एमपी कैबिनेट ने जबलपुर-भोपाल-इंदौर इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लिए नई कंपनी बनाने की मंजूरी दी
मध्य प्रदेश में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने और रोजगार के नए मौके पैदा करने के लिए सरकार ने जबलपुर-भोपाल-इंदौर इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के विकास की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
मध्य प्रदेश में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने और रोजगार के नए मौके पैदा करने के लिए सरकार ने जबलपुर-भोपाल-इंदौर इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के विकास की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में गुरुवार, 15 अक्टूबर को हुई कैबिनेट बैठक में इस कॉरिडोर के लिए नई कंपनी बनाने को मंजूरी दी गई। यह कंपनी पूरी तरह मध्य प्रदेश सरकार के स्वामित्व में होगी।
सरकार ने कंपनी को शुरुआती तौर पर 100 करोड़ रुपए की पूंजी देने का फैसला किया है। इसके साथ ही, शुरुआती कामकाज के लिए 20 करोड़ रुपए का ब्याज मुक्त कर्ज देने का प्रस्ताव भी रखा गया है। इस व्यवस्था का मकसद कॉरिडोर से जुड़े शुरुआती कामों को तेजी से आगे बढ़ाना और औद्योगिक क्षेत्रों के विकास के लिए जरूरी तैयारी शुरू करना है।
सरकार की योजना इस कॉरिडोर के जरिए सात जिलों में औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार करने की है। जबलपुर, नरसिंहपुर, रायसेन, भोपाल, सीहोर, देवास और इंदौर को इस योजना में शामिल किया गया है। इन जिलों में नए औद्योगिक केंद्र और हब विकसित किए जाएंगे। परियोजना के पूरी तरह विकसित होने पर तीन साल में तीन लाख करोड़ रुपए से अधिक का निवेश आने की उम्मीद जताई गई है।
सरकार का अनुमान है कि इस परियोजना से छह लाख से ज्यादा लोगों के लिए रोजगार के अवसर बन सकते हैं। यह रोजगार अलग-अलग औद्योगिक इकाइयों, मैन्युफैक्चरिंग, कृषि आधारित उद्योगों, तकनीक, लॉजिस्टिक्स और दूसरी संबंधित गतिविधियों के जरिए पैदा होने की संभावना है। हालांकि, निवेश और रोजगार से जुड़े ये आंकड़े शुरुआती अनुमान हैं। वास्तविक स्थिति निवेशकों की भागीदारी, उद्योगों की स्थापना और परियोजना की प्रगति पर निर्भर करेगी।
कॉरिडोर के विकास के लिए जबलपुर-इंदौर इकोनॉमिक कॉरिडोर डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड बनाई जाएगी। इस कंपनी का स्वामित्व और नियंत्रण मध्य प्रदेश सरकार के पास रहेगा। कंपनी को कॉरिडोर के औद्योगिक विकास की मुख्य जिम्मेदारी दी जाएगी। वह औद्योगिक क्षेत्रों की योजना तैयार करेगी, निवेश आकर्षित करने की कोशिश करेगी और उद्योगों के लिए जरूरी सुविधाएं विकसित करने का काम संभालेगी।
कंपनी औद्योगिक हब के विकास और निवेशकों को सुविधाएं देने पर भी काम करेगी। इसके तहत जमीन, बुनियादी सुविधाओं और औद्योगिक इकाइयों के लिए जरूरी व्यवस्थाओं को एक योजना के तहत आगे बढ़ाया जाएगा। हालांकि, मुख्य सड़कों का निर्माण संबंधित सरकारी एजेंसियों के जिम्मे रहेगा। यानी कंपनी कॉरिडोर के औद्योगिक हिस्से और हब के विकास पर ध्यान देगी, जबकि प्रमुख सड़कों का निर्माण दूसरी सरकारी एजेंसियां करेंगी।
सरकार का उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना है, जिसमें उद्योग लगाने वाली कंपनियों को जमीन और बुनियादी सुविधाओं के लिए अलग-अलग स्तर पर लंबी प्रक्रिया से न गुजरना पड़े। इसके लिए औद्योगिक हब में जरूरी सुविधाएं पहले से तैयार करने की योजना है। इससे निवेशकों को उद्योग शुरू करने की प्रक्रिया में सहूलियत मिल सकती है और औद्योगिक इकाइयों की स्थापना में लगने वाला समय कम हो सकता है।
