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सलकनपुर धाम में 800 फीट ऊंची पहाड़ी पर विराजीं मां विजयासन

मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में विंध्य पर्वत श्रृंखला की पहाड़ी पर मां विजयासन देवी का सलकनपुर धाम स्थित है। यह प्रदेश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है।

सलकनपुर धाम में 800 फीट ऊंची पहाड़ी पर विराजीं मां विजयासन
Image credit: News Darpan Team

मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में विंध्य पर्वत श्रृंखला की पहाड़ी पर मां विजयासन देवी का सलकनपुर धाम स्थित है। यह प्रदेश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। मां विजयासन को मां विंध्यवासिनी बीजासन देवी के नाम से भी जाना जाता है। यहां सालभर श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं, लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान सलकनपुर का माहौल खास तौर पर भक्ति, आस्था और शक्ति उपासना से भर जाता है।

श्रद्धालुओं के बीच मान्यता है कि मां विजयासन के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है। भक्त यह भी मानते हैं कि मां उन्हें जीवन के संकटों से लड़ने की शक्ति देती हैं। सीहोर जिला प्रशासन के अनुसार, यह मंदिर लगभग 800 फीट ऊंची पहाड़ी पर बना है और भोपाल से करीब 70 किलोमीटर दूर है।

सलकनपुर धाम की पहचान सिर्फ एक प्राचीन मंदिर के तौर पर नहीं है। इस स्थान के साथ देवी दुर्गा के पराक्रम, राक्षस रक्तबीज के संहार, देवी के विजयी स्वरूप और एक बंजारे से जुड़ी लोककथा की परंपराएं भी जुड़ी हुई हैं। यही धार्मिक मान्यताएं इस धाम को श्रद्धालुओं के बीच खास पहचान देती हैं।

सलकनपुर में मां विजयासन देवी की महिमा से जुड़ी सबसे प्रमुख धार्मिक मान्यता देवी दुर्गा और राक्षस रक्तबीज के युद्ध की कथा है। हिंदू पौराणिक परंपरा में रक्तबीज को एक बेहद शक्तिशाली असुर बताया गया है। मान्यता के अनुसार, उसके रक्त की हर बूंद जमीन पर गिरते ही उसके जैसा एक और असुर पैदा हो जाता था। इसी वजह से उसका वध करना देवताओं के लिए बेहद मुश्किल हो गया था।

कथा के अनुसार, रक्तबीज के अत्याचारों से परेशान देवताओं ने आदिशक्ति की आराधना की। देवताओं की पुकार सुनकर देवी ने उग्र रूप धारण किया और रक्तबीज के खिलाफ युद्ध शुरू किया। असुर के रक्त से नए असुर पैदा होने की शक्ति को रोकने के लिए देवी ने ऐसी युक्ति अपनाई, जिससे उसका रक्त धरती पर न गिर सके।

युद्ध के अंत में देवी ने रक्तबीज का वध कर दिया। इसके साथ ही देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति मिली। सलकनपुर की स्थानीय धार्मिक मान्यता इस विजय को इसी पहाड़ी से जोड़ती है। कहा जाता है कि असुर पर जीत हासिल करने के बाद देवी इसी स्थान पर विजयी मुद्रा में विराजमान हुईं।

देवी के इसी विजयी स्वरूप के कारण उन्हें मां विजयासन देवी कहा जाने लगा और यह स्थान विजयासन धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। हालांकि, रक्तबीज के वध का सलकनपुर से संबंध स्थानीय धार्मिक परंपरा और मान्यता का हिस्सा है। इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि श्रद्धा से जुड़ी पौराणिक कथा के रूप में समझा जाता है।

सलकनपुर मंदिर की उत्पत्ति को लेकर एक और बेहद रोचक लोककथा प्रचलित है। यह कथा पीढ़ियों से श्रद्धालुओं के बीच सुनाई जाती रही है। इसमें एक बंजारे, उसके पशुओं और एक दिव्य कन्या का उल्लेख मिलता है। इसी लोककथा को सलकनपुर धाम की पहचान से जुड़ी प्रमुख परंपराओं में गिना जाता है।

लोकमान्यता के अनुसार, लगभग 300 वर्ष पहले कुछ बंजारे अपने पशुओं के साथ यात्रा करते हुए इस पहाड़ी के आसपास के जंगल में आकर रुके थे। लंबी यात्रा की थकान दूर करने के लिए उन्होंने वहीं विश्राम किया। इसी दौरान उनके पशु अचानक लापता हो गए। बंजारों ने जंगल और आसपास के इलाके में काफी खोजबीन की, लेकिन उन्हें अपने पशुओं का कोई पता नहीं चला।

कथा के मुताबिक, पशुओं की तलाश करते हुए एक बुजुर्ग बंजारे को एक छोटी कन्या दिखाई दी। उसने उस कन्या से अपने पशुओं के बारे में पूछा। कन्या ने उसे एक खास जगह पर जाकर देवी की पूजा-अर्चना करने का संकेत दिया। इसके बाद बंजारा उस स्थान पर पहुंचा और उसने मां भगवती की आराधना की।

