़ा जाए, न कि विरासत को बाहर से पटनम पर थोपी गई किसी चीज की तरह देखा जाए।

इस सोच में स्थानीय समुदाय, उसका इलाका, पर्यावरण और रोजमर्रा की जिंदगी, उस जगह की पूरी कहानी का हिस्सा थे। प्रस्तावित पहलों में ग्रीन आर्कियोलॉजी, कारोबार से जुड़ी पहलें, जिम्मेदार पर्यटन, पर्यावरण के प्रति जागरूकता, स्थानीय भागीदारी और विरासत को ध्यान में रखकर विकास शामिल थे।

बड़ा मकसद पटनम को एक ऐसी मॉडल जगह के रूप में विकसित करना था, जहां पुरातत्व, विज्ञान, शिक्षा, पर्यावरण, रोजगार के मौके और पटनम के लोग एक जीवंत रिश्ते में साथ रह सकें। इस मॉडल में पुरात्विक रिकॉर्ड और आज का गांव दो अलग-अलग विषय नहीं थे। वे एक ही विरासत वाले इलाके के आपस में जुड़े हिस्से थे।

2016 के बाद आई रुकावट

एक दशक तक खुदाई और रिसर्च चलने के बाद 2016 में यह कार्यक्रम बाधित हो गया। कई पहलें रोक दी गईं, बीच में बंद हो गईं या कभी पूरी नहीं हो सकीं। अंतरराष्ट्रीय आवासीय डिप्लोमा कार्यक्रम आगे नहीं चल पाया। बच्चों का म्यूजियम और स्कॉलरशिप कार्यक्रम भी बंद कर दिए गए।

बीजिंग के पैलेस म्यूजियम से जुड़ी 8 मिलियन डॉलर की बहुउद्देश्यीय आर्कियो-साइंस लैबोरेटरी बनाने की योजना भी जमीन पर नहीं उतर सकी। प्राचीन बंदरगाह परिसर के आसपास प्रस्तावित उसी जगह पर बनने वाला म्यूजियम भी अधूरा रह गया। इसमें 6 मीटर लंबी लकड़ी की डोंगी को भी शामिल किया जाना था।

मुजिरिस म्यूजियम भी पूरा नहीं हो सका। स्थानीय जमीन मालिकों से पुरात्विक महत्व वाली जमीन के टुकड़े खरीदने का एक कार्यक्रम शुरू किया गया था। इसके तहत 8 एकड़ से ज्यादा जमीन खरीदी गई, लेकिन यह कार्यक्रम आगे जारी नहीं रहा।

पुरात्विक पार्क, आधुनिक लाइब्रेरी, अकादमिक कैंपस, जानकारी देने वाले केंद्र और समुदाय से जुड़ी सुविधाओं की दूसरी योजनाएं भी अधूरी रह गईं या उन्हें आगे नहीं बढ़ाया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि 2016 से 2026 के बीच पटनम रिसर्च के लगातार विकास में एक दुर्भाग्यपूर्ण खालीपन आ गया।

यह रुकावट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मूल कार्यक्रम को अलग-अलग और एक-दूसरे से असंबंधित प्रोजेक्ट्स की सूची के रूप में नहीं बनाया गया था। इसे एक-दूसरे से जुड़े पूरे सिस्टम की तरह तैयार किया गया था। लैबोरेटरी, स्कॉलरशिप, म्यूजियम, जानकारी देने वाले केंद्र, समुदाय की सुविधाएं, जमीन की खरीद और अकादमिक कार्यक्रम, सभी का मकसद रिसर्च को सहारा देना था। साथ ही गांव और उसके पर्यावरण को भी इस काम से जोड़कर रखना था।

