सत्तारूढ़ पार्टियों ने पांचों उपचुनाव जीते, जीत के अंतर में दिखा बड़ा फर्क
पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में सत्तारूढ़ दलों ने पांचों उपचुनाव जीते, लेकिन जीत का अंतर और मुकाबले की स्थिति अलग रही।
अलग-अलग तरह की जीत: पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के उपचुनाव नतीजों पर
हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी ने सभी पांच उपचुनाव जीत लिए, लेकिन नतीजों ने राजनीतिक मुकाबले के स्तर में बड़ा फर्क दिखाया। शुक्रवार को घोषित इन नतीजों में जीतने वालों को लेकर ज्यादा हैरानी नहीं हुई, क्योंकि ये अप्रैल में हुए विधानसभा चुनावों के मुश्किल से पांच महीने बाद आए हैं।
फर्क जीत के पैमाने में दिखा। पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने नंदीग्राम सीट बरकरार रखी और रेजीनगर सीट तृणमूल कांग्रेस से छीन ली। उसे दोनों सीटों पर क्रमशः 76% और 63% वोट मिले। पुडुचेरी में सत्तारूढ़ ऑल इंडिया एन.आर. कांग्रेस ने थट्टनचावडी सीट पर 61% वोट हासिल करके जोरदार जीत दर्ज की।
पश्चिम बंगाल में बड़ी जीत क्यों मिली
नंदीग्राम और थट्टनचावडी में जीत का बड़ा अंतर उन हालात से भी समझा जा सकता है, जिनमें ये सीटें खाली हुई थीं। दोनों सीटें अपने-अपने मुख्यमंत्रियों के इस्तीफे के बाद खाली हुई थीं। इस वजह से सत्तारूढ़ पार्टियों को बड़ी जीत हासिल करने में मदद मिली।
पश्चिम बंगाल के नतीजे राज्य में लंबे समय से चले आ रहे एक राजनीतिक पैटर्न के मुताबिक भी हैं। वहां कई दशकों से विधानसभा चुनाव में मिली जीत को ऐसा जनादेश माना जाता रहा है, जिसमें जीतने वाली पार्टी को सब कुछ मिल जाता है। सत्तारूढ़ पार्टी इसी ताकत को पंचायत चुनावों और उपचुनावों में भी आगे बढ़ाती रही है।
यह तरीका लेफ्ट फ्रंट के लंबे शासन के दौरान बना। तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन में यह और मजबूत हुआ और अब तक बीजेपी के कार्यकाल में भी दिखाई देता है। इन चुनावों में विपक्षी पार्टियों का प्रदर्शन विधानसभा और लोकसभा चुनावों की तुलना में काफी खराब रहा है।
तमिलनाडु में मुकाबला अब भी ज्यादा कड़ा
तमिलनाडु में मुकाबला ज्यादा करीबी रहा। धारापुरम और मदुरंतकम की सीटें तब खाली हुईं, जब वहां के एआईएडीएमके विधायकों ने इस्तीफा देकर सत्तारूढ़ टीवीके का दामन थाम लिया। टीवीके ने दोनों विधायकों को फिर से इन्हीं सीटों पर उम्मीदवार बनाया।
दोनों विधायक अपनी सीटें दोबारा जीतने में कामयाब रहे। उन्हें क्रमशः 37% और 40% वोट मिले। उन्होंने अपने डीएमके प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों को करीब 8 प्रतिशत अंकों के अंतर से हराया।
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की राजनीति में यह फर्क, दोनों राज्यों के आकार में समानता के बावजूद, उनकी अलग-अलग राजनीतिक संस्कृति को दिखाता है। पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में जहां जीतने वाली पार्टी को भारी बढ़त मिलने का पैटर्न बना है, वहीं तमिलनाडु में अब तीन तरफा मुकाबला है। इसी वजह से वहां राजनीति में मुकाबला बना हुआ है।
आम तौर पर उपचुनाव सत्ता में रहने वाली पार्टी के पक्ष में जाते हैं, क्योंकि मतदाता ऐसे प्रतिनिधियों को पसंद करते हैं जिनकी सरकार तक पहुंच हो। लेकिन तमिलनाडु में जीत का अंतर कम रहा। इससे पता चलता है कि सत्ता में होने का फायदा वहां पश्चिम बंगाल जैसी पूरी राजनीतिक बढ़त में नहीं बदल पाया।
