एक्सेंट ओलंपिक्स: इंडिया का फेवरेट शौक - इंग्लिश पर जजमेंट बॉडी: एक्सेंट ओलंपिक्स: क्यों भारतीय इंग्लिश प्रोनन्सिएशन पर इतना ध्यान देते हैं शीला सिर्फ 10 साल की थी जब उसने फैसला किया कि वो टीवी देखकर सीखा हुआ अमेरिकन एक्सेंट कभी इस्तेमाल नहीं करेगी।
क्लास में ध्यान लगाना उसके लिए मुश्किल था, लेकिन स्कूल के बाद टीवी देखने का समय अलग था। अमेरिकन शो देखकर उसने इंडियन और अमेरिकन इंग्लिश का मिक्स एक्सेंट अपना लिया। उसे ये नेचुरल लगा क्योंकि इंग्लिश उसके लिए एक विदेशी भाषा थी जो उसने अपने आसपास से सीखी थी।
लेकिन जब एक दोस्त ने पूछा कि क्या वो उस नई क्लासमेट की नकल कर रही है जो अमेरिका से लौटी थी, तो शीला को शर्मिंदगी महसूस हुई। इसके बाद उसने खुद को "न्यूट्रल" बोलने पर मजबूर किया, जिससे वो कई बार बेसिक बातें भी ठीक से नहीं कह पाती थी।
भारत में इंग्लिश एक्सेंट को लेकर लोगों का नजरिया काफी सख्त है। अगर आपकी इंग्लिश में आपकी रीजनल भाषा का असर दिखे तो लोग इसे "खराब" कहते हैं। अगर इसमें विदेशी टच हो तो इसे "नकली" कहकर खारिज कर देते हैं। मजेदार बात ये है कि ये जजमेंट सिर्फ इंग्लिश के लिए होता है।
कोई मलयाली अगर तमिल फ्लुएंटली बोले या कोई भारतीय फ्रेंच सीख ले तो उसकी तारीफ होती है, लेकिन अगर कोई इंग्लिश को नेटिव स्पीकर की तरह बोले तो उसे अक्सर नकारात्मक नजरिए से देखा जाता है। ये डबल स्टैंडर्ड समाज के गहरे रवैये को दिखाता है।
जर्नलिस्ट स्टेनली जॉनी ने एक घटना शेयर की जब चेन्नई में एक सेशन मॉडरेट करने के बाद किसी ने उन्हें सलाह दी कि वो अपना "भारी मलयाली एक्सेंट" कम करें। स्टेनली ने बताया कि जर्मन पैनलिस्ट्स ने अपनी जर्मन एक्सेंट के साथ इंग्लिश बोली, बिना किसी झिझक।
उन्होंने अपने एक्सेंट का बचाव करते हुए कहा कि वो इंग्लिश को एक भारतीय और मलयाली के तौर पर बोलते हैं, जो पूरी तरह से सही है।
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