रिसर्च को जारी रखने की कोशिश

2018 में पामा इंस्टीट्यूट फॉर द एडवांसमेंट ऑफ ट्रांसडिसिप्लिनरी आर्कियोलॉजिकल साइंसेज की स्थापना की गई। इसका मकसद बौद्धिक और वैज्ञानिक जांच-पड़ताल को जिंदा रखना था। पामा नाम पिता और मां, दोनों की वंश परंपरा की ओर इशारा करता है। यह संस्थान एक बड़ी बौद्धिक सोच से निकला था। इस सोच को रोमिला थापर, के.एन. पणिक्कर और आर.वी.जी. मेन जैसे विद्वानों ने आकार दिया था। पटनम रिसर्च से जुड़े अंतरराष्ट्रीय विद्वानों का नेटवर्क भी इस सोच का हिस्सा था।

इस संस्थान का मकसद ऐसा स्थान बनाए रखना था, जहां पुरातत्व का इतिहास, मानवविज्ञान, जेनेटिक्स, भूविज्ञान, पर्यावरण से जुड़ी स्टडी, संरक्षण और दूसरे विषयों के साथ बातचीत हो सके। इसका उद्देश्य यह भी था कि फील्ड रिसर्च और इंटर्नशिप के जरिए मिले सबूतों पर सवाल उठाए जा सकें और उनकी जांच की जा सके।

इसके बाद पामा को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से 2019-20 और 2021-22 के लिए खुदाई की अनुमति मिली। खुद जुटाए गए संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए पामा ने 2020 से 2023 के बीच पटनम में 6 और खाइयों में खुदाई की। इन खाइयों के नंबर 62 से 67 तक थे।

2019 में उसने मथिलकम में करीब एक दर्जन परीक्षण खाइयां भी खोदीं। 2022 में इडुक्की जिले में खोज का काम किया गया। पटनम में इस काम के दौरान और खोजें हुईं। इनमें रोमन सम्राट डोमिशियन की पहचान की गई सिर की एक मूर्ति भी शामिल थी।

एक और खोज ऐसी अंगूठी का पत्थर था, जो यूनानी स्फिंक्स जैसा दिखाई देता है। विशेषज्ञों ने इसे शुरुआती रोमन साम्राज्य के अंगूठी-पत्थर से जुड़ी परंपराओं के काफी करीब माना। पामा ने 2023 तक व्यापक रिसर्च नेटवर्क को जिंदा रखने में मदद की।

इन कोशिशों से संस्थागत स्तर पर पैदा हुआ बड़ा खालीपन खत्म नहीं हुआ। लेकिन उस समय, जब कई योजनाबद्ध पहलें अधूरी रह गई थीं, इन कोशिशों ने जांच-पड़ताल की एक कड़ी को बनाए रखा। इनसे यह भी साबित हुआ कि बहुविषयक पुरात्विक विज्ञान पर आधारित संस्थागत ढांचे के जरिए फील्ड रिसर्च और अलग-अलग विषयों को जोड़ने वाली जांच आगे जारी रखी जा सकती है।

खुदाई की जगह से एक जीवंत संस्थान तक

पटनम ऐसे पुरात्विक इलाके के बीच स्थित है, जहां करीब 300 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी के बीच लगभग 40 भाषाई और सांस्कृतिक दुनिया से जुड़े लोगों के बोलने, व्यापार करने और रहने के सबूत मिलते हैं। इस रिकॉर्ड का फैलाव और विविधता यह सवाल खड़ा करती है कि आगे पटनम का विकास किस रूप में होना चाहिए।

प्रस्तावित जवाब सिर्फ एक और खुदाई कार्यालय या एक सामान्य म्यूजियम तक सीमित नहीं है। एक संभावना “21वीं सदी की विश्व भारती” बनाने की है। यह एक ऐसा जीवंत सेंटर होगा, जहां पुरातत्व, इतिहास, मानवविज्ञान, जेनेटिक्स, भूविज्ञान, पर्यावरण विज्ञान, संरक्षण, तकनीक, साहित्य, भाषाएं और कलाएं एक-दूसरे से जुड़ेंगी।

