सविता प्रधान की पोस्ट ने रिश्तों में सम्मान और बराबरी पर चर्चा छेड़ी
मध्य प्रदेश राज्य सेवा की अधिकारी और सिंगरौली नगर निगम आयुक्त सविता प्रधान की सोशल मीडिया पोस्ट रिश्तों में महिलाओं के सम्मान, आत्मसम्मान और बराबरी को लेकर चर्चा में है।
मध्य प्रदेश राज्य सेवा की अधिकारी और सिंगरौली नगर निगम आयुक्त सविता प्रधान की सोशल मीडिया पोस्ट इन दिनों चर्चा में है। उन्होंने इंस्टाग्राम पर दो तस्वीरों के साथ एक कविता साझा की है। इस कविता में उन्होंने राधा, रुक्मिणी, सीता, उर्मिला, द्रौपदी, अहिल्या और यशोधरा जैसी पौराणिक स्त्रियों के उदाहरणों के जरिए रिश्तों में महिला के त्याग, प्रतीक्षा, परीक्षा और आत्मसम्मान का सवाल उठाया है।
भोपाल/सिंगरौली से सामने आई यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। सविता प्रधान ने अपनी कविता में साफ लिखा है कि वह ऐसा रिश्ता नहीं चाहतीं, जिसमें सिर्फ महिला से ही त्याग की उम्मीद की जाए। कविता का भाव यही है कि प्रेम में सम्मान जरूरी है और समझौता ही किसी रिश्ते की शर्त नहीं हो सकता।
सविता प्रधान ने कविता के जरिए कहा है कि वह ऐसा कोई संबंध स्वीकार नहीं करना चाहतीं, जिसमें महिला से प्रेम के नाम पर लगातार त्याग, इंतजार, अपमान या समझौते की अपेक्षा की जाए। उन्होंने रिश्ते में प्रेम के साथ सम्मान और बराबरी को भी उतना ही जरूरी बताया है। पोस्ट सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर यूजर्स की प्रतिक्रियाएं भी आ रही हैं। कई लोग इसे उनके व्यक्तिगत संघर्षों और जीवन अनुभवों से जोड़कर देख रहे हैं।
कविता की शुरुआत राधा के संदर्भ से होती है। सविता प्रधान लिखती हैं कि वह बिना सम्मान के सिर्फ प्रेमिका की भूमिका स्वीकार नहीं करेंगी। इसके बाद वह रुक्मिणी का उदाहरण देती हैं और प्रेम के बिना सिर्फ पत्नी कहलाने की स्थिति पर सवाल उठाती हैं। इस तरह कविता की शुरुआत से ही वह रिश्तों में महिला की जगह, उसकी पहचान और उसके आत्मसम्मान को केंद्र में रखती हैं।
सीता का संदर्भ देते हुए कविता में चरित्र साबित करने के लिए अग्निपरीक्षा देने की बात आती है। इसके बाद उर्मिला के जरिए लंबे विरह और प्रतीक्षा को सामने रखा गया है। इन उदाहरणों के जरिए सविता प्रधान यह सवाल उठाती दिखती हैं कि किसी रिश्ते में महिला से ही हमेशा इंतजार और परीक्षा की उम्मीद क्यों की जाए।
द्रौपदी और अहिल्या के संदर्भ भी कविता में अहम हैं। द्रौपदी के जरिए महिला के अपमान और अन्याय की बात सामने आती है। अहिल्या के संदर्भ में अनजाने अपराध के लिए पाषाण बना दिए जाने और वर्षों तक किसी राम की प्रतीक्षा में पाषाण ही रह जाने की बात कही गई है। इन पंक्तियों में महिला पर थोपे गए अन्याय, चुप्पी और लंबे इंतजार को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
यशोधरा का उदाहरण देते हुए सविता प्रधान लिखती हैं कि वह ऐसा जीवन नहीं चाहतीं, जिसमें साथी बिना बताए चला जाए और पीछे महिला अकेले जिम्मेदारियां संभालती रह जाए। कविता में यह बात आधी रात छोड़कर ज्ञान की खोज में जाने और पीछे रह गई महिला को त्यागी हुई, अबोध शिशु की मां बनकर रह जाने के संदर्भ में कही गई है।
कविता के अंतिम हिस्से में सविता प्रधान ने अपना उदाहरण सती से जोड़ा है। यहां वह कहती हैं कि वह ऐसे रिश्ते की कल्पना करती हैं, जिसमें उन्हें पाने के लिए साथी भी उतना ही समर्पण और प्रयास करे। कविता का निष्कर्ष रिश्ते में महिला के एकतरफा त्याग के बजाय पारस्परिक प्रेम, सम्मान और बराबरी की भावना पर केंद्रित है।
सविता प्रधान की यह पोस्ट इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वह पहले भी अपनी सोशल मीडिया पोस्ट और सामाजिक पहल के कारण सुर्खियों में रही हैं। अगस्त 2026 में उन्होंने कैंसर से जूझ रही एक बच्ची के लिए अपने सिर के बाल मुंडवाकर उन्हें विग बनाने के लिए दान किया था। इस पहल के बाद उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई थीं। उस समय उन्होंने यह संदेश दिया था कि सुंदरता केवल बालों या बाहरी रूप से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से होती है।
