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Politics Explainer मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश में कांग्रेस के आक्रामक प्रदर्शनों के बावजूद जनता में असर नहीं

मध्यप्रदेश की सियासत में इन दिनों मौसम से ज्यादा राजनीतिक उमस महसूस की जा रही है। विपक्षी कांग्रेस अचानक आक्रामक तेवरों के साथ मैदान में उतर आई है।

मध्य प्रदेश में कांग्रेस के आक्रामक प्रदर्शनों के बावजूद जनता में असर नहीं
Image credit: News Darpan Team

मध्यप्रदेश की सियासत में इन दिनों मौसम से ज्यादा राजनीतिक उमस महसूस की जा रही है। विपक्षी कांग्रेस अचानक आक्रामक तेवरों के साथ मैदान में उतर आई है। कभी भ्रष्टाचार को लेकर सरकार पर हमला हो रहा है, कभी विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं और कभी बड़े राजनीतिक मुद्दों पर सरकार की घेराबंदी की जा रही है। कांग्रेस के नेता लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि पार्टी अब सो नहीं रही, बल्कि सत्ता से मुकाबले के लिए तैयार है। इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि कांग्रेस के इन आक्रामक प्रदर्शनों का असर जनता के बीच दिखाई क्यों नहीं दे रहा।

दिग्विजय सिंह से लेकर जीतू पटवारी तक, कांग्रेस के नेता सरकार को घेरने में जुटे हैं। मुद्दे उठते हैं, बयान आते हैं, प्रदर्शन होते हैं और राजनीतिक शोर सुनाई देता है। लेकिन कुछ समय बाद वही मुद्दे चर्चा से बाहर हो जाते हैं और सियासत में फिर खामोशी छा जाती है। कांग्रेस की परेशानी यही है कि उसके आंदोलनों में हलचल तो नजर आती है, मगर उनका असर जनता के बीच दूर तक जाता हुआ नहीं दिख रहा।

इस राजनीतिक हलचल के केंद्र में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी हैं। दोनों अपने-अपने अंदाज में सरकार को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह व्यक्तिगत राजनीतिक सक्रियता के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं, जबकि जीतू पटवारी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सरकार के खिलाफ लगातार हमलावर तेवर दिखा रहे हैं। फिर भी इन दोनों प्रयासों के बीच वह तालमेल नजर नहीं आ रहा, जो कांग्रेस के आंदोलनों को व्यापक असर दे सके।

कांग्रेस में राजा साहब के नाम से पहचाने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह इन दिनों खासे सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह लगातार प्रदर्शनों में शामिल हो रहे हैं। उनका मकसद कार्यकर्ताओं में जोश भरना और पार्टी के भीतर यह संदेश देना है कि उनकी राजनीतिक पारी अभी खत्म नहीं हुई है। सीमित कार्यकर्ताओं के साथ मैदान में उतरकर दिग्विजय सिंह अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।

उनकी सक्रियता कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक संदेश भी है। वह यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि सरकार के खिलाफ लड़ाई में वह अब भी पीछे नहीं हटे हैं। हालांकि, उनकी सक्रियता के साथ संगठन की भूमिका को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। किसी नेता की व्यक्तिगत पहल और पार्टी के साझा अभियान में फर्क होता है। कांग्रेस की मौजूदा स्थिति में यही अंतर साफ दिखाई दे रहा है।

दिग्विजय सिंह की प्रस्तावित अयोध्या पदयात्रा भी राजनीतिक चर्चा का विषय बनी हुई है। चंदा चोरी से जुड़े आरोपों को मुद्दा बनाकर इस पदयात्रा के जरिए सियासी संदेश देने की कोशिश की जा रही है। इस यात्रा का मकसद मुद्दे को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाना और सरकार पर दबाव बनाना बताया जा रहा है। लेकिन कांग्रेस संगठन की इससे दूरी इसे पार्टी के साझा अभियान के बजाय दिग्विजय सिंह की व्यक्तिगत पहल के रूप में देखने की गुंजाइश पैदा करती है।

सवाल यही है कि जब पार्टी पूरी ताकत के साथ इस यात्रा के पीछे खड़ी दिखाई नहीं दे रही, तो इसका राजनीतिक संदेश कितना व्यापक हो पाएगा। किसी पदयात्रा का असर केवल उसके शुरू होने से तय नहीं होता। उसके पीछे संगठन की भागीदारी, कार्यकर्ताओं की मौजूदगी और जनता से जुड़ाव भी जरूरी होता है। अयोध्या की प्रस्तावित पदयात्रा के मामले में अभी सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि इसमें कांग्रेस संगठन की भूमिका कितनी होगी।

