बारामुला साइबरक्राइम केस में कश्मीरी पंडित कार्यकर्ता राकेश हांडू को पुलिस नोटिस
कश्मीरी पंडित सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता राकेश हांडू को बारामुला साइबरक्राइम मामले में पुलिस का नोटिस मिला है। हांडू ने बारामुला पुलिस स्टेशन में दर्ज मामले को लेकर सवाल उठाए हैं।
कश्मीरी पंडित सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता राकेश हांडू को बारामुला साइबरक्राइम मामले में पुलिस का नोटिस मिला है। हांडू ने बारामुला पुलिस स्टेशन में दर्ज मामले को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री पैकेज के तहत काम कर रहे कर्मचारी रोहित रैना की शिकायत के बाद सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धाराओं के तहत दर्ज एफआईआर में उनका नाम शामिल किया गया है।
रोहित रैना बारामुला के वित्त विभाग में तैनात प्रधानमंत्री पैकेज कर्मचारी हैं। हांडू ने रैना को लिखे एक खुले पत्र में एफआईआर नंबर 151/2026 का जिक्र किया है। उनके मुताबिक यह एफआईआर 12 सितंबर 2026 को दर्ज की गई और इसमें आईटी एक्ट की धारा 66F और 84C लगाई गई हैं।
हांडू ने पत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएस) की धारा 35(3) के तहत जारी नोटिस का भी जिक्र किया है। इस नोटिस में उन्हें जांच अधिकारी के सामने 26 सितंबर को पेश होने का निर्देश दिया गया था।
हांडू हरियाणा के फरीदाबाद में रहते हैं। उनका कहना है कि दूरी को देखते हुए उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जांच में शामिल होने की इच्छा जताई थी। हालांकि, उनके पत्र से यह साफ नहीं होता कि पुलिस ने बाद में उनका बयान दर्ज किया या मामले में इसके बाद कोई कार्रवाई हुई।
इस मामले से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। पुलिस का पक्ष, मूल शिकायत की सामग्री और जांच की मौजूदा स्थिति भी स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं हो सकी है। इसलिए मामले में लगाए गए आरोपों और दोनों पक्षों के दावों को अभी उसी रूप में देखा जा रहा है, जैसा उन्हें पत्र और उपलब्ध रिपोर्टों में बताया गया है।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के तहत कश्मीर में नियुक्त कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की सुरक्षा, रहने की जगह और उनकी निजी जानकारी के कथित तौर पर प्रसार को लेकर लगातार चिंताएं उठती रही हैं।
स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया में उन धमकी भरे संदेशों को लेकर रिपोर्टें प्रकाशित हुई हैं, जो कथित तौर पर खुद को यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल यानी यूएलसी कहने वाले संगठन की ओर से जारी किए गए थे। इन संदेशों में कश्मीर में काम कर रहे प्रधानमंत्री पैकेज कर्मचारियों को निशाना बनाए जाने की बात सामने आई थी।
मीडिया रिपोर्टों में कर्मचारियों की निजी जानकारी कथित तौर पर लीक होने की जांच की मांग का भी जिक्र किया गया है। इसके साथ ही, ट्रांजिट आवास की सुरक्षा का व्यापक ऑडिट कराने की मांग भी सामने आई है।
अगस्त में स्थानीय मीडिया ने रिपोर्ट किया था कि हांडू ने कथित डेटा लीक की जांच की मांग की है। उन्होंने प्रधानमंत्री पैकेज कर्मचारियों के लिए सुरक्षा उपाय किए जाने की भी मांग की थी।