टीवीके को फायदा, एआईएडीएमके के लिए चिंता
इन जीतों के बाद सदन में टीवीके के सदस्यों की संख्या बढ़कर 109 हो गई है। इस सदन में तय सदस्य संख्या 234 है। हालांकि जीत का अंतर कम रहा। यह उस समय हुआ, जब मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने बिना किसी रोक-टोक के पूरी ताकत से चुनाव प्रचार किया था। इससे संकेत मिलता है कि शुरुआत में मिलने वाला वह फायदा, जिसकी उम्मीद की जा रही थी, पूरी तरह दिखाई नहीं दिया।
अब टीवीके की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन चुकी डीएमके ने दिखाया है कि मई में मिली अचानक हार के बावजूद उसका मजबूत जनाधार अब भी कायम है। एआईएडीएमके की स्थिति ज्यादा मुश्किल है। मई में जिन सीटों पर उसके उम्मीदवार जीते थे, उन्हीं सीटों पर इस बार तीसरे स्थान पर रहना उसके कमजोर पड़ने को लेकर चिंता और बढ़ाता है।
अब एआईएडीएमके के नेतृत्व से यह सवाल और तीखे तरीके से पूछा जाएगा कि क्या वह अपने विधायकों को अपने साथ बनाए रख सकता है। एआईएडीएमके के चार और विधायक टीवीके में शामिल हो चुके हैं। उनकी सीटों पर अब उपचुनाव होंगे।
चुनावी जनादेश के लिए चुनौती
ये घटनाक्रम तमिलनाडु की राजनीति में पीछे जाने वाला बदलाव दिखाते हैं। वहां विधायक अपने कार्यकाल के मुश्किल से कुछ महीने, और कभी-कभी कुछ दिन बाद ही इस्तीफा दे रहे हैं। इसके बाद वे सत्ता में रहने से मिलने वाले फायदों में हिस्सेदारी करते हैं और सत्तारूढ़ पार्टी उन्हें फिर से चुनाव मैदान में उतार देती है। इस प्रथा को दल-बदल विरोधी कानून की भावना को हराने और विधानसभा चुनाव के जनादेश को किनारे करने वाला बताया गया है।
मतदाताओं ने इन तरीकों को इनाम दिया, यह बात प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता को लेकर चिंतित हर व्यक्ति के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए। इसलिए उपचुनाव के नतीजों से सत्तारूढ़ पार्टियां संख्या के लिहाज से मजबूत हुई हैं। लेकिन इन नतीजों ने चुनावी मुकाबले की असमान स्थिति और प्रतिनिधि आधारित राजनीति पर पड़ रहे दबाव को भी सामने ला दिया है।
स्रोत: The Hindu
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पांचों उपचुनाव किसने जीते?
हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी ने सभी पांच उपचुनाव जीत लिए।
पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने कौन-कौन सी सीटें जीतीं?
बीजेपी ने नंदीग्राम सीट बरकरार रखी और रेजीनगर सीट तृणमूल कांग्रेस से छीन ली।
तमिलनाडु में उपचुनाव का मुकाबला कैसा रहा?
तमिलनाडु में मुकाबला करीबी रहा। टीवीके के दोनों उम्मीदवारों ने डीएमके उम्मीदवारों को करीब 8 प्रतिशत अंकों से हराया।
उपचुनाव के बाद टीवीके के सदस्यों की संख्या कितनी हो गई?
जीत के बाद सदन में टीवीके के सदस्यों की संख्या बढ़कर 109 हो गई, जबकि सदन की तय सदस्य संख्या 234 है।
सबसे ज़्यादा पढ़ी गई
- 1
श्रावस्ती में सपा बैठक में हंगामा, नेता का माइक छीनने का आरोप
- 2
शामली में 50 से ज्यादा दुकानों के नाम कथित फर्जी बिल, लाखों भुगतान
- 3
शामली महिला का रिश्तेदारों पर 15 लाख के जेवर ले जाने का आरोप
- 4
गन्ने की फसल नुकसान और मारपीट के आरोप, डीएम से जांच की मांग
- 5
हाथरस में आयुष्मान संविदा कर्मियों ने सौंपा ज्ञापन, 22 अक्टूबर से कार्य बहिष्कार की …
टिप्पणियाँ
अभी कोई टिप्पणी नहीं। पहली टिप्पणी करें।