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National Official source ग्वालियर

ग्वालियर हाईकोर्ट: ओबीसी क्रीमी लेयर में सिर्फ सैलरी से फैसला नहीं

ग्वालियर हाईकोर्ट ने OBC नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया है।

ग्वालियर हाईकोर्ट: ओबीसी क्रीमी लेयर में सिर्फ सैलरी से फैसला नहीं
Image credit: News Darpan Team

ग्वालियर हाईकोर्ट ने OBC नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि किसी अभ्यर्थी को OBC क्रीमी लेयर में रखने का फैसला केवल उसके माता-पिता की सैलरी या सालाना आय देखकर नहीं किया जा सकता। इसके लिए माता-पिता का पद, सेवा की स्थिति, प्रमोशन, सेवा से जुड़े दूसरे पहलू और लागू सरकारी नियमों को भी ध्यान में रखना जरूरी होगा।

यह मामला रागिनी राठौर के OBC नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र के आवेदन से जुड़ा है। रागिनी के पिता न्यायिक सेवा में सिविल जज रहे हैं। उनकी सालाना आय करीब 16.99 लाख रुपये बताई गई थी। इसी आय को आधार बनाकर सक्षम अधिकारियों ने रागिनी का OBC प्रमाणपत्र जारी करने का आवेदन खारिज कर दिया था।

रागिनी ने OBC नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया था। अधिकारियों ने उनके पिता की सालाना आय को आधार बनाते हुए आवेदन निरस्त कर दिया। इस आदेश में OBC क्रीमी लेयर के लिए निर्धारित आय सीमा का हवाला दिया गया था। अधिकारियों ने 16.99 लाख रुपये की आय को पात्रता तय करने का आधार माना।

इसके बाद रागिनी ने इस कार्रवाई के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान उनकी ओर से कहा गया कि उनके पिता की सेवा और पद से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं की ठीक से जांच नहीं की गई। दलील दी गई कि केवल सकल वेतन को आधार बनाकर OBC नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र का आवेदन खारिज कर दिया गया।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के की पीठ ने की। पीठ ने कहा कि क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय केवल वेतन की राशि को निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता। संबंधित अधिकारी को माता-पिता की सेवा स्थिति, पद, प्रमोशन की तारीख और लागू सरकारी दिशा-निर्देशों सहित दूसरे प्रासंगिक तथ्यों पर भी विचार करना होगा।

सुनवाई के दौरान रागिनी के पिता की सेवा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने आया। बताया गया कि उन्हें जज क्लास-II से क्लास-I पद पर 40 वर्ष की उम्र के बाद प्रमोशन मिला था। हाईकोर्ट ने माना कि इस तरह के सेवा संबंधी पहलुओं की जांच किए बिना केवल वेतन के आंकड़े के आधार पर क्रीमी लेयर का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि माता-पिता की आय निश्चित रूप से मामले का एक पहलू हो सकती है, लेकिन उसे अकेला और अंतिम आधार नहीं बनाया जा सकता। अधिकारी को सेवा की स्थिति, पद और प्रमोशन से जुड़े रिकॉर्ड के साथ-साथ लागू नियमों को भी देखना होगा। इसी आधार पर यह तय किया जाना होगा कि संबंधित अभ्यर्थी OBC नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र के लिए पात्र है या नहीं।

हाईकोर्ट ने रागिनी के आवेदन को खारिज करने वाले पहले के दोनों आदेशों को निरस्त कर दिया। इनमें ईसागढ़ के एसडीओ और इसके बाद अशोकनगर के अपर कलेक्टर द्वारा पारित आदेश शामिल हैं। कोर्ट के आदेश के बाद इन दोनों आदेशों के आधार पर रागिनी के आवेदन को खारिज किए जाने की स्थिति बरकरार नहीं रहेगी।

कोर्ट ने सक्षम अधिकारी को निर्देश दिया कि रागिनी के OBC प्रमाणपत्र के आवेदन पर नए सिरे से विचार किया जाए। नई जांच के दौरान उनके पिता की सेवा स्थिति, पद, प्रमोशन, आय के स्रोत और लागू नियमों सहित सभी संबंधित पहलुओं को देखा जाए। इसके बाद सक्षम अधिकारी को कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा।

हाईकोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया के लिए छह सप्ताह की समय-सीमा तय की है। सक्षम अधिकारी को छह सप्ताह के भीतर रागिनी के आवेदन पर नए सिरे से जांच पूरी कर फैसला लेना होगा। आदेश में यह भी साफ किया गया है कि फैसला संबंधित तथ्यों और लागू नियमों पर विचार करने के बाद ही लिया जाए।

सुनवाई के दौरान OBC क्रीमी लेयर से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का भी हवाला दिया गया। रिपोर्टों के अनुसार, कोर्ट ने 11 मार्च 2026 के सुप्रीम कोर्ट के Union of India बनाम रोहित नाथन मामले सहित पूर्व न्यायिक निर्णयों का संदर्भ लिया। इन निर्णयों का उल्लेख करते हुए क्रीमी लेयर तय करने में आय के साथ सेवा और पद से जुड़े पहलुओं पर विचार की जरूरत को रेखांकित किया गया।

रागिनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सांघी ने पक्ष रखा। उनकी ओर से यह दलील सामने रखी गई कि केवल सकल वेतन को आधार बनाकर प्रमाणपत्र का आवेदन खारिज करना उचित नहीं था। हाईकोर्ट ने मामले में उपलब्ध सेवा संबंधी जानकारी और लागू नियमों को ध्यान में रखते हुए पुराने आदेशों को रद्द किया और नए सिरे से जांच के निर्देश दिए।

हालांकि, हाईकोर्ट के इस आदेश का मतलब यह नहीं है कि रागिनी राठौर को OBC नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र मिल गया है। कोर्ट ने फिलहाल पुराने आदेशों को निरस्त किया है और आवेदन पर दोबारा फैसला लेने को कहा है। प्रमाणपत्र जारी करने का अंतिम निर्णय अभी सक्षम अधिकारी की नई जांच के बाद होगा।

यानी अब सक्षम अधिकारी को लागू नियमों के तहत रागिनी के मामले की फिर से जांच करनी होगी। इस जांच में केवल 16.99 लाख रुपये की सालाना आय को आधार नहीं बनाया जा सकेगा। पिता की सेवा स्थिति, पद, प्रमोशन, आय के स्रोत और लागू सरकारी दिशा-निर्देशों सहित सभी संबंधित पहलुओं पर विचार करना होगा। इसके बाद ही पात्रता को लेकर अंतिम फैसला लिया जाएगा।

इस आदेश का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ग्वालियर हाईकोर्ट ने OBC क्रीमी लेयर की निर्धारित आय सीमा में कोई बदलाव नहीं किया है। कोर्ट ने आय सीमा को खत्म या बदलने का कोई नया आदेश नहीं दिया। आदेश का केंद्र यह है कि क्रीमी लेयर की स्थिति तय करते समय माता-पिता की सैलरी को अकेला और अंतिम आधार नहीं माना जा सकता।

इसलिए ग्वालियर हाईकोर्ट का आदेश OBC क्रीमी लेयर की आय सीमा में बदलाव से जुड़ा फैसला नहीं है। यह पात्रता तय करने की प्रक्रिया और मामले से जुड़े सभी प्रासंगिक तथ्यों पर विचार करने से जुड़ा आदेश है। रागिनी राठौर के आवेदन पर अब छह सप्ताह के भीतर नए सिरे से जांच के बाद कारणयुक्त आदेश पारित किया जाना है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ग्वालियर हाईकोर्ट ने OBC क्रीमी लेयर को लेकर क्या कहा?

कोर्ट ने कहा कि OBC क्रीमी लेयर का फैसला सिर्फ माता-पिता की सैलरी या सालाना आय देखकर नहीं किया जा सकता।

रागिनी राठौर का OBC प्रमाणपत्र आवेदन क्यों खारिज किया गया था?

अधिकारियों ने उनके पिता की करीब 16.99 लाख रुपये सालाना आय को आधार बनाकर आवेदन खारिज किया था।

OBC नॉन-क्रीमी लेयर तय करते समय किन बातों को देखना होगा?

माता-पिता का पद, सेवा की स्थिति, प्रमोशन, आय के स्रोत और लागू सरकारी नियमों को भी देखना होगा।

हाईकोर्ट ने रागिनी राठौर के मामले में क्या आदेश दिया?

कोर्ट ने पहले के दोनों आदेश रद्द कर दिए और आवेदन पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया।

सक्षम अधिकारी को कितने समय में फैसला लेना होगा?

सक्षम अधिकारी को छह सप्ताह के भीतर जांच पूरी कर कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा।

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