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डिप्टी कलेक्टर पद छोड़ा, टिकट नहीं मिला; निशा बोलीं- जिंदगी दस साल पीछे

एक फैसले ने निशा बांगरे की पूरी जिंदगी बदल दी। कभी सरकारी नौकरी पाने के लिए दिन-रात मेहनत करने वाली निशा ने MPPSC की परीक्षा पास की।

डिप्टी कलेक्टर पद छोड़ा, टिकट नहीं मिला; निशा बोलीं- जिंदगी दस साल पीछे
Image credit: News Darpan Team

एक फैसले ने निशा बांगरे की पूरी जिंदगी बदल दी। कभी सरकारी नौकरी पाने के लिए दिन-रात मेहनत करने वाली निशा ने MPPSC की परीक्षा पास की। पहले डीएसपी बनीं और फिर दोबारा परीक्षा देकर डिप्टी कलेक्टर की कुर्सी तक पहुंचीं। लेकिन जिस प्रशासनिक पद को पाने का सपना हजारों युवा देखते हैं, निशा बांगरे ने उसी पद से इस्तीफा दे दिया।

उनका मकसद राजनीति में उतरना था। वह उन लोगों की आवाज बनना चाहती थीं, जिनकी समस्याएं सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच पातीं। उन्हें उम्मीद थी कि विधायक बनकर वह लोगों के लिए ज्यादा बड़े स्तर पर काम कर पाएंगी और आम लोगों से जुड़े मुद्दों को सीधे विधानसभा तक पहुंचा सकेंगी।

लेकिन राजनीति में कदम रखने के बाद उनकी राह आसान नहीं रही। इस्तीफे को स्वीकार करने की प्रक्रिया में देरी हुई। इस बीच चुनाव का मौका निकल गया। इसके बाद उन्हें पार्टी से टिकट भी नहीं मिला। इस तरह जिस नौकरी को छोड़कर वह राजनीतिक भविष्य बनाने निकली थीं, वह नौकरी भी चली गई और चुनावी राजनीति में प्रवेश का रास्ता भी तत्काल नहीं खुल सका।

आज की स्थिति यह है कि निशा न विधायक हैं और न डिप्टी कलेक्टर। पीछे मुड़कर देखती हैं तो खुद अपनी स्थिति को इस तरह बताती हैं, “मेरी जिंदगी दस साल पीछे चली गई है। अब समझ नहीं आता कि इसे फिर से कैसे शुरू करूं।”

निशा बांगरे मध्यप्रदेश के बैतूल से ताल्लुक रखती हैं। उनका जन्म और शुरुआती शिक्षा बालाघाट में हुई। उनके परिवार में शिक्षा को हमेशा प्राथमिकता मिली। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने MPPSC की तैयारी शुरू की।

2016 की परीक्षा में उनका चयन डीएसपी पद के लिए हुआ। इसके बाद उन्होंने फिर परीक्षा दी और डिप्टी कलेक्टर बनीं। इस तरह इंजीनियरिंग की पढ़ाई से शुरू हुआ उनका सफर MPPSC तक पहुंचा और फिर वह प्रशासनिक सेवा का हिस्सा बनीं।

प्रशासनिक सेवा के दौरान उनका लगातार आम लोगों से संपर्क रहा। इस दौरान उन्होंने महिलाओं, वंचित वर्ग और आम नागरिकों की समस्याओं को करीब से देखा। लोगों से जुड़े इन अनुभवों के बीच उनके मन में यह विचार मजबूत होता गया कि प्रशासनिक पद पर रहते हुए बदलाव की एक सीमा होती है।

उनका मानना था कि राजनीति के जरिए लोगों की आवाज बड़े स्तर पर उठाई जा सकती है। इसी सोच ने उन्हें सरकारी सेवा छोड़कर राजनीति में आने का फैसला लेने के लिए तैयार किया। निशा के मुताबिक, उनके संपर्क में आने वाले लोगों ने भी उन्हें चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया था।

उन्हें लगा कि अगर वह विधानसभा तक पहुंचती हैं, तो उन मुद्दों को सीधे सदन में उठा सकेंगी, जिनसे आम लोग जूझ रहे हैं। इसी विश्वास के साथ उन्होंने डिप्टी कलेक्टर के पद से इस्तीफा दे दिया।

निशा ने जिस राजनीतिक सफर को नई शुरुआत समझा था, उसमें पहला ही पड़ाव उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। इस्तीफा स्वीकार होने की प्रक्रिया लंबी चली। चुनाव का अवसर निकल गया और वह चुनाव नहीं लड़ सकीं। इसके बाद उन्हें पार्टी से टिकट भी नहीं मिला।