सितंबर की एक मीडिया रिपोर्ट में कर्मचारियों को मिली नई धमकियों का जिक्र किया गया था। इस रिपोर्ट में हांडू की उस मांग को भी बताया गया था, जिसमें उन्होंने कर्मचारियों की तस्वीरों और निजी जानकारी के प्रसार की जांच की मांग की थी।
इन रिपोर्टों से मौजूदा विवाद की पृष्ठभूमि सामने आती है। हालांकि, ये रिपोर्टें इस एफआईआर में दोनों पक्षों की ओर से लगाए गए आरोपों को स्वतंत्र रूप से साबित नहीं करती हैं। किसी जांच एजेंसी या अदालत ने भी इन आरोपों पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया है।
अपने खुले पत्र में हांडू ने सवाल उठाया कि उनके खिलाफ ऐसी धाराओं के तहत शिकायत क्यों दर्ज की गई, जिन्हें वह साइबर आतंकवाद और आईटी से जुड़े दूसरे अपराधों से जोड़ते हैं।
हांडू का दावा है कि उनके सार्वजनिक बयान और सोशल मीडिया पोस्ट प्रधानमंत्री पैकेज कर्मचारियों की सुरक्षा, उनकी निजी जानकारी के कथित प्रसार और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने की मांग से जुड़े थे।
उन्होंने यह भी सवाल किया कि ट्रांजिट फ्लैटों की जगह और उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताना, या मीडिया संस्थानों में पहले से प्रकाशित रिपोर्टों को साझा करना, क्या कोई अपराध हो सकता है। ये हांडू के तर्क हैं। इन्हें जांच एजेंसी या अदालत का निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
आईटी एक्ट की धारा 66F साइबर आतंकवाद से जुड़ी है। इस धारा में कुछ विशेष परिस्थितियों में उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है। हालांकि, इस मामले में इस धारा को लगाने का कानूनी आधार समझने के लिए एफआईआर में दर्ज सटीक आरोपों और सबूतों को देखना जरूरी होगा।
इसी तरह, धारा 84C का सही दायरा और इस मामले में उसकी लागू होने की स्थिति भी एफआईआर और संबंधित कानूनी प्रावधानों के आधार पर ही तय की जा सकती है। उपलब्ध सामग्री में एफआईआर की पूरी जानकारी या शिकायत में लगाए गए विशिष्ट आरोपों का विवरण नहीं है।
हांडू ने कश्मीर में उग्रवाद के शुरुआती वर्षों के दौरान अपनी गतिविधियों का भी जिक्र किया है। उनका दावा है कि 1990 में वह उन नौ कश्मीरी पंडित युवाओं में शामिल थे, जिन्होंने सुरक्षा बलों की मदद की थी।
हांडू ने कहा कि उस समय किए गए उनके काम का उल्लेख कई प्रकाशनों और उनकी गतिविधियों पर लिखी गई एक किताब में किया गया है। यह दावा भी उनके खुले पत्र में उनकी ओर से रखा गया है।
उन्होंने 2008 में हजरतबल से विधानसभा चुनाव लड़ने का भी जिक्र किया। इसके अलावा, उन्होंने राहुल भट, रजनी बाला और दीपक चंद की लक्षित हत्याओं के बाद प्रधानमंत्री पैकेज कर्मचारियों को दिए गए अपने समर्थन की बात कही।
हांडू के मुताबिक, उन्होंने कश्मीर और केंद्र शासित प्रदेश के बाहर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान कर्मचारियों की कई मांगों का समर्थन किया था। इन मांगों में बेहतर सुरक्षा, उचित आवास और ट्रांसफर नीति की समीक्षा शामिल थी।
कार्यकर्ता ने कहा कि उनका मुख्य विवाद प्रशासन के साथ है। उनके मुताबिक, प्रशासन प्रधानमंत्री पैकेज कर्मचारियों को सुरक्षित आवास देने और कश्मीरी पंडित कर्मचारियों से जुड़े पुनर्वास के मुद्दों को हल करने में देरी कर रहा है।