इस परियोजना के लिए निवेश और रोजगार के अलग-अलग चरणों में लक्ष्य तय किए गए हैं। सरकार को उम्मीद है कि मार्च 2028 तक कॉरिडोर में एक लाख करोड़ रुपए से अधिक का निवेश आ सकता है। इस निवेश से करीब एक लाख लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार और दो लाख से अधिक लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की संभावना जताई गई है।
दूसरे चरण में, जब परियोजना तीन साल में व्यापक स्तर पर विकसित हो जाएगी, तब तीन लाख करोड़ रुपए से ज्यादा निवेश और छह लाख से अधिक रोजगार के अवसर पैदा होने का अनुमान है। सरकार ने इन लक्ष्यों को कॉरिडोर के लंबे समय के विकास से जोड़कर देखा है। लेकिन इन अनुमानों को अंतिम उपलब्धि नहीं माना गया है। निवेश और रोजगार का वास्तविक स्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि कितने निवेशक परियोजना से जुड़ते हैं, कितनी औद्योगिक इकाइयां स्थापित होती हैं और काम कितनी तेजी से आगे बढ़ता है।
पहले चरण में सरकार तीन से पांच बड़े औद्योगिक हब विकसित करने की तैयारी में है। इसके लिए करीब 10 हजार एकड़ क्षेत्र का शुरुआती आकलन किया गया है। इन हब को प्लग एंड प्ले मॉडल के तहत विकसित करने की योजना है। इस मॉडल में औद्योगिक इकाइयों को उद्योग शुरू करने से पहले ही कई जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने की कोशिश की जाती है।
प्रस्तावित औद्योगिक हब में बिजली, पानी, सड़क, सीवरेज और इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाएं पहले से तैयार मिलेंगी। इसके अलावा कर्मचारियों के लिए आवास, अस्पताल, स्कूल और कौशल विकास केंद्र विकसित करने की भी योजना है। सरकार के मुताबिक, इस तरह की सुविधाएं उपलब्ध होने से कंपनियों को उद्योग स्थापित करने में लगने वाला समय और शुरुआती खर्च कम करने में मदद मिल सकती है।
कॉरिडोर के तहत सभी जिलों में एक जैसे उद्योग विकसित करने के बजाय वहां की औद्योगिक क्षमता और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर अलग-अलग फोकस तय करने की योजना है। जबलपुर में इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा और एयरोस्पेस से जुड़े सहायक उद्योगों को बढ़ावा देने की संभावनाएं हैं। इसके साथ ही फूड प्रोसेसिंग और लॉजिस्टिक्स पर भी ध्यान दिया जा सकता है।
नरसिंहपुर और रायसेन में कृषि आधारित उद्योग, फूड पार्क और वेयरहाउसिंग विकसित करने पर जोर रहेगा। इन गतिविधियों से कृषि उपज के प्रसंस्करण, भंडारण और विपणन के नए अवसर बन सकते हैं। इन दोनों जिलों में औद्योगिक विकास को कृषि से जुड़ी गतिविधियों के साथ जोड़ने की योजना है।
भोपाल में आईटी, टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक्स और नॉलेज सर्विसेज से जुड़ी औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की योजना है। राजधानी में इन क्षेत्रों के लिए औद्योगिक और कारोबारी सुविधाएं विकसित करने पर ध्यान दिया जाएगा। वहीं, सीहोर और देवास में फूड प्रोसेसिंग, मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और वेयरहाउसिंग को प्राथमिकता देने की तैयारी है।
इंदौर में आईटी, आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के विस्तार पर ध्यान दिया जाएगा। इंदौर को देवास और पीथमपुर के मौजूदा औद्योगिक क्षेत्रों से जोड़ने की संभावनाएं भी देखी जा रही हैं। इससे इन क्षेत्रों के बीच औद्योगिक गतिविधियों और सुविधाओं के बेहतर तालमेल की संभावना बन सकती है। हालांकि, इन औद्योगिक हब के लिए जमीन का अंतिम चयन अभी नहीं हुआ है। उद्योगों की विस्तृत सूची भी अभी तय होना बाकी है।
