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केरल के वैज्ञानिकों ने खोजी नई समुद्री घोड़े की प्रजाति

केरल के रिसर्चर्स ने खोजी नई समुद्री घोड़े की प्रजाति, 150 साल पुरानी उलझन सुलझी केरल के समुद्री वैज्ञानिकों ने समुद्री घोड़े की एक नई प्रजाति हिप्पोकैम्पस अमांडा विंसेंटे की पहचान की है।

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केरल के समुद्री वैज्ञानिकों ने समुद्री घोड़े की एक नई प्रजाति हिप्पोकैम्पस अमांडा विंसेंटे की पहचान की है। इससे हिप्पोकैम्पस हिस्ट्रिक्स नाम के कांटेदार समुद्री घोड़े को लेकर 150 साल पुरानी टैक्सोनॉमिक गड़बड़ी खत्म हो गई है। केरल यूनिवर्सिटी ऑफ फिशरीज एंड ओशन स्टडीज़ (KUFOS) के वैज्ञानिकों ने इस खोज का नेतृत्व किया। रिसर्च में पता चला कि जिसे अब तक एक ही प्रजाति माना जा रहा था, वह असल में तीन अलग-अलग प्रजातियां हैं।

समुद्री जीवविज्ञानी अमांडा विंसेंट के नाम पर रखा गया नाम

नई खोजी गई प्रजाति का नाम मशहूर समुद्री जीवविज्ञानी अमांडा विंसेंट के सम्मान में रखा गया है। इसे पहली बार तूतुकुड़ी फिशरीज हार्बर में मछलियों के बायकैच से शालू कन्नन ने इकट्ठा किया था, जो इस स्टडी की मुख्य लेखिका हैं। यह खोज टैक्सोनॉमी जर्नल ज़ूटैक्सा में प्रकाशित हुई है।

यह खोज केरल के तट पर पाई जाने वाली समुद्री घोड़े की पांचवीं प्रजाति है, जो यहां की समुद्री जैव विविधता को दिखाती है।

गलत पहचान का अंत

दशकों से भारतीय महासागर क्षेत्र में म्यूजियम के नमूनों और जैव विविधता रिकॉर्ड्स में कई कांटेदार समुद्री घोड़ों को गलत तरीके से हिप्पोकैम्पस हिस्ट्रिक्स के तौर पर दर्ज किया गया था। KUFOS के असिस्टेंट प्रोफेसर और स्टडी के सीनियर लेखक राजीव राघवन ने इस व्यापक गलतफहमी को उजागर किया। रिसर्च में यह भी साफ हुआ कि हिप्पोकैम्पस जयकारी नाम की एक और कम जानी जाने वाली प्रजाति को भी हिप्पोकैम्पस हिस्ट्रिक्स के तहत गलत तरीके से वर्गीकृत किया गया था।

केरल के पानी में जीवित देखा गया

नई प्रजाति को पहली बार इकोमरीन प्रोजेक्ट के तहत किए गए सर्वे के दौरान जिंदा देखा गया। यह सर्वे एंचुथेंगु के पास चट्टानी रीफ्स पर लगभग 15 मीटर की गहराई में किया गया था। KUFOS के वाइस-चांसलर ए. बीजू कुमार ने यह जानकारी दी।

क्यों है यह खोज अहम

यह स्टडी न सिर्फ लंबे समय से चली आ रही वैज्ञानिक उलझन को सुलझाती है, बल्कि समुद्री संरक्षण के लिए सही प्रजातियों की पहचान के महत्व को भी दिखाती है। रिसर्चर्स को उम्मीद है कि इस खोज से समुद्री घोड़ों की पारिस्थितिक भूमिका और भारतीय पानी में उन्हें होने वाले खतरों को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।

स्रोत: The Hindu

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