ड्रोन से टीबी जांच का समय 10 दिन घटा, खर्च ₹9,451 से ₹91 हुआ
ड्रोन ने टीबी जांच का समय 10 दिन घटाया, खर्च ₹9,451 से ₹91 पर लाया कैसे ड्रोन ने तेलंगाना में टीबी जांच को बदल दिया भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की नई रिपोर्ट के मुताबिक, तेलंगाना में
कैसे ड्रोन ने तेलंगाना में टीबी जांच को बदल दिया
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की नई रिपोर्ट के मुताबिक, तेलंगाना में ड्रोन की मदद से टीबी की जांच का समय और खर्च दोनों में भारी कमी आई है। पहले टीबी की जांच में औसतन 16.6 दिन लगते थे, लेकिन अब ये समय घटकर सिर्फ 6.9 दिन रह गया है। वहीं, जांच का खर्च ₹9,451 से गिरकर सिर्फ ₹91 हो गया है।
भारत के टीबी खत्म करने के लक्ष्य में बड़ा कदम
ये तकनीक ऐसे समय में आई है जब भारत 2030 तक टीबी खत्म करने के वैश्विक लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश कर रहा है। भारत ने अपना 2025 का लक्ष्य पहले ही मिस कर दिया है। खासकर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में, जहां बुनियादी ढांचे की कमी और लैब्स तक लंबी दूरी इलाज में देरी करती है। ICMR के डायरेक्टर जनरल डॉ. राजीव बहल ने कहा, "ये स्टडी दिखाती है कि कैसे तकनीक भौगोलिक बाधाओं को पार कर सकती है और मरीजों का बोझ कम कर सकती है।"
i-DRONE नाम की इस पहल के तहत, तेलंगाना के अलैर, भोंगिर, रामन्नापेट और चौटुप्पल इलाकों में 60 सब-सेंटर, 11 प्राइमरी हेल्थ सेंटर और 4 टीबी यूनिट्स को एक नेटवर्क से जोड़ा गया। ड्रोन ने दूरदराज के कलेक्शन सेंटर से सैंपल उठाकर डायग्नोस्टिक लैब्स तक पहुंचाए, जिससे कामकाज में तेजी आई।
समय पर जांच में आने वाली रुकावटों को दूर किया
i-DRONE पहल से पहले, मरीजों को टेस्ट कराने के लिए 10 से 30 किलोमीटर तक खराब सड़कों पर सफर करना पड़ता था। ट्रांसपोर्ट की कमी, सामाजिक कलंक और दिहाड़ी मजदूरी का नुकसान भी बड़ी समस्या थी। अब मरीज सिर्फ नजदीकी सब-सेंटर या प्राइमरी हेल्थ सेंटर जाकर सैंपल दे सकते हैं, जिसे ड्रोन लैब तक पहुंचा देते हैं। इससे मरीजों का बोझ कम हुआ है, जिनमें से ज्यादातर की मासिक आमदनी ₹5,000 से कम है।
ड्रोन कैसे काम करते थे
दो तरह के ड्रोन इस्तेमाल किए गए। एक 11.5 किलो का ड्रोन जो 2 किलो का सैंपल ले जा सकता था और दूसरा 24 किलो का ड्रोन जो 8 किलो तक का सैंपल ले जाने में सक्षम था। उड़ान के रास्ते पहले से प्रोग्राम किए गए थे, जिसमें इलाके, आबादी और नो-फ्लाई जोन का ध्यान रखा गया। हेल्थ सेंटर और टीबी यूनिट्स पर खास टेक-ऑफ और लैंडिंग साइट बनाई गईं।
मुख्य नतीजे: तेज नतीजे, कम देरी
स्टडी में पाया गया कि एक या दो दिन के अंदर टीबी जांच के नतीजे पाने वाले मरीजों की संख्या में भारी इजाफा हुआ। जहां पहले सिर्फ 6.3% मरीजों को उसी दिन नतीजे मिलते थे, अब ये आंकड़ा 7.4% हो गया है। अगले दिन नतीजे पाने वालों की संख्या 1.5% से बढ़कर 76.3% हो गई। वहीं, दो दिन की देरी झेलने वालों का प्रतिशत 92.2% से घटकर 16.3% रह गया। ये नतीजे मणिपुर और नागालैंड में हुई पहले की हेल्थकेयर ड्रोन पहल के सफल परिणामों से मेल खाते हैं।
इसकी अहमियत क्यों है
i-DRONE पहल दिखाती है कि कैसे इनोवेटिव तकनीक दूरदराज के इलाकों में हेल्थकेयर को बदल सकती है। जांच का समय और खर्च कम करके, ड्रोन न सिर्फ टीबी के इलाज को ज्यादा सुलभ बनाते हैं, बल्कि मरीजों पर आर्थिक और लॉजिस्टिक दबाव भी घटाते हैं। भारत के टीबी को खत्म करने के मिशन में ऐसी तकनीकें हेल्थकेयर सिस्टम की खामियों को दूर करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
स्रोत: Indian Express
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ड्रोन से टीबी जांच का समय कितना घटा है?
ड्रोन से टीबी जांच का समय 10 दिन घटकर 6.9 दिन रह गया है।
टीबी जांच का खर्च अब कितना हो गया है?
टीबी जांच का खर्च ₹9,451 से घटकर सिर्फ ₹91 हो गया है।
i-DRONE पहल का उद्देश्य क्या है?
i-DRONE पहल का उद्देश्य दूरदराज के इलाकों में टीबी जांच को तेज और सस्ता बनाना है।
ड्रोन किस तरह के सैंपल ले जा सकते हैं?
ड्रोन 2 किलो और 8 किलो तक के सैंपल ले जाने में सक्षम हैं।
इस पहल से मरीजों को क्या फायदा हुआ है?
इस पहल से मरीजों का बोझ कम हुआ है और उन्हें जल्दी नतीजे मिल रहे हैं।
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