इंस्पेक्टर ने लिखा पुलिस का दर्द, कार्रवाई से आधे लोग असंतुष्ट
जिले में तैनात इंस्पेक्टर ने पुलिस की पीड़ा को शब्दों में लिखा है। उन्होंने अपनी बात का नाम “पुलिसिंग की सच्चाई, खामोश कर्तव्य” रखा है।
जिले में तैनात इंस्पेक्टर ने पुलिस की पीड़ा को शब्दों में लिखा है। उन्होंने अपनी बात का नाम “पुलिसिंग की सच्चाई, खामोश कर्तव्य” रखा है। इस लेख में पुलिस की ड्यूटी, लोगों की उम्मीदों, शिकायतों, पुलिस विभाग की कमियों और खाकी पहनने वाले कर्मचारियों की मुश्किलों का जिक्र किया गया है।
लेख में कहा गया है कि पुलिसिंग कभी आसान नहीं रही। इसके लिए एक ऐसे थाने की कल्पना करने को कहा गया है, जहाँ पूरा स्टाफ पूरी ईमानदारी और मेहनत से काम कर रहा हो। इसके बावजूद सवाल उठाया गया है कि क्या ऐसे थाने से जुड़े सभी लोग एकदम संतुष्ट होंगे।
लेख के मुताबिक, हर मामले में दो पक्ष होते हैं। पुलिस पूरी निष्ठा से काम करे, तब भी वह केवल पचास प्रतिशत लोगों को ही संतुष्ट कर पाएगी। बाकी पचास प्रतिशत लोग, सच चाहे कुछ भी हो, पुलिस पर आरोप लगाएंगे। उनके आरोप होंगे, “पुलिस ने पैसे खा लिए”, “विपक्षी से मिल गई”, “ऊपर से दबाव है”।
इसमें कहा गया है कि जो पक्ष ग़लत होता है, वह आम तौर पर अपनी ग़लती स्वीकार नहीं करता। इसके बजाय वह पुलिस पर ही आरोप मढ़ देता है। लेख के अनुसार, इसी वजह से पुलिस के लिए हर मामले में दोनों पक्षों को संतुष्ट करना संभव नहीं होता।
इंस्पेक्टर ने यह भी माना है कि कुछ स्थानों पर पुलिस के व्यवहार या जल्दबाज़ी के कारण उन लोगों में से भी कुछ लोग नाराज़ हो जाते हैं, जो पुलिस की कार्रवाई से संतुष्ट हो सकते थे। यानी पुलिस की अपनी कमियाँ भी हैं और उसके काम करने के तरीके से जुड़ी शिकायतों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
लेख में कहा गया है कि हत्या, लूट या बलात्कार जैसे संगीन मामलों में शिकायतें कम आती हैं, क्योंकि ऐसे मामलों में सच्चाई और सबूत स्पष्ट होते हैं। इसके उलट, ज़मीनी विवादों में सबसे ज़्यादा असंतोष देखने को मिलता है। ऐसे मामलों में पुलिस के अधिकार सीमित होते हैं।
इन विवादों में पुलिस केवल यथास्थिति बनाए रख सकती है और शांति व्यवस्था सुनिश्चित कर सकती है। पुलिस किसी का “कब्ज़ा दिला” नहीं सकती। एक पक्ष चाहता है कि पुलिस उसका पक्ष ले, जबकि दूसरा पक्ष चाहता है कि उसका कब्ज़ा बना रहे। ऐसे हालात में कोई भी निष्पक्ष फैसला दोनों पक्षों को खुश नहीं कर सकता।
मुकदमा दर्ज करने को लेकर भी पुलिस के सामने लगभग यही स्थिति रहती है। जिसके खिलाफ मुकदमा लिखा जाता है, वह कहता है कि पुलिस दूसरे पक्ष से मिल गई और उसके खिलाफ फ़र्ज़ी मुकदमा लिख दिया। अगर मुकदमा दर्ज नहीं होता, तो दूसरा पक्ष आरोप लगाता है कि पुलिस विपक्षी से मिल गई है और पैसा खा लिया है, इसलिए मुकदमा नहीं लिख रही है।
इंस्पेक्टर ने पुलिस और दूसरे विभागों के बीच के फर्क को भी बताया है। बिजली, बैंक या अस्पताल में लोग अपनी समस्या लेकर जाते हैं और समाधान की उम्मीद करते हैं। लेकिन पुलिस के पास आने वाली हर समस्या में एक दूसरा पक्ष भी होता है। वही दूसरा पक्ष अक्सर विवाद का केंद्र होता है।
इसी वजह से पुलिस चाहे जितनी ईमानदारी से काम करे, एक पक्ष असंतुष्ट रहेगा ही। लेख में कहा गया है कि असंतुष्ट पक्ष पुलिस पर तरह-तरह के आरोप लगाएगा। सोशल मीडिया के दौर में यह स्थिति और बढ़ गई है।
अब लोग छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर भी, जिन्हें चौकी या थाना स्तर पर हल किया जा सकता है, IPS लेबल के अधिकारी के CUG नम्बर पर कॉल करके अपनी बात बताने की कोशिश करते हैं। लेख में कहा गया है कि लोग ऐसा दिन हो या रात के 02:00 बजे हों, किसी भी समय करते हैं।
इंस्पेक्टर ने पुलिस विभाग की कमियों से भी इनकार नहीं किया है। उन्होंने साफ लिखा है कि यह कहना गलत नहीं होगा कि विभाग में कमियाँ नहीं हैं। कमियाँ बहुत हैं। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि पुलिस विभाग में कार्यवाही सबसे तेज़ होती है।
