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मध्य प्रदेश कांग्रेस का सरकार बनाने का दावा 500 फीसदी तक पहुंचा

मध्यप्रदेश कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष बदलते रहे, चेहरे बदलते रहे, लेकिन ‘सरकार बनाने’ का दावा लगातार बना रहा।

मध्य प्रदेश कांग्रेस का सरकार बनाने का दावा 500 फीसदी तक पहुंचा
Image credit: News Darpan Team

मध्यप्रदेश कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष बदलते रहे, चेहरे बदलते रहे, लेकिन ‘सरकार बनाने’ का दावा लगातार बना रहा। पार्टी की राजनीति में एक डायलॉग जैसे स्थायी रूप से जुड़ गया है: ‘इस बार कांग्रेस की सरकार बनते ही, भाजपा नेताओं की जांच होगी।’ समय के साथ इस दावे की भाषा और उसका प्रतिशत, दोनों बढ़ते गए।

भोपाल से सामने आती इस राजनीतिक तस्वीर में सवाल सिर्फ कांग्रेस के दावे का नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का भी है। कांग्रेस के नेता चुनावी माहौल में सरकार बनाने का दावा करते हैं। कभी यह दावा 100 फीसदी से आगे बढ़कर 200 फीसदी तक पहुंचा और अब 500 फीसदी तक जा चुका है। लेकिन चुनावी नतीजों ने इन दावों की जमीन पर अलग तस्वीर दिखाई।

इस कहानी की शुरुआत पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के दौर से हुई। चुनावी माहौल में कांग्रेस की सरकार बनने के दावे 100 फीसदी से आगे निकलकर 200 फीसदी तक पहुंच गए। पार्टी की ओर से भरोसा जताया गया कि इस बार जनता बदलाव करेगी और कांग्रेस सत्ता में आएगी। साथ ही भाजपा नेताओं की जांच कराने की बात भी राजनीतिक हमलों का हिस्सा बनी रही।

लेकिन चुनावी नतीजे कांग्रेस के दावों के मुताबिक नहीं आए। दावों और नतीजों के बीच यह अंतर पार्टी के सामने बड़ा सवाल बनकर खड़ा हुआ। इसके बाद प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व बदला और कमान जीतू पटवारी के हाथों में आई।

जीतू पटवारी ने सरकार बनाने के दावे में पुराने रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया। 200 फीसदी से सीधे 500 फीसदी तक। यानी इस बार कांग्रेस की सरकार बनने का दावा 500 फीसदी तक पहुंच गया। सत्ता में आने के बाद भाजपा नेताओं के खिलाफ जांच कराने की बात भी कांग्रेस के राजनीतिक हमलों में लगातार शामिल रही।

कांग्रेस की तरफ से कहा जाता रहा है कि भाजपा सरकार के खिलाफ माहौल है। चुनाव आते ही सभाओं में सरकार के खिलाफ मुद्दे गिनाए जाते हैं। भीड़ का जिक्र होता है और यह भरोसा जताया जाता है कि जनता इस बार बदलाव करेगी। नेताओं के दावों में यह बात साफ तौर पर सामने आती है कि कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में है।

लेकिन चुनाव के बाद तस्वीर अलग दिखाई देती है। जब नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आते, तब हार की समीक्षा पर सवाल उठते हैं। इसके साथ ही ईवीएम और चुनावी प्रक्रिया पर भी सवाल उठने लगते हैं। यहीं से कांग्रेस की राजनीति को लेकर यह सवाल और बड़ा हो जाता है कि बार-बार चूक आखिर कहां हो रही है।

सपने देखना बुरी बात नहीं है। कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए बड़े दावे और बड़े लक्ष्य जरूरी हो सकते हैं। किसी भी पार्टी के लिए चुनाव से पहले अपने कार्यकर्ताओं में भरोसा पैदा करना अहम होता है। लेकिन सरकार बनाने का ऐलान अपने आप में सरकार बनने की गारंटी नहीं देता। उसके लिए जनता का भरोसा जीतना पड़ता है।

यही कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल है। अगर जनता बार-बार उम्मीद के मुताबिक साथ नहीं आ रही है, तो कमी आखिर कहां है? क्या संगठन में कमी रह जा रही है? क्या जमीन पर पार्टी की पकड़ कमजोर है? क्या कांग्रेस का संदेश जनता तक सही तरह से नहीं पहुंच पा रहा? या फिर पार्टी चुनाव के समय सक्रिय होकर पांच साल की राजनीतिक जमीन तैयार करने से चूक जाती है?

