दसवीं अनुसूची: राजनीतिक दल-बदल पर लगाम लगाने वाला कानून

दसवीं अनुसूची, जिसे 'दल-बदल विरोधी कानून' भी कहा जाता है, भारतीय संविधान का अहम हिस्सा है। यह राजनीतिक दल-बदल को रोकने और सरकारों की स्थिरता बनाए रखने के लिए बनाया गया है।

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दसवीं अनुसूची, जिसे 'दल-बदल विरोधी कानून' भी कहा जाता है, भारतीय संविधान का अहम हिस्सा है।

यह राजनीतिक दल-बदल को रोकने और सरकारों की स्थिरता बनाए रखने के लिए बनाया गया है।

AI-generated illustration · NewsDarpan (GPT-Image-2)

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भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे आमतौर पर 'दल-बदल विरोधी कानून' कहा जाता है, देश में राजनीतिक दल-बदल को नियंत्रित करने का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। इस कानून का उद्देश्य चुने हुए प्रतिनिधियों को पार्टी बदलने से रोकना और सरकारों की स्थिरता सुनिश्चित करना है।

इस अनुसूची के तहत, यदि कोई विधायक अपनी पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ता है या विधानसभा में मतदान के दौरान पार्टी के निर्देशों का पालन नहीं करता है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है। हालांकि, इसमें कुछ अपवाद भी हैं, जैसे कि जब किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य पार्टी में विलय का निर्णय लेते हैं। यह प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि वास्तविक राजनीतिक पुनर्गठन को दंडित न किया जाए।

इस कानून को लेकर कई बार बहस हुई है। आलोचक कहते हैं कि यह विधायकों की स्वतंत्रता को सीमित करता है और उन्हें अपने विवेक के अनुसार मतदान करने से रोकता है। वहीं, समर्थकों का मानना है कि यह बार-बार होने वाले दल-बदल से राजनीतिक अस्थिरता को रोकने में मदद करता है।

दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता के मामलों में फैसला लेने की जिम्मेदारी सदन के अध्यक्ष या सभापति की होती है। यह प्रक्रिया कई बार विवादों में रही है, क्योंकि अध्यक्ष के फैसले को पक्षपातपूर्ण माना गया है।

दसवीं अनुसूची और इसके प्रभावों पर अधिक जानकारी के लिए, भारतीय एक्सप्रेस की वेबसाइट पर मूल लेख पढ़ा जा सकता है। Read full story for details.