ह्यूमिडिटी और पिंपल्स: कैसे पसीना और प्रदूषण मिलकर पोर्स को बंद कर देते हैं परिचय गर्मियों में पिंपल्स की समस्या आम है, खासकर दिल्ली में। अप्रैल से सितंबर के बीच न सिर्फ तेज गर्मी होती है, बल्कि पिंपल्स भी बढ़ जाते हैं, जो अक्सर सामान्य फेसवॉश से ठीक नहीं होते।
इसकी असली वजह है नमी वाला मौसम, पसीना और दिल्ली का गंभीर प्रदूषण। ह्यूमिडिटी का स्किन पर असर हमारी त्वचा में 20 से 40 लाख स्वेट ग्लैंड्स होती हैं, जो नमी वाले मौसम में ज्यादा एक्टिव हो जाती हैं। पसीना, जो मुख्य रूप से नमक और पानी से बना होता है, खुद में नुकसानदायक नहीं है।
लेकिन ज्यादा नमी में पसीना जल्दी सूखता नहीं और शरीर के सेबम के साथ मिलकर एक पतली ऑयली परत बना देता है। ये ऑयली-साल्टी लेयर त्वचा की बाहरी परत, जिसे स्ट्रेटम कॉर्नियम कहते हैं, को कमजोर कर देती है और पोर्स को ब्लॉक कर देती है।
डेड स्किन सेल्स, जो सामान्यतः निकल जाते हैं, फंस जाते हैं और हेयर फॉलिकल्स को बंद कर देते हैं। इससे ब्लैकहेड्स और व्हाइटहेड्स जैसे पिंपल्स बनते हैं। प्रदूषण का पिंपल्स पर असर दिल्ली की हवा की क्वालिटी पिंपल्स की समस्या को और बढ़ा देती है।
दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक है, जहां हवा में PM2.5 पार्टिकल्स, गाड़ियों का धुआं, कंस्ट्रक्शन डस्ट और इंडस्ट्रियल एमिशन भरे रहते हैं। ये माइक्रोस्कोपिक पार्टिकल्स त्वचा के पोर्स से भी छोटे होते हैं और अंदर तक घुस जाते हैं।
जब ये प्रदूषण त्वचा पर जमता है, तो सेबम के साथ मिलकर फॉलिकल्स में घुस जाता है और हानिकारक पदार्थ जैसे पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन्स (PAHs) और हेवी मेटल्स ले जाता है।
ये त्वचा की कोशिकाओं में ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस पैदा करते हैं, जिससे सेबम प्रोडक्शन और इंफ्लेमेशन बढ़ता है, और पिंपल्स की समस्या और गंभीर हो जाती है।
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