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आदित्य-L1 ने सूरज के गर्म वातावरण का राज खोला

सूरज का सबसे बड़ा राज: सतह से सैकड़ों गुना गर्म क्यों है सूरज का वातावरण? आदित्य-L1 ने दी नई जानकारी सूरज एक ऐसा नियम तोड़ता है जो कहता है कि तापमान किसी गर्मी के स्रोत से दूर जाने पर कम होना चाहिए।

Why the Sun’s atmosphere is hundreds of times hotter than its surface: Aditya-L1 helps solve the Sun's biggest mystery

सूरज का सबसे बड़ा राज: सतह से सैकड़ों गुना गर्म क्यों है सूरज का वातावरण? आदित्य-L1 ने दी नई जानकारी

सूरज एक ऐसा नियम तोड़ता है जो कहता है कि तापमान किसी गर्मी के स्रोत से दूर जाने पर कम होना चाहिए। लेकिन सूरज का बाहरी वातावरण, जिसे कोरोना कहते हैं, उसकी सतह यानी फोटोस्फीयर से सैकड़ों गुना ज्यादा गर्म है। जहां फोटोस्फीयर का तापमान करीब 5,500°C है, वहीं कोरोना का तापमान 10,00,000°C से भी ज्यादा होता है। ये अनोखी बात दशकों से वैज्ञानिकों को हैरान कर रही है और इसे खगोल विज्ञान के सबसे बड़े सवालों में से एक माना जाता है।

भारत का आदित्य-L1 मिशन, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने लॉन्च किया है, अब इस रहस्य को सुलझाने में अहम भूमिका निभा रहा है। ये स्पेसक्राफ्ट सूरज और पृथ्वी के बीच L1 पॉइंट पर तैनात है, जो धरती से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर है। यहां से ये सूरज का लगातार अवलोकन कर सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य सूरज के वातावरण का अध्ययन करना है, खासकर फोटोस्फीयर और कोरोना के बीच की परतों को समझना, ताकि पता लगाया जा सके कि इन क्षेत्रों में ऊर्जा कैसे चलती है।

कोरोना की इतनी ज्यादा गर्मी का कारण सूरज के मैग्नेटिक फील्ड्स को माना जाता है। सूरज एक विशाल प्लाज्मा का गोला है, जिसके अंदर शक्तिशाली मैग्नेटिक संरचनाएं होती हैं। ये मैग्नेटिक फील्ड्स मुड़ते हैं, फिर से जुड़ते हैं और भारी मात्रा में ऊर्जा छोड़ते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस ऊर्जा का कुछ हिस्सा कोरोना तक पहुंचता है, जिससे उसका तापमान बढ़ जाता है, जबकि सूरज की सतह से दूरी बढ़ने पर तापमान कम होना चाहिए।

इस घटना को समझने के लिए दो मुख्य थ्योरी पर रिसर्च हो रही है। पहली है मैग्नेटिक रिकनेक्शन, जिसमें उलझी हुई मैग्नेटिक फील्ड लाइन्स टूटती हैं और दोबारा जुड़ती हैं, जिससे ऊर्जा रिलीज होती है। दूसरी थ्योरी अल्फ़वेन वेव्स की है, जो मैग्नेटिक वाइब्रेशन हैं और सूरज के वातावरण में ऊपर की ओर ऊर्जा ले जाती हैं। इन दोनों प्रक्रियाओं में से कौन ज्यादा अहम है, ये पता लगाना वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती रहा है।

आदित्य-L1 में एडवांस्ड इंस्ट्रूमेंट्स लगे हैं, जैसे सोलर अल्ट्रावायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप (SUIT), जो सूरज के फोटोस्फीयर और क्रोमोस्फीयर को कई वेवलेंथ्स पर एक साथ देखता है। इसकी मदद से वैज्ञानिक यह ट्रैक कर सकते हैं कि सूरज के वातावरण की अलग-अलग परतों में ऊर्जा और पदार्थ कैसे चलते हैं। SUIT ने हाल ही में सूरज की फ्लेयर्स, अल्ट्रावायलेट प्लाज्मा के विस्फोट और वातावरण में होने वाली गतिशील प्रक्रियाओं को बेहद बारीकी से रिकॉर्ड किया है। इन आंकड़ों से पता चल रहा है कि सूरज के निचले वातावरण से कोरोना तक मैग्नेटिक ऊर्जा कैसे पहुंचती है।

कोरोना की गर्मी को समझने का महत्व सिर्फ वैज्ञानिक जिज्ञासा तक सीमित नहीं है। वही मैग्नेटिक प्रक्रियाएं जो कोरोना को गर्म करती हैं, वे ही सोलर फ्लेयर्स, कोरोनल मास इजेक्शन और सोलर स्टॉर्म्स को भी पैदा करती हैं। ये घटनाएं धरती पर सैटेलाइट्स, नेविगेशन सिस्टम, कम्युनिकेशन नेटवर्क और पावर ग्रिड्स को बाधित कर सकती हैं। आदित्य-L1 का लक्ष्य इन प्रक्रियाओं को समझना है, जिसमें क्रोमोस्फीयर और कोरोना की गर्मी और सूरज के वातावरण में ऊर्जा का ट्रांसफर शामिल है।

फोटोस्फीयर, क्रोमोस्फीयर और कोरोना का एक साथ अध्ययन करके आदित्य-L1 वैज्ञानिकों को सूरज में ऊर्जा के प्रवाह को बेहतर तरीके से समझने में मदद कर रहा है। मिशन के एक साल पूरे होने के बाद, यह ऐसे डेटा दे रहा है जो पहले उपलब्ध नहीं थे। ये रिसर्च वैज्ञानिकों को उस रहस्य के करीब ले जा रही है, जिसने पीढ़ियों से खगोलविदों को चौंकाया है: सूरज का वातावरण उसकी सतह से ज्यादा गर्म क्यों है। इन खोजों से स्पेस वेदर की भविष्यवाणी में भी सुधार हो सकता है, जिससे आधुनिक तकनीक को सोलर डिसरप्शन से बचाया जा सके।

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