आगरा घराने के उस्ताद इंदुधर निरोडी का 91 साल की उम्र में निधन
आगरा घराने के गायक, संगीतशास्त्री और गुरु पं. इंदुधर निरोडी का 91 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने छह दशक संगीत साधना की।
आगरा घराने के उस्ताद पं. इंदुधर निरोडी को श्रद्धांजलि
गायक, संगीतशास्त्री और मार्गदर्शक पं. इंदुधर निरोडी छह दशकों तक अपने गुरुओं से जुड़े रहे। 22 सितंबर को 91 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।
वह अपने पीछे पारंपरिक ज्ञान, रागों और बंदिशों का एक अनमोल खजाना छोड़ गए हैं। इसके साथ ही उन्होंने भातखंडे परंपरा से जुड़ी शिक्षा, लेखन और अभिलेख तैयार करने का भी बड़ा काम किया।
भातखंडे और रतनजंकर से बनी संगीत परंपरा
निरोडी की संगीत की सोच पं. विष्णु नारायण भातखंडे की सोच में गहराई से जड़ी हुई थी। भातखंडे ने रागसंगीत को एक पूरी और व्यवस्थित शास्त्रीय व्यवस्था देने का बड़ा काम किया था। साथ ही उन्होंने घरानों से चली आ रही बहुत बड़ी संख्या में बंदिशों को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाकर रखा।
निरोडी की तालीम उन्हें आचार्य एस.एन. रतनजंकर, जिन्हें अन्नासाहेब के नाम से जाना जाता था, की परंपरा से सीधे जोड़ती थी। यह जुड़ाव रतनजंकर के चार प्रमुख शिष्यों के जरिए बना। ये चार शिष्य थे एस.सी.आर. भाट, के.जी. गिंडे, पं. चिदानंद नागरकर और पं. दिनकर कैकिनी।
रतनजंकर ने खुद ग्वालियर के बड़े उस्ताद पं. अंतूबुआ जोशी, पं. विष्णु नारायण भातखंडे और आफताब-ए-मौसिकी उस्ताद फैयाज खान से तालीम ली थी।
गुरुओं की इसी लगातार चलती आ रही कड़ी के जरिए निरोडी अन्नासाहेब की विरासत के सीधे उत्तराधिकारी बने।
इन बड़े उस्तादों से मिली उनकी तालीम धीरे-धीरे आगरा और ग्वालियर गायकी का ऐसा सहज मेल बनी, जिसमें के.जी. गिंडे उनके सबसे बड़े आदर्श रहे।
निरोडी अक्सर याद करते थे कि गिंडेजी और भाटजी ने ग्वालियर के उस्ताद पं. राजाभैया पूंछवाले से भी तालीम ली थी।
यह परंपरा केवल विरासत में मिली चीज नहीं थी। इसे लगातार रियाज, ध्यान से सुनने और मंच पर होने वाली गायकी में पूरी तरह डूब जाने से भी आगे बढ़ाया गया।
छह दशकों तक निरोडी अपने गुरुओं से जुड़े रहे और पूरे भारत में उनके साथ यात्रा करते रहे। इस दौरान उन्हें गायकी और राग के विकास की बारीकियों को करीब से सीखने का मौका मिला।
उनकी तालीम से जुड़ी एक घटना बताती है कि उनसे कितनी सटीकता की उम्मीद की जाती थी।
जब उनके गुरु अन्नासाहेब ने उनकी परीक्षा ली, तो उन्होंने पूछा कि क्या निरोडी राग हमीर को उसकी पहचान वाली पकड़, “गा मा धा”, के बिना गा सकते हैं।
निरोडी ने इसे बिना किसी गलती के गाकर सुनाया। इससे अन्नासाहेब बहुत खुश हुए।
खयाल, ध्रुपद-धमार और ठुमरी
खयाल निरोडी का मुख्य क्षेत्र था, लेकिन ध्रुपद-धमार और ठुमरी में भी उन्हें उतनी ही सहजता थी। वह इन दोनों शैलियों में गाते भी थे और सिखाते भी थे।
उनका तरीका गहराई से परंपरा पर टिका हुआ था और वह आधुनिक चलनों की अक्सर आलोचना करते थे।
उनके लिए चमक-दमक से ज्यादा जरूरी व्याकरण यानी शास्त्र था।
उनका मानना था कि असली महारत धैर्य के साथ ली गई तालीम, समर्पण, शुद्धता और लगातार मेहनत से आती है।
अनुशासन पर यही जोर उनकी गायकी और उनकी शिक्षा, दोनों में दिखाई देता था।
अपनी कक्षाओं में वह राग की बढ़त के लिए जरूरी हर बारीकी पर ध्यान देते थे। इनमें स्वर शुद्धता, राग शुद्धता, स्वरोच्चार, आकार, कण स्वर, मींड, गमक, बोल-उपज, तान और सांस पर नियंत्रण शामिल थे।
वह ध्रुपद और खयाल, दोनों शैलियों में नोम-तोम आलाप सिखाते थे। साथ ही वह इसकी बारीक बनावट, सुंदरता और ताकत को भी समझाते थे।
कई वर्षों के दौरान उन्होंने सौ से ज्यादा रागों और कई सैकड़ों बंदिशों की बारीकियां सिखाईं।