लोककथा कहती है कि पूजा-अर्चना के बाद बंजारे के खोए हुए पशु वापस मिल गए। इस घटना को बंजारों ने मां की कृपा माना। वे भावविभोर हो गए और उन्होंने उसी स्थान पर देवी का मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। सलकनपुर मंदिर की स्थापना से जुड़ी प्रमुख लोककथाओं में इस कथा का विशेष स्थान है।

इस लोककथा का संदेश श्रद्धालुओं के लिए आस्था, विश्वास और संकट के समय मां की शरण में जाने से जुड़ा है। हालांकि, मंदिर की स्थापना की सटीक तारीख और निर्माण के शुरुआती इतिहास के बारे में ठोस ऐतिहासिक प्रमाण सीमित हैं। इसलिए बंजारे और दिव्य कन्या की कथा को लोकमान्यता और धार्मिक परंपरा के रूप में ही देखा जाता है।

मां के नामों को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक व्याख्याएं प्रचलित हैं। ‘विजयासन’ नाम को देवी की विजय मुद्रा से जोड़कर देखा जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, रक्तबीज का संहार करने के बाद देवी ने इसी क्षेत्र में विजयी स्वरूप धारण किया था। इसी वजह से यहां विराजमान देवी को विजयासन देवी कहा जाने लगा।

वहीं, विंध्यवासिनी नाम देवी के विंध्य क्षेत्र से जुड़े स्वरूप और शक्ति उपासना की परंपरा को दर्शाता है। बीजासन देवी भी इस मंदिर की आराध्य देवी का एक अन्य प्रचलित नाम है। इन नामों के पीछे धार्मिक व्याख्याएं मौजूद हैं, लेकिन मंदिर के नामकरण की एक ही प्रमाणित ऐतिहासिक व्याख्या उपलब्ध होने का दावा नहीं किया जा सकता। स्थानीय परंपराएं ही इस धाम की धार्मिक पहचान का अहम हिस्सा हैं।

सीहोर जिले के सलकनपुर गांव के पास स्थित यह मंदिर लगभग 800 फीट ऊंची पहाड़ी पर बना है। पहाड़ी की ऊंचाई और आसपास का प्राकृतिक वातावरण मंदिर की यात्रा को खास बनाते हैं। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु मां के दर्शन से पहले पहाड़ी पर चढ़ने के अनुभव को भी अपनी धार्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।

मंदिर तक जाने के लिए सीढ़ियों और सड़क मार्ग की सुविधा है। श्रद्धालुओं के लिए रोपवे भी उपलब्ध कराया गया है। जिला प्रशासन की पर्यटन संबंधी जानकारी के अनुसार, मंदिर तक पहुंचने के लिए एक हजार से अधिक सीढ़ियां हैं। कुछ श्रद्धालु इन सीढ़ियों से पहाड़ी पर चढ़ते हैं, जबकि कुछ लोग रोपवे की सुविधा का इस्तेमाल करते हैं।

कई भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर मां के दर्शन के लिए सलकनपुर आते हैं। कुछ परिवार यहां बच्चों का मुंडन संस्कार कराते हैं। दूसरे श्रद्धालु अपनी आस्था और परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। मंदिर में दर्शन के दौरान भक्त मां को चुनरी, नारियल और प्रसाद चढ़ाते हैं।

यहां आने वाले लोगों के लिए देवी की प्रतिमा के दर्शन ही यात्रा का मुख्य उद्देश्य होते हैं। इसके साथ ही पहाड़ी से आसपास के प्राकृतिक दृश्य भी दिखाई देते हैं। इस वजह से सलकनपुर की यात्रा श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक अनुभव के साथ प्रकृति से जुड़ने का अवसर भी बन जाती है।

सलकनपुर धाम से जुड़ी एक अन्य धार्मिक मान्यता यहां जलने वाली पवित्र ज्योतियों को लेकर है। मध्य प्रदेश पर्यटन के एक लेख में नारियल के तेल और घी से जुड़ी दो ज्योतियों के लगभग 400 वर्षों से जलते रहने की स्थानीय मान्यता का उल्लेख किया गया है। श्रद्धालु इन ज्योतियों को देवी की उपस्थिति और लगातार चल रही आराधना का प्रतीक मानते हैं।

धाम में संतों की धूनी और उसकी भस्म को भी भक्त पवित्र प्रसाद के रूप में महत्व देते हैं। इन परंपराओं का श्रद्धालुओं के जीवन में खास स्थान है। हालांकि, ज्योतियों के लगभग 400 वर्षों से जलते रहने से जुड़े दावे को स्वतंत्र ऐतिहासिक अभिलेखों से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि प्रचलित धार्मिक मान्यता के रूप में समझना जरूरी है।

सलकनपुर में चैत्र और शारदीय नवरात्र सबसे बड़े धार्मिक अवसरों में शामिल हैं। इन दिनों मंदिर में दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर परिसर और पहाड़ी तक जाने वाले रास्ते पर ‘जय माता दी’ के जयकारे सुनाई देते हैं। भजन, पूजा-अर्चना और देवी की आराधना का माहौल पूरे क्षेत्र में दिखाई देता है।

