आईआईटी मद्रास स्टडी: पढ़े-लिखे प्रोफेशनल भी साइबर ठगी के शिकार
IIT मद्रास की स्टडी में सामने आया कि आईटी, बैंकिंग और फाइनेंस जैसे क्षेत्रों के प्रोफेशनल भी दबाव और डर में साइबर फ्रॉड का शिकार हो रहे हैं।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मद्रास के रिसर्चरों की अगुवाई में हुई एक स्टडी में पाया गया है कि भारत में वित्तीय साइबर क्राइम के शिकार लोग अक्सर बहुत पढ़े-लिखे प्रोफेशनल होते हैं। यह बात उस सोच को कमजोर करती है कि ऐसी ठगी का असर मुख्य रूप से उन लोगों पर पड़ता है जो लापरवाह होते हैं, जिन्हें पैसे की समझ कम होती है या जो लालच में आ जाते हैं।
स्टडी में पाया गया कि अच्छी डिजिटल जानकारी होना जरूरी नहीं कि लोगों को साइबर फ्रॉड से बचा ही ले।
पढ़े-लिखे और डिजिटल अनुभव वाले पीड़ित
पीड़ितों में आईटी प्रोफेशनल, बैंकर, डॉक्टर, मैनेजमेंट और फाइनेंस प्रोफेशनल, पब्लिक-सेक्टर अधिकारी और साइबर सिक्योरिटी सर्टिफिकेशन रखने वाले लोग शामिल थे।
रिसर्चरों ने पाया कि पीड़ितों को अक्सर तनाव या जिंदगी में उथल-पुथल के दौर में निशाना बनाया गया। इनमें परिवार में बीमारी, रिटायरमेंट, नौकरी की तलाश, या काम की जगह का दबाव जैसी स्थितियां शामिल थीं।
नतीजे बताते हैं कि कमजोरी सिर्फ जागरूकता की कमी से नहीं आती, बल्कि उन हालात से भी आती है जिनमें ठग दबाव, डर और जल्दीबाजी का फायदा उठाते हैं।
स्टडी में पाया गया कि ठगों ने डर, पैसों से जुड़ी उम्मीदों और इज्जत से जुड़ी चिंताओं का फायदा उठाकर एक “engineered brain freeze” पैदा किया।
पीड़ितों ने “mind arrest” जैसी हालत के बारे में बताया, जिससे साफ-साफ सोचने की उनकी क्षमता पर असर पड़ा।
वित्तीय नुकसान कुछ हजार रुपये से लेकर ₹1 करोड़ से ज्यादा तक रहा।
पीड़ितों ने शर्मिंदगी, नींद न आना, डिप्रेशन और परिवार के भरोसे को नुकसान पहुंचने की बात भी बताई।
संस्थाओं की प्रतिक्रिया अलग-अलग रही
स्टडी में पाया गया कि बैंकों और साइबर क्राइम सेल की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग थीं।
कुछ बैंकों और साइबर क्राइम सेल ने तुरंत जवाब दिया, जबकि कुछ में जरूरी तकनीकी क्षमता और तालमेल की कमी थी।
आईआईटी मद्रास के मैनेजमेंट स्टडीज विभाग और डेटा साइंस एंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विभाग में एडजंक्ट फैकल्टी, श्री कंदस्वामी आईपीएस (सेवानिवृत्त) ने कहा, “साइबर क्राइम पर प्रतिक्रिया को पीड़ितों को दोष देने से आगे बढ़ना होगा। बैंकों और कानून लागू करने वाली एजेंसियों को शुरुआती पहचान, तेज दखल और तालमेल वाली प्रतिक्रिया के लिए मजबूत सिस्टम की जरूरत है, साथ ही पीड़ितों के लिए बेहतर सपोर्ट भी जरूरी है।”
आईआईटी मद्रास के वाधवानी स्कूल ऑफ डेटा साइंस एंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नंदन सुदर्शनम ने कहा, “हमारे नतीजे बताते हैं कि वित्तीय साइबर क्राइम सिर्फ कम डिजिटल जानकारी की समस्या नहीं है। बहुत पढ़े-लिखे और डिजिटल अनुभव वाले लोग भी कमजोर पड़ सकते हैं, जब ठग डर, तनाव और जल्दीबाजी का फायदा उठाते हैं। ज्यादा असरदार रोकथाम की रणनीतियां बनाने के लिए इन बातों को समझना जरूरी है।”
रिसर्च टीम और स्टडी सैंपल
इस स्टडी की अगुवाई आईआईटी मद्रास के सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी पी. कंदस्वामी और नंदन सुदर्शनम ने की। इसमें चेन्नई कैंपस, द यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की एसोसिएट प्रोफेसर आकांक्षा जायसवाल और चेन्नई के लोयोला इंस्टीट्यूट ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की अमीता फर्नांडो ने सहयोग किया।
