झारखंड हाईकोर्ट ने मानसिक बीमारी का बहाना खारिज किया, पति को खर्चा देना होगा
झारखंड हाईकोर्ट: मानसिक बीमारी के बहाने से पत्नी को खर्चा देने से बच नहीं सकते झारखंड हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें एक शख्स को अपनी अलग रह रही पत्नी को हर महीने ₹3,000
झारखंड हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें एक शख्स को अपनी अलग रह रही पत्नी को हर महीने ₹3,000 अंतरिम खर्चा देने का आदेश दिया गया था। कोर्ट ने शख्स की इस दलील को खारिज कर दिया कि मानसिक बीमारी की वजह से वह यह जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ है। जस्टिस अनिल कुमार चौधरी ने 7 जुलाई के आदेश में साफ किया कि सिर्फ मानसिक बीमारी के आधार पर यह मान लेना सही नहीं है कि व्यक्ति निर्णय लेने या कमाने में असमर्थ है।
मानसिक बीमारी से आर्थिक जिम्मेदारी से बचने का बहाना नहीं
याचिकाकर्ता ने अपनी मानसिक स्थिति का हवाला देकर बकाया खर्चा माफ करने की मांग की थी। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि उसकी बीमारी इतनी गंभीर नहीं थी कि वह कमाने या अपने कामकाज संभालने में असमर्थ हो। कोर्ट ने कहा कि हल्की, मध्यम या सीमा रेखा पर स्थित मानसिक समस्याओं वाले लोग सामान्य सामाजिक परिस्थितियों में काम कर सकते हैं।
यह फैसला फैमिली कोर्ट के उस विश्लेषण के बाद आया, जिसमें कहा गया था कि याचिकाकर्ता की स्थिति दवाइयों से बेहतर हो चुकी है और वह कमाने में सक्षम है। फैमिली कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों और 2017 के मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम के प्रावधानों का भी हवाला दिया था।
2024 से खर्चा देने में चूक
दिसंबर 2021 के आदेश के तहत शख्स को अपनी पत्नी को अंतरिम खर्चा देना था। लेकिन उसने जुलाई 2024 से भुगतान बंद कर दिया, जिसके बाद कानूनी कार्रवाई शुरू हुई। पति के वकील राहुल पांडे ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट ने उसकी याचिका को उसकी मानसिक बीमारी को मानते हुए भी बिना सोचे-समझे खारिज कर दिया।
इस पर सरकारी वकील मनोज के मिश्रा ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में नाकाम रहा कि उसकी मानसिक स्थिति इतनी खराब है कि वह कमाने या अपने कामकाज संभालने में असमर्थ है। हाईकोर्ट ने भी फैमिली कोर्ट के फैसले में कोई गलती नहीं पाई।
इस फैसले का महत्व
यह फैसला दिखाता है कि न्यायपालिका मानसिक बीमारी को कानूनी और आर्थिक जिम्मेदारियों से बचने का बहाना मानने को तैयार नहीं है, खासकर जब मामला पत्नी के खर्चे का हो। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि ऐसी दलीलों को साबित करने के लिए ठोस सबूत जरूरी हैं, सिर्फ बीमारी का सामान्य दावा काफी नहीं है।
स्रोत: Indian Express
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
झारखंड हाईकोर्ट ने इस मामले में क्या फैसला सुनाया?
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और एक पति को अपनी अलग रह रही पत्नी को हर महीने ₹3,000 अंतरिम खर्चा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने पति की इस दलील को खारिज कर दिया कि मानसिक बीमारी की वजह से वह यह जिम्मेदारी निभा नहीं सकता।
क्या मानसिक बीमारी के आधार पर खर्चा देने से बचा जा सकता है?
नहीं। कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ मानसिक बीमारी के आधार पर यह मान लेना सही नहीं है कि व्यक्ति निर्णय लेने या कमाने में असमर्थ है। हल्की, मध्यम या सीमा रेखा पर स्थित मानसिक समस्याओं वाले लोग सामान्य परिस्थितियों में काम कर सकते हैं।
पति ने खर्चा देना कब बंद किया?
दिसंबर 2021 के आदेश के तहत पति को खर्चा देना था, लेकिन उसने जुलाई 2024 से भुगतान बंद कर दिया, जिसके बाद कानूनी कार्रवाई शुरू हुई।
इस फैसले का मतलब क्या है?
यह फैसला दिखाता है कि न्यायपालिका मानसिक बीमारी को कानूनी और आर्थिक जिम्मेदारियों से बचने का बहाना मानने को तैयार नहीं है। ऐसी दलीलों को साबित करने के लिए ठोस सबूत जरूरी हैं, सिर्फ बीमारी का सामान्य दावा काफी नहीं है।
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