इस घटनाक्रम का सीधा असर उनके आगे के जीवन पर पड़ा। सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद प्रशासनिक सेवा का सुरक्षित करियर उनके पास नहीं रहा। वहीं, चुनावी राजनीति में प्रवेश का मौका भी उस समय नहीं मिल सका। जिस पद तक पहुंचने के लिए उन्होंने मेहनत की थी, वह पद उन्होंने खुद छोड़ दिया था और विधायक बनने का सपना भी अधूरा रह गया।

अब निशा अपने घर पर हैं। वह मां, पत्नी और बेटी की जिम्मेदारियां निभा रही हैं। लेकिन इस पूरे सफर का सबसे भावुक हिस्सा उनके पांच साल के बेटे के भविष्य को लेकर उनकी चिंता है।

निशा मानती हैं कि नौकरी छोड़ने के बाद आर्थिक सुरक्षा पहले जैसी नहीं रही। उनके पास पर्याप्त सेविंग्स नहीं हैं और भविष्य को लेकर भी निश्चितता नहीं है। एक ऐसे मुकाम तक पहुंचने के बाद, जहां सरकारी प्रशासनिक सेवा की सुरक्षित नौकरी उनके सामने थी, अब उन्हें फिर से अपने करियर की शुरुआत के बारे में सोचना पड़ रहा है।

उनके सामने सिर्फ नौकरी और राजनीति से जुड़ा सवाल नहीं है। परिवार की जिम्मेदारियां भी हैं और पांच साल के बेटे के भविष्य की चिंता भी। वह इस बात को लेकर परेशान हैं कि आगे की जिंदगी किस तरह शुरू की जाए और करियर को दोबारा किस दिशा में ले जाया जाए।

फिर भी निशा बांगरे खुद को खत्म हुआ अध्याय नहीं मानतीं। उनका कहना है: ‘हार नहीं मानूंगी, जिंदगी फिर खड़ी करनी है।’ तमाम उतार-चढ़ाव के बाद भी वह बच्चों की बेहतर शिक्षा और सामाजिक बदलाव के लिए काम करना अपना अगला लक्ष्य मानती हैं।

निशा की कहानी सिर्फ सरकारी नौकरी छोड़ने और चुनाव का टिकट नहीं मिलने की कहानी नहीं है। यह उस फैसले की कहानी है, जिसमें उन्होंने एक सुरक्षित प्रशासनिक करियर छोड़कर राजनीति के जरिए बदलाव का रास्ता चुना। उन्हें उम्मीद थी कि विधायक बनकर वह ज्यादा बड़े स्तर पर लोगों के लिए काम कर पाएंगी, लेकिन उनकी मंजिल फिलहाल दूर रह गई।

एक तरफ डिप्टी कलेक्टर की छोड़ी हुई कुर्सी है और दूसरी तरफ अधूरा राजनीतिक सपना। अब निशा के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह अपने करियर को फिर से उसी मजबूती से खड़ा कर पाएंगी, जिस मजबूती से उन्होंने पहली बार अपनी मंजिल हासिल की थी। जिंदगी को दस साल पीछे चला हुआ मानने वाली निशा अब घर से नई शुरुआत की तलाश में हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

निशा बांगरे ने डिप्टी कलेक्टर पद से इस्तीफा क्यों दिया?

वह राजनीति में आकर आम लोगों की आवाज विधानसभा तक पहुंचाना चाहती थीं।

निशा बांगरे को चुनाव लड़ने का मौका क्यों नहीं मिला?

उनका इस्तीफा स्वीकार होने की प्रक्रिया में देरी हुई, इसी बीच चुनाव का मौका निकल गया।

डिप्टी कलेक्टर पद छोड़ने के बाद निशा को पार्टी का टिकट मिला क्या?

नहीं, चुनाव का मौका निकलने के बाद उन्हें पार्टी से टिकट भी नहीं मिला।

निशा बांगरे ने अपनी मौजूदा स्थिति के बारे में क्या कहा?

उन्होंने कहा, “मेरी जिंदगी दस साल पीछे चली गई है। अब समझ नहीं आता कि इसे फिर से कैसे शुरू करूं।”

निशा बांगरे का संबंध मध्यप्रदेश के किस जिले से है?

निशा बांगरे मध्यप्रदेश के बैतूल से ताल्लुक रखती हैं और उनकी शुरुआती शिक्षा बालाघाट में हुई।

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