दिग्विजय सिंह की राजनीति में पदयात्राओं का अपना इतिहास रहा है। वर्ष 2018 में उनकी नर्मदा परिक्रमा के बाद मध्यप्रदेश में कांग्रेस सत्ता में लौटी थी। इसी वजह से उनकी प्रस्तावित अयोध्या पदयात्रा को भी राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है। सवाल यह है कि क्या यह यात्रा कोई नया राजनीतिक समीकरण बनाएगी या फिर यह भी चर्चा तक सीमित रह जाएगी। इसका जवाब भविष्य के गर्भ में है।

इतना जरूर है कि राजा साहब अपनी राजनीतिक सक्रियता से यह बताने में जुटे हैं कि अभी उनकी भूमिका समाप्त नहीं हुई है। वह प्रदर्शनों में शामिल हो रहे हैं, कार्यकर्ताओं के बीच जा रहे हैं और सरकार के खिलाफ उठाए जा रहे मुद्दों को राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इस सक्रियता का असर तभी व्यापक हो सकता है, जब इसे कांग्रेस के संगठन और उसके साझा अभियान से जोड़ा जाए।

दूसरी ओर, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी भी सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का संदेश देने में जुटे हैं। भ्रष्टाचार से लेकर सरकारी कामकाज तक, वह अलग-अलग मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। उनका मकसद कांग्रेस को एक सक्रिय विपक्ष के रूप में स्थापित करना है। वह लगातार बयान दे रहे हैं, सवाल उठा रहे हैं और सरकार से जवाब मांगने की कोशिश कर रहे हैं।

लेकिन जीतू पटवारी के सामने सबसे बड़ी परेशानी आंदोलन की निरंतरता को लेकर खड़ी होती है। वह किसी मुद्दे को जोर-शोर से उठाते हैं। बयान आते हैं, विरोध प्रदर्शन होते हैं और सरकार पर सवालों की बौछार की जाती है। शुरुआत में इस पूरे अभियान से राजनीतिक हलचल पैदा होती है। कांग्रेस अपने मुद्दे को प्रमुखता से सामने रखती है और सरकार को घेरने की कोशिश करती है।

इसके बाद कुछ समय गुजरते ही वही मुद्दा राजनीतिक चर्चा से गायब हो जाता है। न आंदोलन की धार लगातार बनी रहती है और न ही उसके परिणाम को लेकर कोई बड़ा अभियान दिखाई देता है। कांग्रेस फिर किसी नए मुद्दे के साथ मैदान में उतर आती है। इस तरह एक मुद्दे से दूसरे मुद्दे तक पहुंचने का सिलसिला चलता रहता है, लेकिन किसी एक सवाल पर लंबे समय तक टिके रहने की रणनीति नजर नहीं आती।

यह सिलसिला पहली बारिश के बाद उभरने वाले पानी के बुलबुलों जैसा नजर आता है। शुरुआत में हलचल खूब होती है, लेकिन थोड़ी देर बाद सब कुछ शांत हो जाता है। इस उदाहरण के जरिए कांग्रेस के आंदोलनों की उस कमजोरी को समझा जा सकता है, जिसमें शुरुआती शोर तो सुनाई देता है, लेकिन लगातार संघर्ष और परिणाम तक पहुंचने की कोशिश दिखाई नहीं देती।

विपक्ष की राजनीति में केवल मुद्दा उठाना ही काफी नहीं होता। किसी मुद्दे को जनता के बीच लगातार जीवित रखना, उससे जुड़े सवालों पर सरकार से जवाब मांगते रहना और आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश करना भी जरूरी होता है। कांग्रेस की मौजूदा चुनौती यही है कि वह अपने उठाए हुए मुद्दों को लंबे समय तक राजनीतिक और जनचर्चा का हिस्सा नहीं बना पा रही।

मध्यप्रदेश की राजनीति में कांग्रेस की मौजूदा स्थिति पर तंज कसते हुए यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब आंदोलनों के पीछे मजबूत संगठन और व्यापक जनसमर्थन नजर नहीं आता, तो उनका असर आखिर कितना होगा। दिग्विजय सिंह की व्यक्तिगत राजनीतिक सक्रियता और जीतू पटवारी की प्रदेशव्यापी संगठनात्मक जिम्मेदारी के बीच तालमेल यहां महत्वपूर्ण हो जाता है।

दिग्विजय सिंह अपनी राजनीतिक पहचान और सक्रियता के जरिए कांग्रेस के आंदोलन को दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, जीतू पटवारी के सामने प्रदेश संगठन को लगातार सक्रिय रखने की जिम्मेदारी है। अगर इन दोनों स्तरों पर एक जैसी राजनीतिक दिशा और साझा अभियान दिखाई नहीं देगा, तो कांग्रेस के अलग-अलग प्रयास बिखरे हुए नजर आ सकते हैं।