इन सवालों का जवाब कांग्रेस को खुद तलाशना होगा। सिर्फ यह कहना कि ‘अगली बार हमारी सरकार बनेगी’, कितना असरदार होगा, इसका फैसला जनता ही करेगी। दावा 100 फीसदी का हो, 200 फीसदी का हो या 500 फीसदी का, चुनावी नतीजे सिर्फ दावे के आधार पर तय नहीं होते।

कांग्रेस भाजपा पर वादे और प्रलोभन देने के आरोप लगाती रही है। पार्टी भाजपा सरकार की नीतियों और उसके वादों को लेकर सवाल उठाती है। लेकिन इसी के साथ कांग्रेस के सामने अपना सवाल भी है। जब कांग्रेस खुद जनता के सामने वादे और योजनाएं लेकर जाती है, तब उसके दावों पर भरोसा क्यों नहीं बन पा रहा?

सरकार बनाने की चुनौती केवल भाजपा से मुकाबले तक सीमित नहीं है। कांग्रेस को अपने भीतर भी मजबूत जमीन तैयार करनी होगी। प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं, अलग-अलग गुटों और कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाना पार्टी के लिए लंबे समय से चुनौती रहा है।

अलग-अलग नेताओं और गुटों के बीच एकजुटता का सवाल कांग्रेस की चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण बना हुआ है। पार्टी के सामने यह चुनौती है कि उसके वरिष्ठ नेता, कार्यकर्ता और अलग-अलग हिस्से एक साथ दिखाई दें। केवल चुनाव के समय सक्रिय होना और सरकार बनने का दावा करना पर्याप्त साबित होगा या नहीं, यह भी जनता के भरोसे से जुड़ा सवाल है।

चुनाव सिर्फ नारों से नहीं जीते जाते। सभाओं में भीड़, सरकार के खिलाफ मुद्दे और बड़े-बड़े दावे राजनीतिक माहौल जरूर बनाते हैं, लेकिन आखिरी फैसला चुनावी नतीजों से होता है। सरकार बनाने का दावा 100 फीसदी हो, 200 फीसदी हो या 500 फीसदी: फैसला प्रतिशत नहीं, जनता का वोट करता है।

यही वह जगह है जहां मध्यप्रदेश कांग्रेस को अपने पुराने दावों से आगे बढ़कर खुद को साबित करना होगा। उसे यह दिखाना होगा कि वह सिर्फ सरकार बनाने का सपना नहीं देख रही, बल्कि उसके लिए जमीन भी तैयार कर रही है।

कमलनाथ के दौर में 100 फीसदी से 200 फीसदी तक पहुंचा दावा अब जीतू पटवारी के दौर में 500 फीसदी तक पहुंच गया है। लेकिन दावों के इस बढ़ते प्रतिशत के साथ जनता के भरोसे का सवाल भी उतना ही बड़ा होता गया है। कांग्रेस के सामने अब चुनौती यही है कि वह अपने दावों, संगठन, नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल को जनता के भरोसे में बदल पाए। अंतिम फैसला फिर वही होगा जो हर चुनाव में होता है, जनता का वोट।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मध्य प्रदेश कांग्रेस ने सरकार बनाने का दावा कितने फीसदी तक पहुंचाया?

कांग्रेस का सरकार बनाने का दावा 500 फीसदी तक पहुंच गया।

कांग्रेस के सरकार बनाने के दावे की शुरुआत किस दौर में हुई?

यह दावा पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के दौर में 100 फीसदी से बढ़कर 200 फीसदी तक पहुंचा।

जीतू पटवारी के दौर में कांग्रेस ने क्या दावा किया?

जीतू पटवारी के दौर में कांग्रेस ने सरकार बनाने का दावा 500 फीसदी तक किया।

क्या बड़े दावे सरकार बनने की गारंटी देते हैं?

नहीं, सरकार बनने के लिए जनता का भरोसा जीतना जरूरी है और चुनावी नतीजे सिर्फ दावों के आधार पर तय नहीं होते।

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