पतले लोग भी क्यों झेलते हैं ब्लड शुगर स्पाइक्स? नई रिसर्च में खुलासा
क्यों कुछ पतले और हेल्दी लोग भी ब्लड शुगर स्पाइक्स का सामना करते हैं? आमतौर पर माना जाता है कि पतले, एक्टिव और बैलेंस्ड डाइट लेने वाले लोगों को ब्लड शुगर स्पाइक्स की समस्या नहीं होती।
क्यों कुछ पतले और हेल्दी लोग भी ब्लड शुगर स्पाइक्स का सामना करते हैं?
आमतौर पर माना जाता है कि पतले, एक्टिव और बैलेंस्ड डाइट लेने वाले लोगों को ब्लड शुगर स्पाइक्स की समस्या नहीं होती। लेकिन नई रिसर्च और एक्सपर्ट्स की राय बताती है कि ब्लड शुगर को कंट्रोल करना सिर्फ वजन और खाने की आदतों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इसमें कई और फैक्टर्स भी शामिल होते हैं।
वजन से आगे: मेटाबॉलिक हेल्थ का रोल
डायटीशियन और डायबिटीज एजुकेटर कनिका मल्होत्रा कहती हैं कि वजन मेटाबॉलिक हेल्थ का सही इंडिकेटर नहीं है। कोई इंसान पतला दिख सकता है लेकिन उसके लिवर और पैनक्रियाज जैसे अहम अंगों के आसपास अंदरूनी फैट (TOFI: Thin Outside, Fat Inside) हो सकता है। यह छिपा हुआ फैट ग्लूकोज रेगुलेशन को बिगाड़ सकता है, जिससे पतले लोग भी ब्लड शुगर स्पाइक्स का शिकार हो सकते हैं।
इसके अलावा, जेनेटिक वेरिएशन्स भी अहम भूमिका निभाते हैं। इंसुलिन सिक्रीशन, रिसेप्टर सेंसिटिविटी और बीटा सेल रिजर्व में फर्क के कारण एक ही जैसा खाना खाने पर भी लोगों की ग्लूकोज रिस्पॉन्स अलग-अलग हो सकती है। जैसे कुछ लोगों में फर्स्ट-फेज इंसुलिन रिस्पॉन्स लेट होता है, जिससे उनका ब्लड शुगर इंसुलिन के असर से पहले ही बढ़ जाता है।
मसल मास और लाइफस्टाइल फैक्टर्स का असर
मल्होत्रा बताती हैं कि बॉडी वेट से ज्यादा मसल मास ब्लड शुगर स्टेबिलिटी के लिए जरूरी है। मसल्स शरीर का सबसे बड़ा ग्लूकोज स्टोरेज साइट हैं। ज्यादा मसल मास वाले लोग ब्लड शुगर को बेहतर तरीके से मैनेज कर सकते हैं। वहीं, पतले लेकिन कम मसल मास वाले लोग ग्लूकोज को सही से रेगुलेट करने में दिक्कत झेल सकते हैं।
स्लीप और स्ट्रेस भी अहम फैक्टर हैं। एक रात की खराब नींद अगले दिन इंसुलिन सेंसिटिविटी को करीब एक-तिहाई तक कम कर सकती है, जिससे खाने के बाद ब्लड शुगर स्पाइक्स ज्यादा हो जाते हैं। इसी तरह, स्ट्रेस के कारण रिलीज हुआ कॉर्टिसोल लिवर से स्टोर्ड ग्लूकोज को बाहर निकाल सकता है, जिससे बिना खाना खाए भी ब्लड शुगर बढ़ सकता है।
गट हेल्थ और खाने की कंपोजिशन का असर
गट माइक्रोबायोम की डाइवर्सिटी इस बात को प्रभावित करती है कि कार्ब्स कितनी तेजी से टूटते और एब्जॉर्ब होते हैं, जिससे ब्लड शुगर रिस्पॉन्स बदल सकता है। यहां तक कि खाने का सीक्वेंस भी मायने रखता है—सब्जियां और प्रोटीन पहले खाकर फिर कार्ब्स खाने से ग्लूकोज स्पाइक्स कम हो सकते हैं।
कब चिंता करनी चाहिए?
खाने के बाद ब्लड शुगर का कभी-कभी बढ़ना नॉर्मल है। लेकिन बार-बार स्पाइक्स होना, बेसलाइन लेवल पर धीरे-धीरे वापस आना या फास्टिंग ग्लूकोज का लगातार बढ़ना मेटाबॉलिक प्रॉब्लम का संकेत हो सकता है। ऐसे में डॉक्टर HbA1c, फास्टिंग इंसुलिन या ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट जैसे जांच करने की सलाह दे सकते हैं।
ब्लड शुगर स्पाइक्स को कैसे मैनेज करें?
ग्लूकोज रेगुलेशन सुधारने के लिए एक्सपर्ट्स रेगुलर एक्सरसाइज, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, खाने में प्रोटीन और फाइबर को प्राथमिकता देने और पर्याप्त नींद लेने की सलाह देते हैं। ये लाइफस्टाइल बदलाव ब्लड शुगर स्पाइक्स के खतरे को कम कर सकते हैं, भले ही आप पतले और हेल्दी दिखते हों।
यह समझ बताती है कि मेटाबॉलिक हेल्थ का आकलन करते समय सिर्फ बाहरी दिखावट पर निर्भर नहीं होना चाहिए। ब्लड शुगर रेगुलेशन जेनेटिक्स, लाइफस्टाइल और फिजियोलॉजिकल फैक्टर्स का कॉम्बिनेशन है, जो हर व्यक्ति के लिए अलग होता है।
स्रोत: Indian Express
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पतले लोग भी ब्लड शुगर स्पाइक्स का सामना क्यों करते हैं?
पतले लोग भी ब्लड शुगर स्पाइक्स का सामना कर सकते हैं क्योंकि उनके शरीर में अंदरूनी फैट हो सकता है, जो ग्लूकोज रेगुलेशन को बिगाड़ता है।
ब्लड शुगर स्पाइक्स को कैसे मैनेज किया जा सकता है?
ब्लड शुगर स्पाइक्स को मैनेज करने के लिए रेगुलर एक्सरसाइज, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, प्रोटीन और फाइबर से भरपूर डाइट, और पर्याप्त नींद लेना जरूरी है।
क्या गट हेल्थ ब्लड शुगर पर असर डालती है?
हाँ, गट हेल्थ और माइक्रोबायोम की डाइवर्सिटी ब्लड शुगर रिस्पॉन्स को प्रभावित कर सकती है।
कब ब्लड शुगर स्पाइक्स पर चिंता करनी चाहिए?
अगर बार-बार ब्लड शुगर स्पाइक्स होते हैं या फास्टिंग ग्लूकोज लगातार बढ़ता है, तो यह मेटाबॉलिक प्रॉब्लम का संकेत हो सकता है।
क्या वजन मेटाबॉलिक हेल्थ का सही इंडिकेटर है?
नहीं, वजन मेटाबॉलिक हेल्थ का सही इंडिकेटर नहीं है, क्योंकि पतले लोग भी अंदरूनी फैट और अन्य फैक्टर्स के कारण ब्लड शुगर स्पाइक्स का सामना कर सकते हैं.
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