इसी संदर्भ में कांग्रेस की मौजूदा स्थिति पर यह तंज भी सुनाई देता है, बिना रियासत के राजा और बिना हल्के के पटवारी। इस तंज के जरिए दिग्विजय सिंह और जीतू पटवारी की राजनीतिक भूमिका पर सवाल उठाया जा रहा है। दिग्विजय सिंह के पास पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में बड़ा राजनीतिक अनुभव और पहचान है, जबकि पटवारी के पास प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में संगठनात्मक जिम्मेदारी है। लेकिन सवाल यह है कि इन भूमिकाओं का असर जमीन पर कितना दिखाई दे रहा है।

कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में जीतू पटवारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सरकार पर आरोप लगाने की नहीं है। उन्हें इन आरोपों को जनता के रोजमर्रा के सवालों से जोड़ना होगा। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और सरकारी सेवाओं से जुड़ी परेशानियां जनता के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे हो सकते हैं। लेकिन इन मुद्दों पर लगातार जनसंवाद और जमीनी अभियान के बिना राजनीतिक लाभ हासिल करना आसान नहीं है।

जनता से जुड़ाव केवल प्रदर्शन के दौरान दिखाई देने वाली भीड़ से तय नहीं होता। किसी मुद्दे को लेकर लोगों की परेशानियों को समझना, उनके सवालों को लगातार उठाना और आंदोलन की प्रगति से उन्हें जोड़ना भी जरूरी होता है। कांग्रेस यदि इन मुद्दों को अपने राजनीतिक अभियान का आधार बनाना चाहती है, तो उसे केवल बयान और विरोध प्रदर्शन से आगे बढ़कर लगातार काम करना होगा।

पिछले दो वर्षों में कांग्रेस ने सरकार को घेरने के लिए कई मुद्दे उठाए हैं। भ्रष्टाचार, सरकारी कामकाज और दूसरे बड़े राजनीतिक सवालों पर पार्टी ने सरकार को चुनौती दी है। इसके बावजूद पार्टी को वह जनसमर्थन मिलता नहीं दिख रहा, जिसकी उम्मीद किसी सक्रिय विपक्ष से की जाती है। सरकार के खिलाफ नाराजगी होने और उस नाराजगी को अपने पक्ष में बदल पाने के बीच बड़ा अंतर होता है।

कांग्रेस इसी अंतर को पाटने में नाकाम दिखाई दे रही है। पार्टी सरकार के खिलाफ सवाल तो उठा रही है, लेकिन जनता के बीच उस सवाल को स्थायी समर्थन में बदलने की कोशिश प्रभावी नहीं दिख रही। मुद्दे दर्जन भर हैं, मगर जनता के बीच असर कहां है, यही सवाल कांग्रेस के सामने खड़ा है।

हालांकि, जनता की खामोशी को सरकार के प्रति पूरी संतुष्टि मान लेना भी सही नहीं होगा। इसी तरह, किसी प्रदर्शन में भीड़ या राजनीतिक प्रतिक्रिया कम होने भर से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मुद्दा अप्रासंगिक है। असली कसौटी यह है कि कांग्रेस अपने सवालों को कितनी मजबूती से उठाती है, उनका फॉलोअप कितना करती है और जनता को अपने साथ जोड़ने में कितनी सफल होती है।

किसी आंदोलन की ताकत केवल उसके शुरुआती शोर से नहीं मापी जा सकती। वह कितने समय तक जारी रहता है, उससे जुड़े सवालों पर कितनी बार सरकार से जवाब मांगा जाता है और उसके परिणाम को लेकर पार्टी कितनी गंभीर रहती है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कांग्रेस के आंदोलनों में इस निरंतरता की कमी ही उनके असर को सीमित करती हुई दिखाई दे रही है।

कांग्रेस नेता सरकार के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी यानी सत्ता विरोधी माहौल की बात करते रहे हैं। उनका दावा है कि सरकार के खिलाफ असंतोष मौजूद है। लेकिन राजनीतिक असंतोष अपने आप विपक्ष के समर्थन में नहीं बदलता। इसके लिए जनता को एक भरोसेमंद विकल्प देना पड़ता है।

कांग्रेस की मौजूदा चुनौती यही है कि वह सरकार की कमियां गिनाने के साथ-साथ अपनी वैकल्पिक नीति, नेतृत्व और कार्ययोजना को भी जनता के सामने स्पष्ट करे। केवल यह कहना कि सरकार गलत कर रही है, विपक्ष को मजबूत नहीं बनाता। जनता को यह भी समझना होता है कि कांग्रेस सत्ता में आने पर किन सवालों पर क्या करेगी और उसके पास कौन-सा स्पष्ट रास्ता है।