इस विचार का मतलब किसी पुरानी शैली की यूनिवर्सिटी को उठाकर पुरात्विक जगह पर रख देना नहीं है। मकसद एक ऐसा वैश्विक रिसर्च और लर्निंग कम्युनिटी बनाना है, जो इस इलाके से स्वाभाविक रूप से विकसित हो और यहां रहने वाले लोगों के साथ मिलकर काम करे।

ऐसी संस्था भारत और दूसरे देशों के रिसर्चरों और छात्रों को पटनम के पुरात्विक रिकॉर्ड और यहां के जीवंत पर्यावरण के साथ लंबे समय तक जुड़ने का मौका दे सकती है। प्राचीन बंदरगाह, डोंगी, वर्कशॉप, मिट्टी के बर्तन, धातुएं और जैविक अवशेष केवल म्यूजियम में रखे जाने वाले सामान नहीं होंगे।

इनके जरिए इंसानों की आवाजाही, तकनीक, पर्यावरण, व्यापार, भाषा और सामाजिक जीवन को समझने की शुरुआत की जा सकती है। गांव और पेरियार का बदलता हुआ इलाका भी इस पूरी प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा होगा। इनके जरिए यह समझने के मौके मिलेंगे कि समय के साथ समुदाय और पर्यावरण किस तरह बदले हैं।

एक स्वायत्त पटनम हेरिटेज अथॉरिटी इस काम के लिए सही संस्थागत ढांचा दे सकती है। इसकी दूर की महत्वाकांक्षा इससे भी बड़ी होगी। पटनम या मुजिरिस में 21वीं सदी की विश्व भारती बनाई जाए, जो बहुविषयक रिसर्च और लर्निंग का एक वैश्विक सेंटर हो। इसकी जड़ें केरलम के एक गांव और उसके नीचे सुरक्षित मानवीय रिश्तों और संपर्कों में हों।

इस प्रस्ताव में अधूरे व्यावहारिक कामों को एक बड़े संस्थागत सवाल से जोड़ा गया है। खुदाई फिर से शुरू करना पटनम के भविष्य के सिर्फ एक हिस्से का जवाब देगा। बड़ा काम रिसर्च, शिक्षा, संरक्षण, लोगों की भागीदारी, पर्यावरण और स्थानीय हिस्सेदारी को फिर से एक-दूसरे से जोड़ना होगा।

पुरात्विक रिकॉर्ड उन लोगों का है, जो 2,000 साल पहले पटनम में रहते थे। यह उन लोगों का भी है, जो आज वहां रहते हैं। और यह आने वाली पीढ़ियों का भी है। इस जगह के लिए नए सिरे से बनाई जाने वाली किसी भी सोच को इन तीनों दावों को एक साथ संभालना होगा। गांव के नीचे मौजूद सबूत, उसके ऊपर चल रही गांव की जिंदगी और इन दोनों को जोड़ने वाले इलाके का भविष्य, इन तीनों को साथ लेकर ही पटनम की आगे की दिशा तय की जा सकती है।

स्रोत: The Hindu

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पटनम के लिए क्या प्रस्ताव रखा गया है?

पटनम में एक स्वायत्त हेरिटेज अथॉरिटी बनाने और आगे चलकर बहुविषयक वैश्विक रिसर्च और लर्निंग सेंटर विकसित करने का प्रस्ताव है।

पटनम में खुदाई और रिसर्च का काम कब शुरू हुआ था?

पटनम में खुदाई और खोज का काम 2006-07 में शुरू हुआ था।

पटनम की खुदाई में अब तक क्या मिला है?

2006 से 2023 के बीच 67 खाइयों में खुदाई हुई। करीब 1.3 लाख दर्ज पुरावस्तुएं और लगभग 45 लाख मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े मिले।

पटनम को प्राचीन मुजिरिस से जोड़ने का सवाल क्या है?

सबूत पटनम को मुजिरिस या मुचिरि पट्टिनम से जोड़ते हैं, लेकिन पूरा प्राचीन बंदरगाह आज के पटनम से जुड़ा था या नहीं, यह अभी खुला पुरातत्व सवाल है।

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