सविता प्रधान का जीवन भी संघर्षों से भरा रहा है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उनका जन्म मध्य प्रदेश के एक आदिवासी परिवार में हुआ था। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने अपने गांव में 10वीं कक्षा पास करने वाली पहली लड़कियों में नहीं, बल्कि पहली महिला के रूप में अपनी पहचान बनाई। यह उनकी शुरुआती उपलब्धियों में से एक रही।
रिपोर्टों के अनुसार, कम उम्र में उनका विवाह हुआ। बाद में उन्होंने घरेलू हिंसा और कठिन पारिवारिक परिस्थितियों का सामना किया। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने बच्चों की जिम्मेदारी संभालते हुए ब्यूटी पार्लर और ट्यूशन के जरिए काम किया। इसी दौरान उन्होंने प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी भी जारी रखी।
इसके बाद सविता प्रधान ने मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सफलता हासिल की। उनकी प्रशासनिक यात्रा में डीएसपी से लेकर राज्य प्रशासनिक सेवा और नगर निगम आयुक्त तक की जिम्मेदारियां शामिल रही हैं। इसी वजह से उनके जीवन के संघर्ष और उनकी मौजूदा पोस्ट को कई लोग एक साथ जोड़कर देख रहे हैं।
सविता प्रधान की कविता का केंद्रीय भाव यह है कि किसी भी रिश्ते में महिला से ही लगातार त्याग, प्रतीक्षा और परीक्षा की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। पौराणिक स्त्रियों के उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने आधुनिक रिश्तों में आत्मसम्मान, पारस्परिक प्रेम और बराबरी की जरूरत को सामने रखा है।
उनकी पोस्ट पर आ रही प्रतिक्रियाओं के बीच एक बात साफ दिखाई देती है कि यह कविता सिर्फ किसी एक रिश्ते की कहानी के रूप में नहीं देखी जा रही। यह महिलाओं की भूमिका और रिश्तों में उनसे की जाने वाली अपेक्षाओं को लेकर एक व्यापक सामाजिक बहस का विषय बन गई है। कविता में प्रेम, सम्मान, बराबरी, त्याग और आत्मसम्मान जैसे सवाल एक साथ उठाए गए हैं।
सविता प्रधान ने अपनी पोस्ट में यह कविता साझा की है:
मैं नहीं हूँ राधा जैसी , जो बिन सम्मान प्रेमिका बस बन जाऊँगी ! मैं रुक्मणी जैसी भी नहीं जो बिन प्रेम , बस पत्नी कहलाऊँगी ! मैं सीता जैसी भी नहीं हूँ जो , अपना चरित्र बताने संसार को , अग्नि में चढ़ जाऊँगी ! मैं उर्मिला जैसी भी नहीं की तुम मुझे छोड़ , कर्तव्य निभाने जाओ , तो मैं वर्षों विरह में जल जाऊँगी ! मैं द्रौपदी जैसी भी नहीं की , हरले कोई चीर मेरा तुम्हारे आगे ! और फिर भी चरणों में मस्तक झुकाऊँगी ! मैं अहिल्या जैसी भी नहीं जो मुझे , अनजाने हुए अपराध के लिए पाषाण कर दे ! तो वर्षों किसी राम की प्रतीक्षा में , पाषाण ही रह जाऊँगी ! मैं नहीं यशोधरा जैसी भी की तुम, आधी रात मुझे छोड़ ज्ञान की खोज में जाओ ! तो बस एक त्यागी हुई , अबोध शिशु की माँ ही रह जाऊँगी !
मैं सती जैसी हूँ प्रिय ! मुझे पाने तुमने तांडव किया ! तब ही “शिव” की “शक्ति” कहलाऊँगी । “सविता”
यह कविता सविता प्रधान की वॉल से साझा की गई है। इसमें उन्होंने पौराणिक स्त्रियों के उदाहरणों के जरिए अपनी बात रखी है और अंत में सती, शिव और शक्ति के संदर्भ के साथ रिश्ते में बराबरी और समर्पण का संदेश दिया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सविता प्रधान की पोस्ट में क्या कहा गया है?
सविता प्रधान ने इंस्टाग्राम पर कविता शेयर कर रिश्तों में महिला के त्याग, इंतजार, अपमान और आत्मसम्मान जैसे मुद्दे उठाए हैं। उनका कहना है कि प्रेम में सम्मान और बराबरी भी जरूरी है।
यह पोस्ट क्यों चर्चा में है?
पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है, क्योंकि इसमें पौराणिक स्त्रियों के उदाहरण देकर रिश्तों में महिला से एकतरफा त्याग की उम्मीद पर सवाल उठाया गया है।
कविता में किन पौराणिक स्त्रियों का जिक्र है?
कविता में राधा, रुक्मिणी, सीता, उर्मिला, द्रौपदी, अहिल्या, यशोधरा और सती जैसे उदाहरण दिए गए हैं।
सविता प्रधान रिश्तों को लेकर क्या संदेश दे रही हैं?
उनका संदेश है कि रिश्ता सिर्फ समझौते या महिला के त्याग पर नहीं टिकना चाहिए। उसमें दोनों तरफ से प्रेम, सम्मान, समर्पण और बराबरी होनी चाहिए।
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