इसी वजह से आंदोलन केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस, बयान और प्रतीकात्मक प्रदर्शनों तक सीमित नहीं रह सकते। किसी मुद्दे पर लड़ाई शुरू करने के बाद उसका परिणाम सामने आने तक डटे रहना जरूरी है। संबंधित विभागों से जवाब मांगना, जनता के सवालों को लगातार उठाना और आंदोलन की प्रगति से लोगों को जोड़ना ही विपक्ष की विश्वसनीयता बढ़ा सकता है।

मोहन सरकार के लिए कांग्रेस की मौजूदा कमजोरी राहत की स्थिति जरूर बनाती है। लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि मोहन सरकार के सामने कोई चुनौती नहीं है या प्रदेश में सब कुछ आदर्श स्थिति में चल रहा है। सरकार की नीतियों और फैसलों पर सवाल उठाने की गुंजाइश बनी हुई है। फिर भी विपक्ष की कमजोरी अक्सर सत्ता की ताकत बन जाती है।

कांग्रेस यदि सरकार की नीतियों और फैसलों पर सवाल उठाने के बावजूद जनता के बीच अपना भरोसा कायम नहीं कर पा रही, तो उसे अपनी रणनीति पर विचार करना होगा। उसे यह देखना होगा कि उसके मुद्दे जनता तक किस तरह पहुंच रहे हैं, आंदोलन कितने समय तक चल रहे हैं और संगठन इन अभियानों में कितनी मजबूती से साथ खड़ा है।

दिग्विजय सिंह की सक्रियता और जीतू पटवारी के आक्रामक तेवर कांग्रेस के लिए राजनीतिक अवसर बन सकते हैं। लेकिन इसके लिए इन प्रयासों को संगठन की एकजुटता, निरंतर संघर्ष और जनसरोकारों से जोड़ना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो सियासत में मुद्दे आते-जाते रहेंगे, बयान सुर्खियां बटोरते रहेंगे और प्रदर्शन होते रहेंगे, लेकिन सत्ता के सामने विपक्ष की चुनौती कमजोर ही बनी रहेगी।

फिलहाल मध्यप्रदेश की सियासत में सवाल सरकार से ज्यादा विपक्ष की रणनीति पर भी है। कांग्रेस को तय करना होगा कि उसे केवल विरोध दर्ज कराने वाला विपक्ष बनकर रहना है या जनता के बीच भरोसेमंद विकल्प के रूप में उभरना है। दिग्विजय सिंह की पदयात्रा और जीतू पटवारी के हमलों के बीच संगठन की भूमिका इसी सवाल का जवाब तय करेगी।

राजनीति में तस्वीर खत्म होने का दावा करना आसान है, लेकिन तस्वीर बदलने के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ता है। कांग्रेस के सामने यही चुनौती है। उसे अपने उठाए मुद्दों को शोर से आगे ले जाना होगा, आंदोलनों को बीच में छोड़ने के बजाय उनके नतीजे तक पहुंचाना होगा और जनता को यह भरोसा दिलाना होगा कि वह केवल सरकार पर हमला करने वाली पार्टी नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद विकल्प भी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मध्य प्रदेश में कांग्रेस इन दिनों क्या कर रही है?

कांग्रेस भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार को घेर रही है, विरोध प्रदर्शन कर रही है और बड़े राजनीतिक मुद्दों पर सरकार की आलोचना कर रही है।

कांग्रेस के प्रदर्शनों का जनता पर असर क्यों नहीं दिख रहा?

कांग्रेस के आंदोलनों में हलचल तो दिखती है, लेकिन मुद्दे कुछ समय बाद चर्चा से बाहर हो जाते हैं और उनका असर जनता के बीच दूर तक नहीं पहुंचता।

कांग्रेस में सरकार के खिलाफ कौन से नेता सक्रिय हैं?

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी सरकार के खिलाफ लगातार सक्रिय हैं।

दिग्विजय सिंह की अयोध्या पदयात्रा किस मुद्दे पर है?

दिग्विजय सिंह चंदा चोरी से जुड़े आरोपों को मुद्दा बनाकर अयोध्या पदयात्रा के जरिए सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

अयोध्या पदयात्रा को लेकर कांग्रेस में क्या सवाल उठ रहा है?

सवाल उठ रहा है कि कांग्रेस संगठन इस यात्रा के पीछे कितनी मजबूती से खड़ा होगा, क्योंकि संगठन की भागीदारी के बिना इसका संदेश सीमित रह सकता है।

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