इस रिसर्च को आईआईटी मद्रास के वाधवानी स्कूल ऑफ डेटा साइंस एंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से सपोर्ट मिला।
स्टडी सैंपल में चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, नई दिल्ली और मुंबई समेत भारत के कई शहरों में रहने वाले वित्तीय साइबर क्राइम के पीड़ित शामिल थे।
टीम ने इन शहरों के साइबर क्राइम सेल से संपर्क किया और पुलिस अधिकारियों के साथ स्टडी का मकसद साझा किया।
इसके बाद पुलिस अधिकारियों ने पीड़ितों के संपर्क विवरण साझा किए और पीड़ितों को इस रिसर्च स्टडी के बारे में शुरुआती जानकारी दी।
अंतिम विवरण में 11 महिलाएं और 22 पुरुष शामिल थे, जिनमें ज्यादातर शादीशुदा थे और उन पर आश्रित लोग थे।
इनमें 12 वरिष्ठ नागरिक थे, जिनमें एक दृष्टिबाधित व्यक्ति भी शामिल था।
यह स्टडी क्यों अहम है
भारत के तेज डिजिटल बदलाव ने एक दशक के भीतर करोड़ों पहली पीढ़ी के यूजर्स को डिजिटल फाइनेंस से जोड़ दिया है।
स्टडी इस बदलाव को लगभग हर जगह मोबाइल पहुंच, यूपीआई और बड़े डिजिटल इंडिया अभियान से जोड़ती है।
यह भी बताती है कि इस बदलाव ने निवेश और शेयर-ट्रेडिंग फ्रॉड, टास्क और जॉब स्कैम, डिजिटल पेमेंट फ्रॉड, मैलवेयर अटैक और खास तौर पर भारतीय “digital arrest” स्कैम के लिए असामान्य रूप से बड़ा हमला करने का मैदान खोल दिया है।
रिसर्चरों ने इस मानवीय अनुभव को इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर के आधिकारिक आंकड़ों के साथ रखकर देखा।
इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर के आधिकारिक आंकड़े लेनदेन में सेंध को दर्ज करते हैं, लेकिन वे उन नंबरों के पीछे के मानवीय सदमे पर चुप रहते हैं।
इसी कमी ने रिसर्च टीम को तकनीकी सवाल के बजाय एक मानवीय सवाल पूछने के लिए प्रेरित किया।
इसलिए यह स्टडी साइबर फ्रॉड की उस संकरी समझ को चुनौती देती है, जो डिजिटल जानकारी को पर्याप्त सुरक्षा मानती है।
यह भी दिखाती है कि बहुत पढ़े-लिखे और डिजिटल अनुभव वाले लोग भी कमजोर पड़ सकते हैं, जब ठग डर, तनाव और जल्दीबाजी का फायदा उठाते हैं।
प्रकाशित - September 30, 2026 01:19 am IST.
स्रोत: The Hindu
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आईआईटी मद्रास की स्टडी में साइबर ठगी को लेकर क्या पता चला?
स्टडी में पाया गया कि भारत में वित्तीय साइबर क्राइम के शिकार सिर्फ कम जानकारी वाले लोग नहीं, बल्कि बहुत पढ़े-लिखे और डिजिटल अनुभव वाले प्रोफेशनल भी हो सकते हैं।
किस तरह के प्रोफेशनल साइबर फ्रॉड के शिकार पाए गए?
पीड़ितों में IT प्रोफेशनल, बैंकर, डॉक्टर, मैनेजमेंट और फाइनेंस प्रोफेशनल, पब्लिक-सेक्टर अधिकारी और साइबर सिक्योरिटी सर्टिफिकेशन रखने वाले लोग भी शामिल थे।
ठग पढ़े-लिखे लोगों को कैसे फंसाते हैं?
रिसर्चरों के मुताबिक ठग डर, तनाव, जल्दीबाजी, पैसों की उम्मीद और इज्जत से जुड़ी चिंता का फायदा उठाते हैं, जिससे पीड़ित साफ सोच नहीं पाते।
पीड़ितों को कितना नुकसान हुआ?
स्टडी के मुताबिक वित्तीय नुकसान कुछ हजार रुपये से लेकर ₹1 करोड़ से ज्यादा तक था। कई लोगों ने शर्मिंदगी, नींद न आना, डिप्रेशन और परिवार के भरोसे को नुकसान की बात भी कही।
स्टडी ने बैंकों और साइबर क्राइम सेल के बारे में क्या कहा?
स्टडी में कहा गया कि कुछ बैंकों और साइबर क्राइम सेल ने तुरंत जवाब दिया, लेकिन कुछ जगह तकनीकी क्षमता और तालमेल की कमी दिखी।
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