भोपाल में ₹2.75 करोड़ की कथित फर्जी एफडीआर, लोकायुक्त ने दर्ज की एफआईआर
भोपाल में शराब दुकान का ठेका हासिल करने के लिए जमा कराई गई ₹2.75 करोड़ की कथित फर्जी बैंक गारंटी और फिक्स्ड डिपॉजिट रसीद यानी FDR का मामला सामने आया है।
भोपाल में शराब दुकान का ठेका हासिल करने के लिए जमा कराई गई ₹2.75 करोड़ की कथित फर्जी बैंक गारंटी और फिक्स्ड डिपॉजिट रसीद यानी FDR का मामला सामने आया है। आरोप है कि 2 करोड़ 75 लाख 33 हजार 335 रुपए की FDR को प्रतिभूति के तौर पर स्वीकार कर लिया गया, जबकि संबंधित बैंक ने इसे जारी करने से ही इनकार कर दिया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए लोकायुक्त में FIR दर्ज की गई है।
यह मामला मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में आबकारी ठेका हासिल करने के लिए जमा कराए गए दस्तावेजों से जुड़ा है। आरोप है कि ठेका प्रक्रिया में जिस FDR को वित्तीय प्रतिभूति के तौर पर पेश किया गया, उसे बैंक ने जारी ही नहीं किया था। इसके बावजूद यह दस्तावेज ठेका हासिल करने के लिए स्वीकार कर लिया गया।
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि बैंक के इनकार के बावजूद FDR को ठेका प्रक्रिया में मान्य कैसे माना गया। संबंधित बैंक ने कथित तौर पर इस FDR को जारी करने से इनकार किया था। इसके बाद भी इसे प्रतिभूति के तौर पर स्वीकार किए जाने से दस्तावेजों की जांच और सत्यापन की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
अब लोकायुक्त की जांच में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि FDR की प्रामाणिकता का सत्यापन किस स्तर पर किया गया था। जांच एजेंसी यह भी देखेगी कि दस्तावेज को स्वीकार करने की मंजूरी किसने दी और बैंक की पुष्टि के बिना इसे वैध कैसे माना गया।
इस पूरे मामले में पूर्व OSD और आबकारी अधिकारी दीपम रायचूरा की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई जा रही है। जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि ठेका प्रक्रिया में कथित अनियमितता किस तरह हुई और संबंधित अधिकारियों की इसमें क्या भूमिका रही।
मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। हालांकि, जांच के निष्कर्ष सामने आने और संबंधित पक्षों का पक्ष स्पष्ट होने के बाद ही किसी की जिम्मेदारी तय हो सकेगी। अभी यह मामला जांच के स्तर पर है।
शराब दुकानों के ठेकों में वित्तीय प्रतिभूति से जुड़े दस्तावेजों का सत्यापन अहम होता है। ऐसे में जिस दस्तावेज को संबंधित बैंक ने जारी करने से इनकार किया, उसके ठेका प्रक्रिया में स्वीकार किए जाने से विभागीय निगरानी पर सवाल उठ रहे हैं।
लोकायुक्त की जांच में दस्तावेजों की सत्यता और उन्हें स्वीकार करने की पूरी प्रक्रिया की पड़ताल की जाएगी। जांच के दौरान यह भी देखा जाएगा कि 2 करोड़ 75 लाख 33 हजार 335 रुपए की FDR से जुड़े दस्तावेजों की जांच किस तरह हुई और किस आधार पर उन्हें प्रतिभूति के तौर पर मान लिया गया।
जांच एजेंसी अधिकारियों की भूमिका के साथ-साथ ठेका प्रक्रिया में कथित अनियमितता के पूरे घटनाक्रम को भी देखेगी। इसमें यह पता लगाने की कोशिश होगी कि मामला प्रक्रिया संबंधी चूक का था या किसी स्तर पर जानबूझकर नियमों की अनदेखी की गई।
मामले ने आबकारी ठेका प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े किए हैं। जब बैंक ने FDR जारी करने से इनकार कर दिया था, तब उसी दस्तावेज को स्वीकार किए जाने की वजह अब जांच का मुख्य हिस्सा है।
बड़ा सवाल यही है कि बैंक के इनकार के बावजूद उसी FDR के आधार पर शराब ठेका हासिल करने का रास्ता कैसे खुल गया। लोकायुक्त की जांच से इस सवाल का जवाब मिलने की उम्मीद है कि दस्तावेज को किस स्तर पर स्वीकार किया गया और इस प्रक्रिया में जिम्मेदार अधिकारियों की क्या भूमिका रही.
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भोपाल में मामला किस चीज से जुड़ा है?
यह मामला शराब दुकान का ठेका लेने के लिए जमा कराई गई ₹2 करोड़ 75 लाख 33 हजार 335 रुपये की कथित फर्जी बैंक गारंटी और FDR से जुड़ा है।
बैंक ने FDR के बारे में क्या कहा?
संबंधित बैंक ने कथित तौर पर इस FDR को जारी करने से इनकार किया था।
इस मामले में FIR किसने दर्ज की है?
मामले की गंभीरता को देखते हुए लोकायुक्त ने FIR दर्ज की है।
लोकायुक्त की जांच में क्या पता लगाया जाएगा?
जांच में यह देखा जाएगा कि FDR का सत्यापन किस स्तर पर हुआ, उसे स्वीकार करने की मंजूरी किसने दी और अधिकारियों की क्या भूमिका रही।
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