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ममूटी ने अपनी कमजोरियों को स्वीकार कर मेहनत से बनाई सफलता

‘मेरे अंदर एक्टर के तौर पर कोई पॉजिटिव नहीं’: जब ममूटी ने बताया कैसे उन्होंने अपनी ‘कमजोरियों’ को हराया ममूटी ने एक्टिंग की चुनौतियों पर बात की, मेहनत को अपनी सफलता का श्रेय दिया मलयालम सिनेमा के

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‘मेरे अंदर एक्टर के तौर पर कोई पॉजिटिव नहीं’: जब ममूटी ने बताया कैसे उन्होंने अपनी ‘कमजोरियों’ को हराया

ममूटी ने एक्टिंग की चुनौतियों पर बात की, मेहनत को अपनी सफलता का श्रेय दिया

मलयालम सिनेमा के दिग्गज ममूटी ने एक बार खुलकर माना था कि उनके अंदर एक्टर के तौर पर कोई खास पॉजिटिव नहीं है। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय कड़ी मेहनत और लगन को दिया। कायराली टीवी को दिए एक पुराने इंटरव्यू में ममूटी ने कहा था, "मेरे अंदर एक्टर के तौर पर कोई पॉजिटिव नहीं है। जहां तक नेगेटिव्स की बात है — मुझे डांस करना नहीं आता, गाना नहीं आता, कॉमेडी नहीं आती। मेरे कुछ हाथों के इशारे भी मजाकिया लगते हैं और मुझे चलने में भी दिक्कत होती है। मैं अपने अंदर बहुत सारी नेगेटिव्स देखता हूं, पॉजिटिव कुछ नहीं देखा।”

मेहनत से बनी एक शानदार यात्रा

अपनी खुद की आलोचना के बावजूद, ममूटी ने भारतीय सिनेमा में एक बड़ा मुकाम हासिल किया है। छह भाषाओं में 400 से ज्यादा फिल्मों और पांच दशकों से ज्यादा के करियर के साथ, उन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा से सबको प्रभावित किया। चार बार नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीतने वाले ममूटी ने हाल ही में 18 जुलाई 2023 को ब्रमायुगम के लिए यह सम्मान हासिल किया। इस उपलब्धि ने उन्हें अमिताभ बच्चन के साथ सबसे ज्यादा नेशनल अवॉर्ड जीतने वाले एक्टर की बराबरी पर ला दिया।

ममूटी की खुद को समझने की क्षमता उनके करियर की नींव रही है। उन्होंने माना कि उनके अभिनय का राज उनके किरदारों में पूरी तरह डूब जाना है। उन्होंने कहा, “मेरे अंदर एक पॉजिटिव क्वालिटी है, वो ये कि मैं हमेशा अपने किरदार में पूरी तरह उतर जाता हूं। मेरी सबसे बड़ी चुनौती है कि ‘ममूटी’ मेरे किरदारों में न घुस जाए। मुझे सिर्फ एक नया किरदार बनने में दिलचस्पी है।”

सीमाओं को पार कर हासिल की पहचान

ममूटी ने अपनी कमियों को पार कर जो पहचान बनाई है, उसकी सराहना उनके साथी कलाकारों और क्रिटिक्स ने भी की है। मशहूर फिल्ममेकर फाज़िल ने एक बार कहा था कि ममूटी की क्षमता, ऑल-राउंडर्स जैसे मोहनलाल के सामने भी अपनी जगह बनाने की, उन्हें बेहतर एक्टर बनाती है।

ममूटी ने अपने काम के भावनात्मक पहलू पर भी बात की। उन्होंने बताया कि जब उनकी मेहनत को नोटिस नहीं किया जाता, तो उन्हें ज्यादा चोट लगती है, बजाय इसके कि उनकी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो जाए। अपनी 1992 की फिल्म सूर्य मनसाम का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “जब मेरी मेहनत और प्रयास से किए गए परफॉर्मेंस को नोटिस नहीं किया जाता, तो मुझे उससे ज्यादा तकलीफ होती है, जितना कि मेरी फिल्म के फ्लॉप होने पर होती है।”

मेहनत की मिसाल

ममूटी का करियर यह साबित करता है कि मेहनत से सबकुछ हासिल किया जा सकता है। उन्होंने अपना पहला नेशनल फिल्म अवॉर्ड 1989 में मथिलुकल और ओरु वडक्कन वीरगाथा के लिए जीता। इसके बाद 1993 और 1998 में पोंथन माडा, विदेयान और डॉ बाबासाहेब अंबेडकर के लिए यह सम्मान हासिल किया। ब्रमायुगम के लिए हालिया अवॉर्ड ने भारतीय सिनेमा में उनकी स्थायी प्रासंगिकता को और मजबूत किया।

अपनी चुनौतियों को खुले दिल से स्वीकार करके और मेहनत की अहमियत पर जोर देकर, ममूटी आज भी नई पीढ़ी के एक्टर्स को प्रेरित करते हैं। उन्होंने साबित कर दिया है कि लगन और मेहनत से किसी भी कमी को हराया जा सकता है।

स्रोत: Indian Express

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ममूटी ने अपनी कमजोरियों के बारे में क्या कहा?

ममूटी ने कहा कि उनके अंदर एक्टर के तौर पर कोई खास पॉजिटिव नहीं है और उन्होंने कई नेगेटिव्स का जिक्र किया जैसे डांस, गाना और कॉमेडी में कमी।

ममूटी ने अपनी सफलता का श्रेय किसे दिया?

ममूटी ने अपनी सफलता का श्रेय कड़ी मेहनत और लगन को दिया।

ममूटी ने कितनी भाषाओं में फिल्में की हैं?

ममूटी ने छह भाषाओं में 400 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है।

ममूटी ने कितने नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीते हैं?

ममूटी ने चार बार नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीते हैं।

ममूटी की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

ममूटी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि 'ममूटी' उनके किरदारों में न घुस जाए।

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