नवरात्र के दौरान भक्त नौ दिनों तक देवी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करते हैं। मां विजयासन के दर्शन को लेकर श्रद्धालुओं में खास उत्साह रहता है। अनेक लोग परिवार के साथ सलकनपुर पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मां से प्रार्थना करते हैं। चैत्र और शारदीय नवरात्र के कारण इस धाम में आस्था और शक्ति उपासना का वातावरण और गहरा हो जाता है।

मध्य प्रदेश के पर्यटन विभाग ने भी सलकनपुर मंदिर को महत्वपूर्ण धार्मिक पर्यटन स्थल के तौर पर रेखांकित किया है। नवरात्र के दौरान यहां मेला आयोजित होता है। यह मेला धार्मिक आस्था से जुड़ा होने के साथ स्थानीय व्यापार और पर्यटन को भी बढ़ावा देता है। मंदिर और पहाड़ी तक आने वाले श्रद्धालुओं के कारण इस दौरान पूरे क्षेत्र में धार्मिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं।

सलकनपुर में मंदिर के आसपास सुविधाओं और धार्मिक परिसर के विकास की योजनाओं ने भी इस धाम को चर्चा में रखा है। मध्य प्रदेश पर्यटन के सितंबर 2025 में प्रकाशित लेख में देवी लोक परियोजना का उल्लेख किया गया था। इस परियोजना की परिकल्पना में देवी के अलग-अलग स्वरूपों को दर्शाने वाले परिसर और श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं का विकास शामिल है।

ऐसे विकास का उद्देश्य श्रद्धालुओं की यात्रा को सुविधाजनक बनाना और क्षेत्र की धार्मिक तथा सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करना है। हालांकि, देवी लोक परियोजना से जुड़े सभी काम पूरे हो चुके हैं या नहीं, इसकी वर्तमान स्थिति की अलग से पुष्टि जरूरी है। इसलिए इस परियोजना का उल्लेख उपलब्ध जानकारी और योजना की परिकल्पना के आधार पर ही किया जाता है।

सलकनपुर भोपाल से लगभग 70 किलोमीटर दूर है और यहां सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है। मंदिर पहाड़ी पर स्थित है, इसलिए आगे जाने के लिए सीढ़ियों के साथ रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध है। यात्रा से पहले रोपवे के संचालन की मौजूदा स्थिति की जानकारी लेना उचित माना जाता है।

सीहोर जिला प्रशासन की वेबसाइट के अनुसार, बुदनी रेलवे स्टेशन मंदिर से लगभग 15 किलोमीटर दूर है। रेलवे स्टेशन से आगे की यात्रा सड़क मार्ग से की जा सकती है। इस तरह सलकनपुर पहुंचने के लिए सड़क, सीढ़ियों और रोपवे की सुविधाएं उपलब्ध हैं, जबकि रेल मार्ग से आने वाले श्रद्धालु बुदनी रेलवे स्टेशन के बाद सड़क से मंदिर तक जा सकते हैं।

सलकनपुर वाली मां विजयासन की कथा केवल मंदिर के निर्माण से जुड़ी कहानी नहीं है। यह उस धार्मिक परंपरा का भी वर्णन करती है, जिसमें देवी को संकटों से रक्षा करने वाली शक्ति के रूप में पूजा जाता है। रक्तबीज के संहार की मान्यता मां के पराक्रम का प्रतीक है। वहीं, बंजारे और दिव्य कन्या की लोककथा भक्तों के विश्वास और कृतज्ञता को सामने लाती है।

विंध्य की पहाड़ी पर स्थित यह धाम आज भी हजारों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। कोई मनोकामना लेकर मां के दरबार में पहुंचता है, कोई अपनी इच्छा पूरी होने के बाद धन्यवाद देने आता है और कोई केवल मां के दर्शन कर मन की शांति पाना चाहता है। भक्तों के लिए मां विजयासन का दरबार विश्वास, साहस और शक्ति का प्रतीक बना हुआ है।

जय माता दी। 🙏🙏

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सलकनपुर धाम कहां स्थित है?

सलकनपुर धाम मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में विंध्य पर्वत श्रृंखला की करीब 800 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है।

सलकनपुर धाम भोपाल से कितनी दूर है?

सलकनपुर धाम भोपाल से करीब 70 किलोमीटर दूर है।

मां विजयासन देवी को और किस नाम से जाना जाता है?

मां विजयासन देवी को मां विंध्यवासिनी बीजासन देवी के नाम से भी जाना जाता है।

सलकनपुर में किस पौराणिक कथा की मान्यता है?

सलकनपुर में देवी दुर्गा और राक्षस रक्तबीज के युद्ध और उसके वध की धार्मिक मान्यता प्रचलित है।

सलकनपुर में भक्त कब ज्यादा पहुंचते हैं?

भक्त सालभर दर्शन के लिए पहुंचते हैं, लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहां खास तौर पर भीड़ और भक्ति का माहौल रहता है।

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