कर्नाटक में 122 दिन के मानसून में 79 दिन लगभग सूखे रहे
कर्नाटक में मानसून के 122 दिनों में 79 दिन बारिश शून्य या कम रही। कुल बारिश 35% कम हुई, जिससे बुवाई और फसलों की बढ़त प्रभावित हुई।
राज्य राजस्व विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, कर्नाटक में दक्षिण-पश्चिम मानसून का दौर खत्म हो गया। इस दौरान 122 दिनों में से 79 दिन ऐसे रहे, जब बारिश शून्य, लगभग शून्य या सामान्य से कम दर्ज की गई।
बारिश का यह असमान पैटर्न बारिश की कमी और फसलों की बढ़त के अहम दौर में लंबे समय तक चले सूखे के साथ सामने आया। इससे खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों को खासा नुकसान हुआ।
मानसून के ज्यादातर समय बारिश में कमी
कर्नाटक में दक्षिण-पश्चिम मानसून का दौर 1 जून से 30 सितंबर तक रहता है। यह कुल 122 दिनों का समय होता है।
राज्य के लिए यह एक बेहद अहम दौर है, क्योंकि कैलेंडर साल में होने वाली कर्नाटक की कुल बारिश का करीब 74% इसी अवधि में होता है।
राज्य राजस्व विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि इन 122 दिनों में 31 दिन सामान्य बारिश हुई। वहीं, सिर्फ 12 दिनों में सामान्य आंकड़े से ज्यादा बारिश दर्ज की गई।
इसका मतलब है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून का यह अहम दौर 65% तक लगभग सूखा रहा।
दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान कर्नाटक में 551 mm बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश का आंकड़ा 852 mm है। इस तरह राज्य में बारिश की कुल कमी 35% रही।
कम और असमान बारिश का असर कमजोर इलाकों में बुवाई, फसलों के जमने और फसलों की बढ़त पर पड़ा।
विशेषज्ञों ने कहा कि नुकसान सिर्फ बारिश की कुल कमी से नहीं हुआ, बल्कि बारिश के बीच लंबे अंतराल की वजह से भी फसलों को नुकसान पहुंचा।
लंबे सूखे ने फसलों की बढ़त पर असर डाला
कृषि और फसलों की बढ़त के लिए पूरे मानसून के दौरान हुई बारिश की कुल मात्रा ही अहम नहीं होती। फसलों की बढ़त के अलग-अलग दौर में नियमित अंतराल पर बारिश होना भी जरूरी है। यह बात एग्रो मेटेरोलॉजिस्ट और कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय-बेंगलुरु में विजिटिंग प्रोफेसर एम.बी. राजे गौड़ा ने कही।
उन्होंने कहा, “अगर सूखा 10 दिनों से ज्यादा समय तक जारी रहता है, तो फसलें मुरझाने लगती हैं।”
गौड़ा ने कहा कि फसलों की अच्छी बढ़त के लिए दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान 50 से 52 दिनों तक अच्छी बारिश होना जरूरी है।
इसलिए बारिश का पैटर्न भी मौसम के कुल बारिश आंकड़े जितना ही अहम रहा। खासकर तब, जब फसलों की बढ़त के अलग-अलग दौर के दौरान सूखे का दौर जारी रहा।
विशेषज्ञों ने देखा कि बारिश के असमान बंटवारे और लंबे समय तक रही सूखी स्थिति ने खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया। इसके चलते फसलों को भारी नुकसान हुआ।
फसलों का नुकसान ₹46,323 करोड़ आंका गया
गौड़ा के मुताबिक, कम बारिश और बारिश के असमान बंटवारे ने इस मौसम में फसलों को हुए भारी नुकसान में सबसे बड़ी भूमिका निभाई।
कर्नाटक ने खरीफ सीजन में सूखे की वजह से फसलों को हुए नुकसान का अनुमान ₹46,323 करोड़ लगाया है।
इस अनुमान में खेती की फसलों के साथ-साथ बागवानी और मसाले वाली फसलें भी शामिल हैं।
गौड़ा ने बताया कि जुलाई में तापमान में गिरावट के कारण ज्यादा दबाव वाले मौसम तंत्र बने।
उन्होंने कहा कि इन मौसम तंत्रों ने मानसून के बादलों को कर्नाटक के दक्षिणी और उत्तरी अंदरूनी हिस्सों से दूर कर दिया। इसके चलते सूखे का दौर आया और बारिश बेहद कम हुई।
गौड़ा ने कर्नाटक में मानसून के पैटर्न पर कई अध्ययन किए हैं। उन्होंने कहा कि अधिकारियों को फसल बीमा योजना में “बारिश के बंटवारे” को भी एक कारक के तौर पर शामिल करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इससे बारिश के असमान बंटवारे का फसलों पर पड़े असर की भरपाई की जा सकेगी।
स्रोत: The Hindu
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कर्नाटक में दक्षिण-पश्चिम मानसून कितने दिनों का रहा?
कर्नाटक में दक्षिण-पश्चिम मानसून 1 जून से 30 सितंबर तक कुल 122 दिनों का रहा।
मानसून के दौरान कर्नाटक में कितने दिन लगभग सूखे रहे?
122 दिनों में 79 दिन ऐसे रहे, जब बारिश शून्य, लगभग शून्य या सामान्य से कम दर्ज की गई।
कर्नाटक में मानसून के दौरान कितनी बारिश हुई?
कर्नाटक में 551 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश 852 मिलीमीटर होती है। यानी बारिश में 35 प्रतिशत कमी रही।
सूखे की वजह से फसलों का नुकसान कितना आंका गया?
कर्नाटक ने खरीफ सीजन में फसलों, बागवानी और मसाले वाली फसलों को हुए नुकसान का अनुमान 46,323 करोड़ रुपये लगाया है।
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