किसी शिकायत पर PE(प्रारंभिक जाँच), BED INTERY, लाइनहाज़िरी, निलंबन या तबादला जितनी जल्दी पुलिस विभाग में होता है, शायद ही किसी अन्य विभाग में होता हो। गंभीर मामलों में पुलिस वालों के विरुद्ध मुकदमा तक दर्ज हो जाता है। लेख में पुलिस विभाग के भीतर होने वाली इस तेज़ कार्रवाई को भी सामने रखा गया है।
पुलिस के व्यवहार को लेकर रहने वाली शिकायतों पर भी इंस्पेक्टर ने बात की है। उन्होंने कहा है कि यह भी सोचना चाहिए कि एक पुलिसकर्मी किन परिस्थितियों में काम करता है। जब त्योहारों पर लोग अपने परिवार के साथ छुट्टियाँ मना रहे होते हैं, तब पुलिसकर्मी सड़कों पर खड़ा होता है।
भीषण ठंड में पुलिसकर्मी रातभर जागता है। तपती गर्मी में वह सड़क पर खड़ा रहता है। बरसात में भीगते हुए गश्त करना भी उसकी ड्यूटी का हिस्सा है। लेख में कहा गया है कि यही उसकी दिनचर्या है।
इसके साथ अपराध नियंत्रण, अपराधियों की धरपकड़ और घटनाओं का अनावरण लगातार चलता रहता है। मुकदमों की विवेचना, कोर्ट के काम और अनगिनत प्रार्थना पत्रों की जाँच भी पुलिसकर्मियों को करनी होती है। इसके अलावा VIP ड्यूटी, त्योहार और जुलूस की जिम्मेदारियाँ भी होती हैं। लेख के मुताबिक, यह सब बिना रुके चलता रहता है।
लंबी ड्यूटी, कम छुट्टियाँ या जरूरत पर छुट्टी न मिलना और परिवार से दूरी भी पुलिसकर्मी के जीवन का हिस्सा हैं। इंस्पेक्टर ने लिखा है कि ये परिस्थितियाँ उसके चिड़चिड़ेपन या थकान की वजह हो सकती हैं। इसे उसकी संवेदना की कमी नहीं माना जाना चाहिए।
लेख में पुलिसकर्मियों के प्रति समाज और मीडिया के रवैये पर भी सवाल उठाया गया है। कहा गया है कि इतनी मेहनत, त्याग और लगातार ड्यूटी के बाद भी पुलिस को वह सम्मान नहीं मिलता, जिसकी वह हकदार है। हर समय आलोचना, हर घटना के बाद अविश्वास और नकारात्मकता पुलिस की स्थायी संगत बन गई है।
किसी एक पुलिसकर्मी की गलती पूरे विभाग पर आरोप बन जाती है। इसके उलट, हज़ारों ईमानदार पुलिसकर्मियों का परिश्रम, जनसेवा और त्याग अक्सर अनदेखा रह जाता है। लेख में कहा गया है कि जो पुलिसकर्मी दिन-रात सड़कों पर रहता है, उसी पर सबसे ज़्यादा सवाल उठते हैं।
इंस्पेक्टर ने यह भी याद दिलाया है कि पुलिस किसी अलग समाज से नहीं आती। पुलिस में कोई वंशानुगत परंपरा नहीं है। पुलिसकर्मी भी इसी समाज के आम लोग हैं, जो इसी समाज से निकलकर “खाकी” पहनते हैं।
इसके बावजूद पुलिस शिकायत नहीं करती। लेख में कहा गया है कि पुलिस को पता है कि खाकी सिर्फ़ वर्दी नहीं, एक व्रत है। यह समाज की सुरक्षा की वह डोर है, जो आलोचना के बीच भी दृढ़ रहती है।
लेख के अंत में कर्तव्य पर विश्वास और आलोचना के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती का जिक्र किया गया है। अंत में लिखा है, “इसी सुख से परिपूर्ण आपका निरीक्षक जो पी शर्मा, औरैया।”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इंस्पेक्टर ने अपने लेख का क्या नाम रखा है?
इंस्पेक्टर ने अपने लेख का नाम “पुलिसिंग की सच्चाई, खामोश कर्तव्य” रखा है।
पुलिस की कार्रवाई से कितने लोग संतुष्ट हो पाते हैं?
लेख के मुताबिक, पुलिस पूरी ईमानदारी से काम करे तब भी करीब 50 प्रतिशत लोग ही संतुष्ट हो पाते हैं।
जमीन विवाद में पुलिस क्या कर सकती है?
जमीन विवाद में पुलिस यथास्थिति बनाए रख सकती है और शांति व्यवस्था सुनिश्चित कर सकती है, लेकिन किसी को कब्जा नहीं दिला सकती।
मुकदमा दर्ज होने या न होने पर लोग पुलिस पर क्या आरोप लगाते हैं?
मुकदमा दर्ज होने पर आरोपी पक्ष पुलिस पर दूसरे पक्ष से मिलने का आरोप लगाता है। मुकदमा दर्ज न होने पर दूसरा पक्ष पुलिस पर विपक्षी से मिलने और पैसे लेने का आरोप लगाता है।
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