हांडू ने आरोप लगाया कि सैकड़ों फ्लैट कई वर्षों से अधूरे हैं या उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। उनका कहना है कि इस बारे में बार-बार आश्वासन दिए गए, लेकिन कर्मचारियों को अब तक इसका पूरा लाभ नहीं मिला।
उन्होंने यह भी कहा कि कर्मचारियों की निजी जानकारी के कथित प्रसार की गहन जांच होनी चाहिए। उनके मुताबिक, जांच से यह पता लगना चाहिए कि यह जानकारी कहां से आई और क्या गोपनीय रिकॉर्ड से समझौता हुआ था।
मीडिया की पहले की रिपोर्टों में प्रधानमंत्री पैकेज कर्मचारियों के लिए बनाए गए क्वार्टरों की जगह, उनकी गुणवत्ता और आवंटन को लेकर चिंताओं का जिक्र किया गया है। धमकियों के बाद कर्मचारियों और समुदाय की सुरक्षा का व्यापक मुद्दा भी बार-बार उठता रहा है।
हांडू ने रोहित रैना और प्रधानमंत्री पैकेज समुदाय के सदस्यों से कहा है कि वे प्रशासनिक फैसलों की आलोचना और ऐसे कामों के बीच अंतर करें, जिन पर आपराधिक कार्रवाई हो सकती है।
उन्होंने यह भी कहा है कि वह जांच में सहयोग करने और अपना पक्ष रिकॉर्ड पर रखने के लिए तैयार हैं। उनके पत्र में जांच अधिकारी के सामने पेश होने के बजाय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शामिल होने की इच्छा का भी यही संदर्भ है।
हांडू के पत्र में लगाए गए आरोपों पर पुलिस से स्वतंत्र रूप से प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी है। शिकायतकर्ता रोहित रैना का पक्ष भी उपलब्ध नहीं है। मामले की पूरी तस्वीर सामने रखने के लिए जांच एजेंसी का आधिकारिक पक्ष और शिकायतकर्ता का बयान जरूरी होगा।
यह मामला सार्वजनिक तौर पर सुरक्षा से जुड़े मुद्दे उठाने, निजी जानकारी की सुरक्षा और साइबरक्राइम कानूनों के इस्तेमाल के बीच संतुलन से जुड़े सवाल खड़े करता है। हालांकि, राकेश हांडू के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर कोई अंतिम निष्कर्ष जांच के दौरान जुटाए गए सबूतों और लागू कानून के आधार पर ही निकलेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राकेश हांडू को पुलिस नोटिस क्यों मिला?
बारामुला साइबरक्राइम मामले में दर्ज एफआईआर के सिलसिले में राकेश हांडू को पुलिस नोटिस मिला है।
इस मामले में कौन सी एफआईआर दर्ज की गई है?
हांडू के मुताबिक, एफआईआर नंबर 151/2026 को 12 सितंबर 2026 को दर्ज किया गया था। इसमें आईटी एक्ट की धारा 66F और 84C लगाई गई हैं।
पुलिस नोटिस में हांडू को क्या निर्देश दिया गया था?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(3) के तहत जारी नोटिस में उन्हें 26 सितंबर को जांच अधिकारी के सामने पेश होने को कहा गया था।
हांडू ने जांच में शामिल होने के लिए क्या कहा?
हरियाणा के फरीदाबाद में रहने वाले हांडू ने दूरी को देखते हुए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जांच में शामिल होने की इच्छा जताई थी।
सबसे ज़्यादा पढ़ी गई
- 1
शामली में परिवार पर जानलेवा हमले का आरोप, दो महिलाएं गंभीर
- 2
54वें विशाल कुश्ती दंगल में पहलवानों ने दिखाया दमखम, काजल बनीं महिला केसरी और …
- 3
श्रावस्ती में बड़ा फेरबदल, कई अफसरों के बदले प्रभार
- 4
हाथरस के ऐहन गांव में ठाकुर जी मेले पर सजा कुश्ती दंगल
- 5
महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है शहडोल का शमी वृक्ष
टिप्पणियाँ
अभी कोई टिप्पणी नहीं। पहली टिप्पणी करें।