वह दिखाते थे कि हर बंदिश राग को आगे बढ़ाने और उसके विकास का एक अलग सौंदर्यपूर्ण रास्ता दे सकती है।
इसलिए उनकी शिक्षा केवल बंदिशों को दोहराने तक सीमित नहीं थी। इसमें हर बंदिश के भीतर छिपी संभावनाओं को समझना भी शामिल था।
सरकारी नौकरी से पूरी तरह संगीत सिखाने तक
कंसर्ट के मंच से बाहर निरोडी एक सरकारी बीमा संस्था में वरिष्ठ अधिकारी के तौर पर काम करते थे।
रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अपना ज्यादा समय संगीत सिखाने को दे दिया।
उन्होंने मैसूरु की डॉ. गंगूबाई हंगल संगीत यूनिवर्सिटी और धारवाड़ की कर्नाटक यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर काम किया।
उनके शिष्यों में अदिति कैकिनी-उपाध्याय, वीरभद्रय्या, शारदा भाट, भास्कर और इस श्रद्धांजलि के लेखक शामिल थे।
उनकी शिक्षा निजी मुलाकातों, साथ रहकर सीखने और लगातार चलने वाले संगीत संवादों के जरिए भी जारी रही।
इस श्रद्धांजलि के लेखक का निरोडी के शिष्य के रूप में सफर नवंबर 2002 में शुरू हुआ। इससे पहले लेखक ने 2001 में बेंगलुरु में आईटी का पेशा छोड़ दिया था, ताकि वह अपना पूरा समय संगीत को दे सकें।
लेखक ने शिष्य बनने से पहले निरोडी के साथ हारमोनियम पर संगत भी की थी। बाद में कंसर्ट के दौरान उन्होंने निरोडी को गायन में सहारा भी दिया।
निरोडी ने इस शिष्य को दो शर्तों पर स्वीकार किया। पहली शर्त थी कि कोई फीस नहीं ली जाएगी, क्योंकि उनका मानना था कि ज्ञान को बिना रोक-टोक आगे पहुंचाया जाना चाहिए, जैसे उनके गुरुओं ने किया था। दूसरी शर्त थी कि शिष्य हर पखवाड़े बेंगलुरु से मैसूरु आए और 2 दिन उनके साथ रहकर तालीम ले।
ये मुलाकातें महामारी आने तक चलती रहीं। इसके बाद सीखने-सिखाने का सिलसिला ऑनलाइन हो गया।
निरोडी के जीवन के आखिरी महीनों में उनकी सेहत ऐसी हो गई थी कि वह आवाज पर ज्यादा जोर नहीं दे सकते थे। फिर भी संगीत से जुड़े संवाद चुपचाप टेक्स्ट मैसेज के जरिए जारी रहे।
इस सीखने के रिश्ते के विवरण में बताया गया है कि नवंबर 2022 में तालीम राग भीमपलास से शुरू हुई और 11 महीने तक चलती रही। इसकी वजह यह थी कि निरोडी चाहते थे कि शिष्य राग की हर बारीक से बारीक बात को पूरी तरह समझे।
उस पहली कक्षा को विनम्र बना देने वाला अनुभव बताया गया है। इसे शास्त्रीय गायन की गहराई से पहली मुलाकात के रूप में भी याद किया गया है।
अभिलेख तैयार करने में बड़ा योगदान
निरोडी का योगदान केवल मंच पर गाने और सीधे शिष्यों को सिखाने तक सीमित नहीं था।
उन्होंने समय चक्र और थाट की रूपरेखाओं सहित कई विषयों पर लेख लिखे।
उन्होंने आगरा घराने पर तैयार 13 कड़ियों वाले एक कार्यक्रम का भी संचालन किया। यह कार्यक्रम आकाशवाणी बेंगलुरु से प्रसारित हुआ था।
उनके लेक्चर-डेमोंस्ट्रेशन में खास तौर पर 10 थाटों और उनसे जुड़े रागों पर ध्यान दिया जाता था।
उनके जीवन के बड़े लक्ष्यों में से एक भातखंडेजी की छह खंडों वाली क्रमिक पुस्तक मालिका में शामिल सभी 1,896 बंदिशों के लिए एक ऑडियो संदर्भ तैयार करना था।
निरोडी ने इस पूरे काम को “समर्पण” के नाम से रिकॉर्ड किया और इसे अपनी गुरु-दक्षिणा के रूप में पेश किया।
बाद में यह रिकॉर्डिंग ऑनलाइन बिना किसी शुल्क के उपलब्ध कराई गई, ताकि यह छात्रों के लिए एक अभिलेखीय संसाधन बन सके।
“समर्पण” को पं. राजीव तारानाथ, पं. शरद साठे और पं. अजय चक्रवर्ती से काफी प्रशंसा मिली।
इस प्रोजेक्ट के जरिए छात्रों को बड़ी संख्या में बंदिशों तक पहुंच मिली। साथ ही इससे यह भी पता चलता है कि निरोडी को विरासत में मिली परंपरा को बचाने और उसे आगे साझा करने की कितनी गहरी चिंता थी।
संगीत को दिए पूरे जीवन के लिए सम्मान