कॉरिडोर के लिए बड़े भू-भाग की जरूरत को देखते हुए जमीन की उपलब्धता अहम मुद्दा होगी। सरकार की योजना के अनुसार, औद्योगिक हब विकसित करने के लिए पहले सरकारी जमीन को प्राथमिकता दी जाएगी। अगर निजी जमीन की जरूरत पड़ती है, तो उसे आपसी सहमति से खरीदने या लागू कानूनों के तहत अधिग्रहित करने का विकल्प रहेगा।
जमीन अधिग्रहण की स्थिति में संबंधित कानूनों के अनुसार मुआवजे और पुनर्वास के प्रावधानों का पालन करना होगा। इसका मतलब है कि प्रभावित जमीन के मामले में कानून में तय मुआवजा और पुनर्वास व्यवस्था लागू करनी होगी। वन भूमि का इस्तेमाल भी सीधे नहीं किया जा सकेगा। इसके लिए केंद्र सरकार की आवश्यक अनुमति और वन संरक्षण संबंधी नियमों का पालन करना होगा।
औद्योगिक हब विकसित करने से पहले पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का आकलन भी किया जाएगा। परियोजना की जमीन, बुनियादी ढांचे और औद्योगिक गतिविधियों से जुड़े असर को ध्यान में रखकर आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी। इस तरह सरकार ने औद्योगिक विकास के साथ जमीन, पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव से जुड़े पहलुओं को भी योजना में शामिल किया है।
जबलपुर-भोपाल-इंदौर इंडस्ट्रियल कॉरिडोर को मध्य प्रदेश में औद्योगिक निवेश बढ़ाने की एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है। सरकार की योजना निवेश, उद्योग और रोजगार को एक साथ आगे बढ़ाने की है। प्रस्तावित औद्योगिक हब समय पर विकसित होते हैं और निवेश के लक्ष्य हासिल होते हैं, तो विनिर्माण, कृषि प्रसंस्करण, तकनीक और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों को गति मिल सकती है।
हालांकि, परियोजना की वास्तविक सफलता कई बातों पर निर्भर करेगी। इनमें जमीन की उपलब्धता, बुनियादी ढांचे का विकास, निवेशकों की रुचि और उद्योगों की स्थापना की रफ्तार शामिल है। फिलहाल सरकार के सामने तीन लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के निवेश के अनुमान को धरातल पर उतारने और छह लाख से अधिक रोजगार के अवसरों को वास्तविक नियुक्तियों में बदलने की चुनौती होगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कैबिनेट ने इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लिए क्या मंजूरी दी?
कैबिनेट ने जबलपुर-भोपाल-इंदौर इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के विकास के लिए नई कंपनी बनाने को मंजूरी दी है।
नई कंपनी को कितनी शुरुआती पूंजी और कर्ज दिया जाएगा?
कंपनी को 100 करोड़ रुपए की शुरुआती पूंजी दी जाएगी। शुरुआती कामकाज के लिए 20 करोड़ रुपए का ब्याज मुक्त कर्ज देने का प्रस्ताव है।
इस योजना में कौन-कौन से जिले शामिल हैं?
जबलपुर, नरसिंहपुर, रायसेन, भोपाल, सीहोर, देवास और इंदौर इस योजना में शामिल हैं।
कॉरिडोर से कितने निवेश और रोजगार की उम्मीद है?
परियोजना के पूरी तरह विकसित होने पर तीन साल में तीन लाख करोड़ रुपए से ज्यादा निवेश और छह लाख से ज्यादा रोजगार के मौके बनने की उम्मीद है।
कॉरिडोर के विकास की जिम्मेदारी किस कंपनी को दी गई है?
जबलपुर-इंदौर इकोनॉमिक कॉरिडोर डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड को औद्योगिक क्षेत्रों की योजना, निवेश आकर्षित करने और जरूरी सुविधाएं विकसित करने की जिम्मेदारी दी गई है।
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