निरोडी ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन के टॉप-ग्रेड कलाकार थे। उनकी कला की लंबी यात्रा को कई सम्मानों से भी पहचाना गया।
इन सम्मानों में 2014 का केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार शामिल था। यह पुरस्कार पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दिया था।
उन्हें 2014 में राज्य संगीत विद्वान पुरस्कार भी मिला।
डॉ. गंगूबाई हंगल संगीत यूनिवर्सिटी ने 2015 में उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि दी।
उनके दूसरे सम्मानों में 2006 की गौरव प्रशस्ति और 1955 में ऑल इंडिया म्यूजिक प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार शामिल था।
उन्हें यह प्रतियोगिता पुरस्कार पूर्व राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से मिला था।
इन सभी सम्मानों के पीछे ऐसा करियर था, जिसमें मंच पर प्रदर्शन, संगीत का अध्ययन, शिक्षा देना और संगीत से जुड़े अभिलेखों को संभालकर रखना, सब एक साथ शामिल थे।
“मैं कितना भाग्यशाली हूं”
निरोडी की शिक्षा में विनम्रता और सम्मान को संगीत सीखने से अलग नहीं माना जाता था।
तालीम के दौरान वह डग्गे पर ठेका रखते थे, जबकि शिष्य तानपुरा बजाता था।
तालीम के समय वह आधुनिक डिजिटल गैजेट इस्तेमाल करने से बचते थे।
मैसूरु में रुकने के दौरान संगीत पर बातचीत अक्सर देर रात तक चलती रहती थी।
वह कभी भी साथी संगीतकारों के बारे में बुरा बोलकर उन्हें छोटा नहीं करते थे। इसके बजाय वह उनकी खूबियों पर ध्यान दिलाते थे और समझाते थे कि हर संगीतकार से क्या सीखा जा सकता है।
जब उनके गुरुओं का जिक्र आता, तो वह कहते थे, “आप कल्पना नहीं कर सकते कि ऐसे दिग्गजों से सीखना मेरे लिए कितने सौभाग्य की बात है। आप समझ नहीं पाएंगे।”
ये शब्द, उनकी तालीम, उनका संगीत और उनकी सोच, इस श्रद्धांजलि को दर्ज करने वाले शिष्य के साथ आज भी मौजूद हैं।
अपने कार्यक्रमों, कक्षाओं, बंदिशों, लेखन और “समर्पण” अभिलेख के जरिए निरोडी ने आगरा और ग्वालियर की परंपराओं को एक साथ जोड़ा। साथ ही वह भातखंडे परंपरा के अनुशासन से लगातार जुड़े रहे।
उनकी संगीत विरासत अब उस ज्ञान में जिंदा है, जिसे उन्होंने आगे पहुंचाया; उन शिष्यों में जिंदा है, जिन्हें उन्होंने मार्गदर्शन दिया; और उन संसाधनों में जिंदा है, जिन्हें उन्होंने छात्रों के लिए तैयार किया।
स्रोत: The Hindu
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पं. इंदुधर निरोडी का निधन कब और कितनी उम्र में हुआ?
पं. इंदुधर निरोडी का 22 सितंबर को 91 साल की उम्र में निधन हुआ।
पं. इंदुधर निरोडी किन क्षेत्रों से जुड़े थे?
वह गायक, संगीतशास्त्री और मार्गदर्शक थे।
पं. इंदुधर निरोडी की मुख्य गायकी कौन-सी थी?
खयाल उनकी मुख्य गायकी थी, लेकिन वह ध्रुपद-धमार और ठुमरी भी गाते और सिखाते थे।
पं. इंदुधर निरोडी ने संगीत के क्षेत्र में क्या योगदान दिया?
उन्होंने पारंपरिक ज्ञान, रागों और बंदिशों को आगे बढ़ाया और भातखंडे परंपरा से जुड़ी शिक्षा, लेखन व अभिलेख तैयार किए।
पं. इंदुधर निरोडी कितने समय तक अपने गुरुओं से जुड़े रहे?
वह छह दशकों तक अपने गुरुओं से जुड़े रहे और उनके साथ पूरे भारत में यात्रा करते रहे।
सबसे ज़्यादा पढ़ी गई
- 1
श्रावस्ती में सपा बैठक में हंगामा, नेता का माइक छीनने का आरोप
- 2
शामली में 50 से ज्यादा दुकानों के नाम कथित फर्जी बिल, लाखों भुगतान
- 3
शामली महिला का रिश्तेदारों पर 15 लाख के जेवर ले जाने का आरोप
- 4
गन्ने की फसल नुकसान और मारपीट के आरोप, डीएम से जांच की मांग
- 5
हाथरस में आयुष्मान संविदा कर्मियों ने सौंपा ज्ञापन, 22 अक्टूबर से कार्य बहिष्कार की …
टिप्पणियाँ
अभी कोई टिप्पणी नहीं। पहली टिप्पणी करें।